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रविवार, 26 सितंबर 2021

*ज्ञान बिना करणी का अंग १६४(५/७)*

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*औषध खाइ न पथ्य रहै, विषम व्याधि क्यों जाइ ।*
*दादू रोगी बावरा, दोष बैद को लाइ ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*ज्ञान बिना करणी का अंग १६४*
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करणी१ आँधी जोर वर२, ज्ञान पांगुलै नैन ।
जन रज्जब दोन्यों जुरहि३, जुदे न पावै चैन ॥५॥
कर्त्तव्य१ में बल तो श्रेष्ठ२ है किंतु अंधा है । ज्ञान पंगु है किंतु उसके नेत्र हैं, ये दोनों जिस साधक में आ मिलते३ हैं तब तो वह ब्रह्मानन्द को प्राप्त होता है और अलग अलग रहते हैं अर्थात कर्त्तव्य है और ज्ञान नहीं है तथा परोक्ष ज्ञान है और धारणा रूप कर्त्तव्य नहीं है तब ऐसे साधक को ब्रह्मानन्द नहीं प्राप्त होता ।
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करणी१ कण चावल सही२, ज्ञान छौंत३ के माँहि ।
रज्जब ऊगै एकठै४, जुदे जुदे सो नांहि ॥६॥
जैसे चावल निश्चय२ ही उसके छिलके३ के भीतर ही रहता है और वे दोनों इकट्ठे-ही४ उगते हैं अलग अलग नहीं उगते । वैसे ही ज्ञान साधन रूप कर्त्तव्य१ करने से ही उत्पन्न होता है और समतादि उसके साथ ही उत्पन्न होते हैं अलग अलग नहीं होते ।
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राम बिना रीति१ रहति२, रहति बिना त्यों राम ।
पछ३ औषधी संयोग सुख, वियोग वे४ हु बेकाम५ ॥७॥
राम के स्वरूप ज्ञान के बिना ब्रह्मचर्य२ पालन रूप कर्त्तव्य महत्व शून्य१ है और वैसे ही ब्रह्मचर्य बिना विषयी का राम स्वरूप संबंधी ज्ञान भी महत्व शून्य है । जैसे पथ्य३ पालन और औषधि सेवन रूप संयोग सुखद होता है और उनका वियोग अर्थात पथ्य पालन बिना वे४ औषधियां खाने पर भी आरोग्यता देने में व्यर्थ५ हो जाती है, निरोग नहीं बना सकती । वैसे ही ज्ञान बिना कर्तव्य कर्म मुक्ति देने में व्यर्थ हो जाते हैं, मुक्ति नहीं दे सकते ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित ज्ञान बिना करणी का अंग १६४ समाप्तः ॥सा. ५०८६॥
(क्रमशः)

शनिवार, 25 सितंबर 2021

*ज्ञान बिना करणी का अंग १६४(१/४)*

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*सतगुरु शब्द विवेक बिन, संयम रह्या न जाइ ।*
*दादू ज्ञान विचार बिन, विषय हलाहल खाइ ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*ज्ञान बिना करणी का अंग १६४*
इस अंग में ज्ञान रहित कर्तव्य कर्म का विचार कर रहे हैं ~
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करणी करै विचार बिन, तबै बंधै ता माँहिं ।
रज्जब उलझ१ अज्ञान में, कबहूं सुलझै२ नाँहिं ॥१॥
बिना ज्ञान जब कर्म करता है तब ही उनमें करने वाला बंधता है और अज्ञानावस्था में बंधा हुआ ज्ञान बिना कभी भी नहीं खुलता२ ।
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भक्ति भेद१ बिन कछु नहीं, ज्यों स्वप्ने बरड़ाय२ ।
रज्जब रस नहिं पाइये, पड्या रैनि दिन गाय ॥२॥
भक्ति का रहस्य१ जाने बिना भक्ति कुछ नहीं होती । जैसे स्वप्न में पड़ा हुआ मनुष्य बोलता२ है, वैसे ही रात्रि दिन पद गाता रहता है किंतु भक्ति रस नहीं मिलता ।
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नाम हिं भजै विचार बिन, यथा अकलि१ बिन राज ।
रज्जब रहै न एक पल, तब ही होय अकाज२ ॥३॥
ज्ञान विचार के बिना नाम भजन, बिना बुद्धि१ के राज्य शासन के समान है । बिना बुद्धि से राज्य शासन नहीं हो सकता शीघ्र ही कार्य की हानि२ होती है, वैसे ही बिना विचार एक क्षण भी नाम पर मन नहीं ठहरता, उसी क्षण विषयों में भाग जाता है ।
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गज गुमान१ बहुते करैं, जोर२ न जाया३ जिय ।
रज्जब बुद्धि विचार बिन, बेड़ी खुलै न पाय४ ॥४॥
जैसे हाथी अपने बल का गर्व१ करता है किंतु बुद्धि बिना उसके बल२ से पैर४ की बेड़ी नहीं खुलती । वैसे ही बहुत से नर अपने तपादि का अभिमान करते हैं किंतु ज्ञान विचार बिना तपादि बल से उसके हृदय से नारी३ का राग नहीं जाता ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

*करणी बिना ज्ञान का अंग १६३(९/१२)*

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*करणी किरका को नहिं, कथनी अनंत अपार ।*
*दादू यों क्यों पाइये, रे मन मूढ गँवार ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*करणी बिना ज्ञान का अंग १६३*
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रज्जब जोबन भादवा, इन्द्री आभे१ माँहिं ।
विषय वारि२ वर्षा विपुल३, ज्ञान भानु४ दुरि५ जाँहिं ॥९॥
जैसे भादवे के महिने में बादल१ भारी३ जल२ की वर्षा करते हैं तब सूर्य४ बादलों से छिप जाते हैं । वैसे ही युवावस्था में इन्द्रियों की चंचलता बढ जाती है और विषय भोग का अत्यधिक अवसर आता है तब भक्ति आदि साधनों से रहित परोक्ष ज्ञान छिप५ जाता है अर्थात हृदय में नहीं रहता ।
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रज्जब रैन१ अचेत२ मत३, वन मन जरि नहिं जाय ।
भानु ज्ञान उगत हि दहै४, उतर इन्द्रियाँ वाय५ ॥१०॥
ग्रीष्म ॠतु की रात्रि१ में वन के तृण, वृक्षादि नहीं जलते अर्थात सूखते तथा तपते नहीं किन्तु सूर्य उदय होने पर जब वायु५ भी उतर जाती है अर्थात बंद हो जाती है तब सूर्य की तीक्ष्ण किरणों से वन जलता४ है । वैसे ही अज्ञानावस्था में मूर्ख२ प्राणी के विचारों३ से मन के विकार नहीं जलते किंतु अपरोक्ष ज्ञान होते ही इन्द्रियों की चंचलता कम होकर मन के विकार जल जाते है ।
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इन्द्रिय आभा१ ऊनवण२, ज्ञान उन्हालू३ होय ।
तो रामा४ रोली५ चढै, रज्जब साख६ न कोय ॥११॥
ग्रीष्म३ ॠतु की खेती जो, गेहूँ होने के समय आदि बादल१ चढे२ रहते हैं और वर्षते नहीं तब खेती खेती में रोली नामक रोग५ लग जाता है । उससे खेती६ नहीं हो पाती । वैसे ही ज्ञान के समय भी इन्द्रियों की चंचलता बढी रहे तो उसके हृदय पर नारी४ का राग चढ जायगा और मुक्ति नहीं मिल सकेगी ।
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आभे१ इन्द्री रैनी अचेत२, सूझै नांहि सबन के नेत३ ।
भानु ज्ञान आये न अंधार, आंखि मूंदि किया अंधियार ॥१२॥
अधेरी रात्रि में गहरे बादल१ छाये हों तब तो सबके नेत्र३ होने पर भी नहीं दीखता परन्तु सूर्य आने पर तो अंधेरा नहीं रहता, किंतु कोई अपनी आँखे बंद करके अंधेरा कर ले तो दूसरी बात है । वैसे ही अज्ञान२ के समय इन्द्रियों की चंचलता बढी रहती है तब तो किसी को भी ब्रह्म दर्शन नहीं होता किंतु ज्ञान होने पर तो अज्ञान चला जाता है, फिर तो अपने प्रमाद वश निदिध्यासन नहीं करे तो दूसरी बात है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित करणी बिना ज्ञान का अंग १६३ समाप्तः ॥सा. ५०७९॥
(क्रमशः)

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

*करणी बिना ज्ञान का अंग १६३(५/८)*

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*अनेक चंद उदय करै, असंख्य सूर प्रकास ।*
*एक निरंजन नांव बिन, दादू नहीं उजास ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*करणी बिना ज्ञान का अंग १६३*
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जे आतम उर अंधगति, ज्ञान दीप कर धारि ।
रज्जब पड़सी कूप में, दीप न सकई ठारि ॥५॥
जो प्राणी अंधा हो, वह अपने हाथ में दीपक धारण करले तो क्या होगा ? वह तो कूप में पड़ेगा ही, बिना नेत्र दीपक उसे कूप से नहीं बचा सकता । वैसे ही ज्ञान के अनुसार धारण रूप कर्तव्य नहीं हो तो उस हृदय के अंध को ज्ञान संसार कूप से नहीं बचा सकता । वह संसार में ही भ्रमण करेगा ।
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रजनी माया मोह की, इन्द्री आभे१ मांहिं ।
रज्जब रति२ न सूझ ही, ज्ञान दृष्टि कछु नांहिं ॥६॥
अंधेरी रात्रि हो और आकाश में गहरे बादल१ छाये हों तब दृष्टि कुछ काम नहीं देती, उससे किंचित२ भी नहीं दीखता । वैसे ही माया मोह रूप रात्रि में, इन्द्रियों की चंचलता रूप बादल हृदय में छाये हुवे हो तब ज्ञानदृष्टि कुछ काम नहीं देती, उससे किंचित मात्र भी ब्रह्म साक्षात्कार नहीं होता ।
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रज्जब ज्ञान दीप नहिं दूरि ह्वै, तिमिर पिंड ब्रह्मण्ड ।
जब लग मिल हि न राम रवि, जिनकी ज्योति प्रचंड ॥७॥
जब तक जिनका प्रचंड प्रकाश है वे सूर्य उदय नहीं होते तब तक दीपक से ब्रह्माण्ड का अंधेरा दूर नहीं होता । वैसे ही जब तक राम नहीं मिलते तब तक परोक्ष ज्ञान से हृदय का अज्ञानांधकार दूर नहीं होता ।
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रज्जब प्राणि पिपीलिका१, ज्ञान पंख परकाश२ ।
वह नहिं मिलै अविगति३ को, वह न जाय आकाश ॥८॥
चींटी१ के पंख प्रकट२ होते हैं पर वह उनसे आकाश में अधिक ऊंची नहीं जा सकती । वैसे ही प्राणी को धारण रूप कर्तव्य रहित परोक्ष ज्ञान प्राप्त होता है तब वह ब्रह्म३ को प्राप्त नहीं होता, कुछ मनुष्यों के पास ही ज्ञान कहला सकता है ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

*करणी बिना ज्ञान का अंग १६३(१/४)*

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*बातों सब कुछ कीजिये, अंत कछू नहिं देखै ।*
*मनसा वाचा कर्मना, तब लागै लेखै ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*करणी बिना ज्ञान का अंग १६३*
इस अंग में कर्तव्य रहित ज्ञान संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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दीपक ज्ञान बताय दे, ज्योति सु कर तन मांहिं ।
रज्जब पकड़ै प्राणि उठि, दीवा पकड़ै नांहि ॥१॥
जैसे दीपक अपनी ज्योति की सुन्दर किरणों द्वारा वस्तु को दिखा देता है किंतु उस वस्तु को प्राणी ही उठकर ग्रहण करता है, दीपक तो नहीं पकड़ता । वैसे ही ज्ञान तो ब्रह्म के स्वरूप को शरीर में बता देता है किंतु निदिध्यासन रूप कर्तव्य करे बिना साधक को ब्रह्मानन्द कब मिलता है ।
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दीपक दोन्यों एकसा, चोर शाह चित नांहिं ।
तैसे रज्जब ज्ञान गति१, मन प्राणी के मांहिं ॥२॥
दीपक चोर और साहुकार दोनों को सम प्रकाश देता हुआ समान रहता है । वैसे ही जिस प्राणी के मन में ज्ञान है, उसकी भी दीपक के समान ही चेष्टा१ होती है । ज्ञानी के चित्त में भी भेद दृष्टि का अभाव और ब्रह्मदर्शन रूप कर्तव्य रहता है ।
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हीरा हरसी१ तिमिर को, पर शीत हर्या नहिं जाय ।
त्यों रज्जब दीपक ज्ञान का, जो देख्या निरताय ॥३॥
हीरा अंधेरे को हर-लेगा१ परन्तु शीत तो उससे नहीं हरा जाता । यदि विचार करके देखा जाय तो वैसा ही ज्ञान दीपक है । ज्ञान, अज्ञान को तो हर लेता है किंतु देह दुखों को तो नहीं हरता, वे तो संयम, उपचार तथा धारण रूप कर्तव्य से दूर किये जाते हैं या सहन किये जाते हैं ।
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रज्जब दीपक ज्ञान का, तिमिर हरै दे नेत१ ।
परि भजन बिना भाजै नहीं, इन्द्री अरि दल खेत ॥४॥
ज्ञान का दीपक विचार रूप नेत्र१ देकर अज्ञानांधार को तो हर लेता है परन्तु भजन रूप कर्तव्य बिना योगरूप युद्ध क्षेत्र से इन्द्रिय और कामादि शत्रु दल नहीं भागता ।
(क्रमशः)

सोमवार, 20 सितंबर 2021

*झूठ साँच निर्णय का अंग १६२(९/१२)*

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*मिश्री मांही मेल कर, मोल बिकाना बंस ।* *यों दादू महँगा भया, पारब्रह्म मिल हंस ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*झूठ साँच निर्णय का अंग १६२*
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साँच आतमा झूठ तन, लागिर झूठी होय ।
रज्जब कही विचार करि, देखत हैं सब कोय ॥९॥
आत्मा सत्य है, शरीर मिथ्या है किन्तु मिथ्या शरीर के साथ लग कर सत्य आत्मा भी झूठी हो रही है । यह हमने विचारपूर्वक ही कहा है और सब देखते भी हैं ।
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झूठ बोलिये धर्म हित, सो मिलै साँच को जाय ।
यहु रज्जब अज्जब१ कही, नर देखो निरताय२ ॥१०॥
धर्म के लिये जो झूठ बोला जाता है, वह तो सत्य को ही जा मिलता है अर्थात सत्य के समान ही हो जाता है । हमने यह अदभुत१ बात कही है । हे नर ! तुम भी विचार२ करके देख लो, यह ऐसी ही बात है ।
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झूठ पाप का मूल है, समय सु मिथ्या साच ।
मार मुहम्मद की शरण, क्या बोलै सो बाच ॥११॥
झूठ पाप का मूल कारण है किंतु किसी समय मिथ्या ही सत्य के समान सुन्दर हो जाता है । मार के भय से मुहम्मद गौरी तथा मुहम्मद गजनी की शरण होने वाले क्या वचन सत्य बोलते ? उन्होने मिथ्या बोलकर के ही अपने प्राण बचाये थे और वह मिथ्या सत्य के समान ही हुआ था ।
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रज्जब राख्या१ मारत हु, झूठ बोल कर प्राण ।
सो मिथ्या मानी सब हु, सांई सहित सुजाण ॥१२॥
जिन लोगों ने मुहम्मद गौरी आदि के मारते समय झूठ बोलकर अपने प्राणों की रक्षा१ की, उस झूठ को प्रभु के सहित सभी बुद्धिमानों ने सत्य समान श्रेष्ठ ही माना था ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित झूठ साँच निर्णय का अंग १६२ समाप्तः ॥सा. ५०६७॥
(क्रमशः)

रविवार, 19 सितंबर 2021

*झूठ साँच निर्णय का अंग १६२(५/८)*

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*जे पहुंचे ते कह गये, तिन की एकै बात ।*
*सबै सयानै एक मत, उनकी एकै जात ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*झूठ साँच निर्णय का अंग १६२*
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झूठ मरै सुन साँच में, साँच मरै सुन झूठ ।
रज्जब ज्यों थी त्यों कही, रजू१ होहु भावे रूठ ॥५॥
सत्य बात सुनकर उसमें स्थित होने पर झूठ नष्ट हो जाती है और झूठ सुनने पर सत्य नष्ट हो जाता है, इस बात पर प्रसन्न१ हो चाहे रुष्ट हो, जैसी स्थिति थी वैसी ही बात कही है ।
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जब लग प्राणी पिंड में, कण कूकस१ मधि होय ।
झूठ साँच दो मिल चलैं, तहां न दीसै दोय ॥६॥
जब तक जीव शरीर में है तब तक जैसे अन्नकण भूसा१ में होता है वैसे ही झूठ में साँच होता है, दोनों मिलकर चलते हैं उस स्थिति में दोनों भिन्न नहीं दीख पड़ते ।
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झुठों साँच समान है, समय सु समसरि१ होय ।
जन रज्जब इस पेच२ को, बूझै३ बिरला कोय ॥७॥
किसी समय झूठ भी सच्चे के समान है, ऐसी समानता हो जाती है । तब इस चक्कर को कोई बिरला ही ज्ञानी ही समझ पाता है । इसको अगली साखी में स्पष्ट कर रहे हैं ।
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तन मन आतम१ झूठ थे, लगे साँच को जाय ।
सो रज्जब साँचे भये, नर देखो निरताय२ ॥८॥
शरीर, मन, बुद्धि१, ये झूठ ही थे किंतु जिसके सत्य ब्रह्म के परायण हो गये वे सच्चे हो गये । हे नर ! यह बात तू भी विचार२ द्वारा देख सकता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 18 सितंबर 2021

*झूठ साँच निर्णय का अंग १६२(१/४)*

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*दादू अमर बेलि है आत्मा, खार समंदां मांहिं ।*
*सूखे खारे नीर सौं, अमर फल लागे नांहिं ॥*
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*झूठ साँच निर्णय का अंग १६२*
इस अंग में झूठ और सत्य के निर्णय संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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झूठ भूमि है खारछा१, सत कण ऊगै नांहिं ।
उभय ठौर निष्फल सदा, समझ देखि मन मांहिं ॥१॥
खारडा१ अर्थात क्षार युक्त भूमी में अन्न कण नहीं उगते, वैसे ही मिथ्या से सत्य नहीं पनपता । मन में विचार करके देख, खारडा और झूठ दोनों ही स्थान अन्न कण और सत्य रूप फल से सदा रहित ही रहते हैं ।
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साँच झूठ जोड़ा सदा, ज्यों तरुवर संग छांहिं१ ।
एक सुफल इक अफल है, समझे समझों माँहिं ॥२॥
जैसे वृक्ष और उसकी छाया१ का जोड़ा होता है, सदा दोनों साथ ही रहते हैं किंतु वृक्ष में फल मिलता है, छाया में नहीं, वैसे ही सत्य और मिथ्या का जोड़ा है किंतु सत्य से सुन्दर फल मिलता है और मिथ्या से सुन्दर फल नहीं मिलता । हे समझे हुये जनों ! यह रहस्य विचार द्वारा अपने भीतर समझो ।
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वपु वाइक मन में सदा, झूठ रहै तिहुं ठौर ।
तिनका वासा नरक में, अस्थल नहीं और ॥३॥
जिनके शरीर, वचन और मन इन तीनों स्थानों में झूठ रहता है उनका निवास
नरक में होता है उनके लिये अन्य स्थान नहीं है ।
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झूठ रहै यूं साँच कन१, ज्यों तिमिर दीप तल आय ।
रज्जब बुझतों ज्योति को, अंधियारा भरि जाय ॥४॥
जैसे दीपक के नीच अंधेरा रहता है, वैसे ही सत्य के पास१ झूठ रहता है और जब ज्योति बुझ जाती है तब सारे घर में अंधेरा ही भर जाता है । वैसे ही सत्य के अभाव से मन, वचन, कर्म में झूठ ही भर जाता है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१(१७/२१)*

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*दादू अनवांछित टूका खात हैं, मर्महि लागा मन ।*
*नाम निरंजन लेत हैं, यों निर्मल साधु जन ॥*
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*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१*
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रज्जब सुकृत सेवा चोर ठग, पापी तिरहिं अपार ।
ज्यों बूड्यों बूड़े नहीं, नाव काठ के भार ॥१७॥
पुण्य कर्म और भक्ति के बल से अपार चोर, ठग और पापी तिर गये हैं, जैसे नाव काष्ठ के भार से डूबने पर भी नहीं डूबती, वेसे ही पुण्य और भक्ति से उक्त चोरादि डूबे हुये होने पर भी तिर जाते हैं ।
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रज्जब पाप पषाण सम, पुण्य काष्ठ की नाव ।
जम जल तिरिये बैठि कहि१, तिहि२ प्राणी चढि जाव ॥१८॥
पाप पाषाण के समान है और पुण्य काष्ठ की नौका के समान है । जैसे पत्थर काष्ठ की नौका पर बैठ कर१ जल में तिर जाता है । वैसे ही जिसे जगत में तिरना हो वह प्राणी उस२ पुण्य की नौका पर चढ जाय अर्थात पुण्य करे ।
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करहि जीव कृत१ पेट को, लावहिं पर उपकार ।
सो रज्जब सीझै२ सही३, ता में फेर न सार ॥१९॥
जीव पेट भरने के लिये काम१ करता है किंतु पेट भरने से बचे धन को परोपकार में लगा देता है, वह निश्चय ही सिद्धावस्था२ रूप मुक्ति को३ प्राप्त होता है । इसमें परिवर्तन को अवकाश नहीं है । यह सार रूप बात है ।
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मात पिता मैले मिले, सुत निपजा बिच साध ।
कुकृत में कीर्ति भई, रज्जब खेल अगाध ॥२०॥
माता पिता पापी होते हैं और उनके निष्पाप संत पुत्र उत्पन्न हो जाता है । वैसे ही पाप से पुण्य उत्पन्न होकर जगत में सुकीर्ति हुई अर्थात यज्ञ में किंचित पाप होता है किंतु पुण्य अधिकर होकर यज्ञ कर्ता का सुयश फैल जाता है, इसका थाह साधारण मनुष्य नहीं पा सकता ।
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इन्द्र अवनि१ अपराध२ बिन, पिंड पड़ै ह्वै पाप ।
परि३ उनकी विषय सु४ बंदगी५, जग जीवन जड़६ जाप ॥२१॥
अति वृष्टि रूप इन्द्र के दोष२ बिना और भू चाल रूप पृथ्वी१ के दोष बिना ही अन्य निमित से जो शरीर गिरते हैं, यह निमित उन्हीं के पाप से बनते हैं । अत: वह पाप है । परन्तु३ उन मूर्ख६ जीवों को श्रेष्ठ विषय सुख४ की प्राप्ति होती है, वह उनका पुण्य ही है और संत सेवा५ तथा जगजीवन प्रभु के नाम का जप करना यह महापुण्य है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१ समाप्तः ॥सा. ५०५५॥
(क्रमशः)

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१(१३/१६)*

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*तेरा सेवक तुम लगै, तुम्हीं माथै भार ।*
*दादू डूबत रामजी, बेगि उतारो पार ॥*
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*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१*
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पाप करत पातक चढै, पुण्य प्रकटत घट जांहिं ।
रज्जब मैले कूप खणि, तिहिं निर्मल जल न्हांहि ॥१३॥
जैसे कूप खोदने से तो खोदने वाला मैला हो जाता है, किंतु उसी के जल से स्नान करने पर निर्मल हो जाता है । वैसे ही पाप कर्म करने से तो पाप चढते हैं और पुण्य कर्म करने से पुण्य प्रकट होने पर पाप कम हो जाते हैं ।
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चोरी की तब चोर है, धर्म करत ह्वै साध ।
भाव फिरत भावी फिरी, तिन हुँ मुक्ति फल लाध ॥१४ ॥
चोरी की तब चोर है ऐसा बोलते थे फिर वही धर्म करता है तब साधु कहलाता है । देखो, भाव बदलते ही होनहार भी बदल जाता है और पूर्व जो चोर था उसी को मुक्ति रूप फल प्राप्त होता है ।
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कुकृत१ करि सुकृत करै तो, कुकृत लागै नाहिं ।
चोर हु छूटे पुण्य बल, समझ देखि मन मांहिं ॥१५॥
कुकर्म करके पुण्य कर्म करता है तब कुकृत का फल उसे नहीं लगता, पुण्य कर्म से नष्ट हो जाता है । पुण्य के बल से चोर भी मुक्त हो गये हैं, यह तुम भी विचार द्वारा मन में देख सकते हो ।
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गुरु गोविन्द रु देव ॠषि, सेवा सबै दयाल ।
पूजा करि पापी तिरे, सब हुं करी प्रतिपाल ॥१६॥
गुरु गोविन्द, देव ॠषि, सेवा से सभी दयालु होकर दया करते हैं । गुरु आदि की पूजा करके पापी भी तिर गये हैं सभी ने अपने सेवकों की रक्षा करी है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 15 सितंबर 2021

*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१(९/१२)*

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*पहली प्राण विचार कर, पीछे पग दीजे ।*
*आदि अंत गुण देख कर, दादू कुछ कीजे ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१*
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रज्जब आरंभ अध१ चढै, आरम्भ हि अध जांहिं ।
तो आरंभ आरंभ फेर२ है, समझ देखि मन मांहिं ॥९॥
एक कर्म के आरंभ से तो पाप१ चढते हैं और एक आरंभ से पाप नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार आरंभ आरंभ में भेद२ रहता है । अत: मन में विचार द्वारा देख करके ही कार्य आरंभ करना चाहिये ।
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कुकृत बेड़ी लोह की, सुकृत छीणी तास ।
एक कृत्य कर्म उदय ह्वै, एक कृत्य कर्म नाश ॥१०॥
कुकर्म लोहे की बेड़ी है और पुण्य कर्म उसे काटने वाली छीणी है । अत: एक कार्य से तो कर्म उत्पन्न होता है और एक से नाश हो जाता है, जैसे एक क्रिया बेड़ी बनी थी और दूसरी क्रिया से कट गई ।
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आरम्भ सब ही निर्दयी, तिनकरि सुकृत होय ।
यूं चलतो सीझै सबै, काज न विनश्या कोय ॥११॥
कार्यारंभ तो सभी दयाहीन होते हैं अर्थात सभी में कुछ न कुछ हिंसा होती है किंतु उन कार्यारंभों से ही पुण्य होता है । इस प्रकार पुण्य करने वालों के सभी कार्य सिद्ध हुये हैं, कोई भी कार्य नष्ट नहीं हुआ वा इस प्रकार चलने से सिद्धावस्था रूप मुक्ति को प्राप्त हुये हैं, किसी का भी मुक्ति रूप काम नष्ट नहीं हुआ है ।
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खच्चर बीछणी केलि गर्भ, पाप पुण्य परकाश१ ।
रज्जब निपजै चतुर फल, मूल माहात्म्य नाश ॥१२॥
खच्चरी और बीछनि के गर्भ मां के पेट को फाड़कर निकलते हैं जिससे खच्चरी और बीछनी मर जाती है । केले के फल आजाने पर केले को काट देते हैं । पुण्य कार्यारंभ से जो पाप प्रकट होता है वह उसी कर्म के पुण्य से नष्ट हो जाता है । 
इस प्रकार उक्त - खच्चर, बीछू, फल और पुण्य, इन चार फलों के उत्पन्न होने पर इनके मूल कारणों को महत्व नष्ट हो जाता है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 13 सितंबर 2021

*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१(५/८)*

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*दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध ।*
*कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१*
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कुकृत करि सुकृत सबै, आदि अंत मधि होय ।
जन रज्जब जग देखिये, जे करि जाणें कोय ॥५॥
इस जगत के आदि, मध्य, अंत में देखा जाता है कि - जो भी सुकृत कर जानते हैं उनसे सभी सृकृत कुकृत द्वारा ही होते हैं अर्थात बिना पाप पुण्य होते ही नहीं ।
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प्राणि हते सेवा शकति१, पंच हते शिव सेव ।
पूजे जाय न पाप बिन, रज्जब देई२ देव ॥६॥
प्राणी को मार कर बलि चढाने से शक्ति१ की सेवा होती है और पंच ज्ञानेन्द्रियों को मारने से शिव की सेवा होती है । अत: पाप बिना तो देवी२ देवता भी नहीं पूजे जा सकते ।
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इक पापी पर लै गये, इक पापी सु प्रसिद्ध ।
रज्जब समझ रु कीजिये, पाप पुण्य की विद्धि ॥७॥
एक प्रकार का पापी अर्थात प्राणियों को मारने वाला तो नष्ट हो जाता है और एक प्रकार के पापी की अर्थात पंचन्द्रियों को मारने वाले की संत रूप से प्रसिद्धि हो जाती है । अत: पाप पुण्य की विधि को समझ करके ही पाप पुण्य करना चाहिये ।
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एक कर्म कर्म ऊपजै, एक कर्म कर्म जाय ।
रज्जब कर्महि कर्म को, नर देखो निरताय१ ॥८॥
एक पाप कर्म से अनेक पाप कर्म होते हैं और एक पुण्य कर्म से पाप नष्ट हो जाते हैं इसी प्रकार एक पुण्य कर्म से अनेक पुण्य कर्म होते हैं और एक पाप कर्म से पुण्य नष्ट हो जाते हैं । अत: हे नरों ! कर्म ही कर्म को अर्थात प्रत्येक कर्म को विचार१ करके देखो और जो हित कर हो उसे ही करो ।
(क्रमशः)

शनिवार, 11 सितंबर 2021

*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१(१/४)*

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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*पाप पुण्य निर्णय का अंग १६१*
इस अंग में पाप पुण्य निर्णय संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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पाप पुण्य का मूल१ है, ता में फेर न सार ।
धर्म कर्म करि ऊपजै, रज्जब समझ विचार ॥१॥
पुण्य की जड़१ पाप है । इसमें परिवर्तन को अवकाश नहीं है, यह सार बात है । धर्म कर्म के द्वारा ही उत्पन्न होता है । यह तुम भी विचार द्वारा समझ सकते हो ।
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जे जड़ पैठै जमी में, अँकुर जाय अकाश ।
त्यों पाप पुण्य का मूल है, सुनहु विवेकीदास ॥२॥
यदि जड़ पृथ्वी में नीचे प्रवेश करती है किन्तु अंकुर तो आकाश को ही जाता है । हे विवेकी दास सुन ! वैसे ही पाप नीचे होने पर भी उससे उत्पन्न पुण्य उत्तम ही है इस प्रकार पाप पुण्य की जड़ है ।
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प्रथम पाप के पेड़ परि, स्वारथ सुकृत डाल ।
रज्जब शाखा तो रहै, किये पेड़ प्रतिपाल ॥३॥
पहले पाप रूप वृक्ष के ऊपर स्वार्थ और सुकृत रूप दो डाल आती है । फिर वृक्ष की प्रतिपालना करने पर ही शाखा रहती है । अत: पाप बिना पुण्य नहीं रह सकता ।
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जड़ सींजत तरुवर बधै, पुण्य पुष्ट१ त्यों पाप ।
रज्जब कही विचार करि, विकट बनाई बाप ॥४॥
जड़ को सींचने पर ही वृक्ष बढता है, वैसे ही पाप द्वारा ही पुण्य बढता१ है, यह हमने विचार करके ही कहा है - भजन विचारादि अंतरंग साधन बिना कोई भी पुण्य कार्य करो उसमें पाप होता ही है । परम पिता प्रभु ने पुण्य उत्पन्न करने की रीति विकट ही बनाई है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

*प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६०(९/१२)*

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साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि ।*
*डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥*
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*प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६०*
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प्रवृत्ति धोरा रेत१ का, निवृत्त है गचगीर२ । 
मन जल किंहि मग३ मेलिये, ब्रह्म विडै४ जाय वीर ॥९॥
प्रवृत्ति मिट्टी१ की नाली के समान है और निवृत्ति पक्कीनाली२ के समान है । जैसे जल को मिट्टी की नाली में चलाओ वा पक्की नाली में चलाओं दोनों मे से किसी भी मार्ग३ से चलाओ वह तो वृक्ष की जड़४ में ही जायगा किंतु कच्ची से देर में और पक्की से शीघ्र जायगा इतना ही अंतर है, वैसे ही मन को पुण्य कर्म रूप प्रवृत्ति से ले जाओ वा भजन विचार रूप निवृत्ति से ले जाओ वह तो ब्रह्म में ही जायगा किंतु प्रवृत्ति से देर में और निवृत्ति से शीघ्र जायगा, इतना ही अंतर है । 
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निवृत्ति प्रवृत्ति द्वै कथा, वो१ ओंकार सु शब्द । 
निर्गुणी निर्गुण आदरी, सह गुण करि सु रद्द२ ॥१०॥
निवृत्ति संबंधी तथा प्रवृत्ति संबंधी दो प्रकार की कथायें हैं । एक तो ओंकार अर्थात निर्गुण ब्रह्म के नाम चिंतन संबंधी है और१ दूसरी अनेक शब्द मय सगुण संबंधी है । निर्गुणी साधकों ने निवृत्ति मय निर्गुण कथा का आदर किया गया है और प्रवृत्ति मय सगुण कथा को त्याग२ दिया है । 
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वटक१ बोल२ तो द्वै द्वै चाल, स्वारथ जड़ परमारथ डाल । 
इहि३ दिशि निरफल४ वहि५ फल फूल, नीचे ऊंचे एकै मूल ॥११॥
जैसे बड़१ का वृक्ष ऊंचे और नीचे दोनों ओर चलता है । ऊंचे डालें चलती हैं तो नीचे जड़ें चलती हैं । जड़ें फलरहित४ होती हैं और डालों के फल फूल लगते हैं किंतु दोनों का मूल एक ही है । वैसे ही वचन२ दो प्रकार से निकलते हैं एक तो स्वार्थ मय दूसरा परमार्थ मय । इस३ संसार की ओर के वचन स्वार्थमय होते हैं, अत: ज्ञान भक्ति रूप फल फूल से रहित होते हैं । उस५ प्रभु की ओर के वचन परमार्थ मय होते हैं, वे ज्ञान भक्ति रूप फल फूल से युक्त होते हैं किंतु दोनों प्रकार के वचनों का मूल एक ही हृदय है । स्वार्थ मय वचन प्रवृत्ति रूप है और परमार्थ मय वचन निवृत्ति रूप है । 
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सांच झूठ द्वै चरण हैं, जीव चलै इन१ मग्ग२ । 
इक टंग्यों३ की और है, जहां न दूजा पग्ग४ ॥१२॥
सत्य और मिथ्या ये दो चरण हैं, जीव इन दो१ से ही मार्ग२ चलते हैं । सत्य चरण की जिनमें प्रधानता होती है वे सन्मार्ग में और असत चरण की प्रधानता होती है वे असन्मार्ग मे चलते हैं किंतु जिनके प्रवृत्ति रूप दूसरा चरण४ नहीं होता उन अद्वैत स्थिति रूप एक चरण३ वालों की गति और ही प्रकार की होती है अर्थात वे तो ब्रह्म में ही लय होते हैं । अत: प्रवृत्ति का फल संसार है और निवृत्ति का फल ब्रह्म प्राप्ति है । 
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६० समाप्तः ॥सा. ५०३४॥
(क्रमशः)

गुरुवार, 9 सितंबर 2021

*प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६०(५/८)*

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साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*परमार्थ को राखिये, कीजे पर उपकार ।*
*दादू सेवक सो भला, निरंजन निराकार ॥*
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*प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६०*
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सुकृत१ फल है प्रवृत्ति मध्य, निवृत्ति नाम निरधार ।
सत२ जत३ को यहु आसिरा४, रज्जब समझ विचार ॥५॥
प्रवृत्ति में पुण्य१ कर्म रूप फल प्राप्त होता है और निवृत्ति नाम चिन्तन द्वारा निराधार प्रभु की प्राप्ति रूप फल मिलता है । सदगृहस्थ२ और साधु३ को यह सुकृत और नामचिंतन रूप साधन का ही आश्रय४ है । यह विचार द्वारा तुम भी समझ सकते हो ।
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सुकृत फल सु प्रवृत्ति मध्य, निवृत्ति नाम निराट१ ।
नर नारायण मुख चढे, आये एक२ हिं बाट३ ॥६॥
प्रवृत्ति में सुकृत फल प्राप्त होता है, निवृत्ति में एकमात्र१ नामचिंतन द्वारा प्रभु प्राप्ति रूप फल मिलता है । जिन प्रवृत्ति परायण नरों के पदार्थ यदि नारायण के मुख रूप संतों के समर्पण हुये हैं वे भी एकता२ रूप मार्ग में ही आये हैं, अर्थात अंत में दोनों ही अद्वैतावस्था३ में ही आ जाते हैं ।
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शिव तरुवर छाया शकति१, जुगल माहात्म्य जान ।
रज्जब जानी पंखि जन, फल पावै किस थान ॥७॥
वृक्ष और छाया दोनों का माहात्म्य पक्षी जानते हैं उन्हें ज्ञात रहता है कि फल किस स्थान पर मिलता है अर्थात वृक्ष में मिलता है छाया में नहीं, छाया में तो आतप ही शांत होता है । वैसे ही ब्रह्म और माया१ का माहात्म्य भक्त जानते हैं उन्हें ज्ञात रहता है । अक्षय सुख रूप फल कहां मिलता है, ब्रह्म चिंतन द्वारा ही मिलता है । माया से तो नष्ट होने वाला सुख ही मिलता है । यही प्रवृत्ति और निवृत्ति के फल का भेद है ।
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धरणी धरै सो वित्त१ ले, तरु नर धरहि अकाश ।
सो परमारथ में पडैं२, जन रज्जब निज दास ॥८॥
जो पृथ्वी में धन रखते हैं वे तो वह रक्खा हुआ धन१ ही प्राप्त करते हैं किंतु जैसे वृक्ष अपने फल रूप धन को आकाश में रखते हैं तो वह परमार्थ में लग२ जाता है । वैसे ही भगवान के निजी भक्त नर ब्रह्म के समर्पण कर देते हैं वह परमार्थ में ही लगता है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 8 सितंबर 2021

*प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६०(१/४)*

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साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*दादू ओंकार तैं ऊपजै, अरस परस संजोग ।*
*अंकुर बीज द्वै पाप पुण्य, इहि विधि जोग रु भोग ॥*
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*प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६०*
इस अंग में प्रवृत्ति निवृत्ति संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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रज्जब वसुधा१ व्योम२ बिच, बीज वृक्ष विस्तार ।
त्यों प्रवृत्ति निवृत्ति मध्य, आतम वो३ ओंकार ॥१॥
पृथ्वी१ और आकाश२ के मध्य जैसे बीज और वृक्ष का विस्तार है । वैसे ही प्रवृत्ति और निवृत्ति में आत्मा और३ ओंकार का विस्तार है ।
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कौण दशा१ फूलै फलै, कौण दशा निरधार२ ।
रज्जब जन३ कण४ गाहकों, किहिं दिशि करै विहार ॥२॥
कौन सी अवस्था१ फूलती फलती है ? प्रवृत्ति की अवस्था फूलती फलती है । कौन सी अवस्था निराधार२ है ? निवृत्ति की अवस्था निराधार है । संतान३ और अन्न४ कण ग्राहक कौन सी दिशा में विचरते हैं ? प्रवृत्ति दिशा की ओर ही विचरते हैं ।
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एक वृक्ष ऊपरि फलै, एक फलै धर१ मांहिं ।
एक दुहूं२ दिशि सुफल है, एक उभय दिशि नांहिं ॥३॥
एक प्रकार के वृक्ष ऐसे होते हैं । जो उपरी शाखा में फल प्राप्त करते हैं । जैसे आम आदि । वैसे ही निवृत्ति प्रधान व्यक्ति संसार दशा से उपर जाकर भी ब्रह्मज्ञान रूप फल प्राप्त करते हैं । एक प्रकार के वृक्ष ऐसे होते हैं जो पृथ्वी१ में फल प्राप्त करते हैं । जैसे आलू आदि । वैसे ही प्रवृत्ति परायण व्यक्ति माया में रहकर मायिक फल ही प्राप्त करते हैं । वैसे ही एक प्रकार के वृक्ष ऐसे होते हैं, जो दोनों२ ओर फल प्राप्त करते हैं, नीचे कंद भी प्राप्त करते हैं और ऊपर फल भी प्राप्त करते हैं, जैसे मूली आदि, वैसे ही प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों में शास्त्र के कथनानुसार चलते हैं वे मायिक सुख तथा ब्रह्मानन्द दोनों ही फलों को प्राप्त करते हैं । एक प्रकार के वृक्ष ऐसे होते हैं जो ऊपर व नीचे दोनों ओर ही फल प्राप्त नहीं करते । जैसे वैत आदि । वैसे ही आलसी पुरुष न मायिक सुख प्राप्त कर सकते हैं और न ब्रह्मानन्द ।
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सत१ जत२ शोधी३ साधु मत४, चतुर५ दशा चहुं आँखि ।
रज्जब सुफल सु लीजिये, निष्फल निरख सु नांखि ॥४॥
संतों के सिद्धान्तों४ को खोज३ करके अर्थात विचार करके गृहस्थी१ और साधु२ वा ब्रह्मचर्य२ पूर्वक सत्य१ स्वरूप ब्रह्म का चिंतन करते हुये, उक्त तीन की साखी में कही हुई १प्रवृत्ति, २निवृत्ति, ३प्रवृत्ति निवृत्ति, ४प्रवृत्ति-निवृत्ति से ही हीन, इन चारों५ अवस्थाओं को वो भीतर के विवेक, विचार, दो बाहर के इन चारों नेत्रों से देखकर सुन्दर फल प्रदान करने वाली को ग्रहण करो और निष्फल को त्यागो, यही प्रवृत्ति निवृत्ति संबंधी श्रेष्ठ परामर्श है ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

*सकाम निष्काम का अंग १५९(२५/२७)*

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साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*स्वारथ सेवा कीजिये, ताथैं भला न होइ ।*
*दादू ऊसर बाहि कर, कोठा भरै न कोइ ॥*
===============
*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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ह्वै फकीर अरु माँगै नांहीं, गृही रहित रहै गृह मांहीं ।
तिन समान नांहीं संसारा, मन वच कर्म सु कीन्ह विचारा ॥२५॥
फकीर तो है किन्तु याचना नहीं करते, गृही रहित हैं अर्थात संतान उत्पन्न नहीं करते और घर में रहते हैं हमने मन, वचन, कर्म से विचार किया है, उसके समान संसार में कोई भी नहीं है ।
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रज्जब काँटा चाह का, विष रूपी सु विषैल१ ।
सो व२ चुभ्या चित चरण में, रही३ सु गोविंद४ गैल५ ॥२६॥
जैसे कोई जहरीला१ काँटा चरण में चुभ जाता है तब मार्ग चलना छूट जाता है । वैसे ही आशा का कांटा भी विषरूप है, सो वह२ चित्त में चुभ जाता है अर्थात सांसारिक आशा मन में आ जाती है तब प्रभु४ प्राप्ति का साधन-मार्ग५ छूट३ जाता है ।
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बंदा१ गंदा होत है, जब माँगै कछु और ।
चरण छुड़ाया चाह ने, किया आपना२ चोर ॥२७॥
जब भगवत् साक्षात्कार से भिन्न कुछ और मांगता है तब दास१ गंदा हो जाता है । इस आशा ने ही भगवान के चरण कमल छुड़ाये हैं और निज२ स्वरूप प्रभु का ही चोर बना दिया है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित सकाम निष्काम का अंग १५९ समाप्तः ॥सा. ५०२२॥
(क्रमशः)

सोमवार, 6 सितंबर 2021

*सकाम निष्काम का अंग १५९(२१/२४)*

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*राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार ।*
*अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥*
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*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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ब्रह्म भजै माया तजै, मन मांही निष्काम ।
जन रज्जब ता संत सौं, प्रत्यक्ष रीझैं राम ॥२१॥
जो मन से माया को त्याग कर तथा मन में निष्काम भाव रखकर निरंतर ब्रह्म का भजन करता है, उस से रामजी प्रसन्न होकर उसके हृदय में प्रगट होते हैं ।
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निष्कामी सेवा करै, ज्यौं धरती आकाश ।
चंद सूर पाणी पवन, त्यों रज्जब निज दास१ ॥२२॥
जैसे पृथ्वी आकाश चन्द्र सूर्य जल वायु ये निष्कामी होकर विश्व रूप प्रभु की सेवा करते हैं, वैसे ही भगवान के निज भक्त१ निष्काम भाव से ही भक्ति करते हैं ।
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नारायण जाचै१ नहीं, सुरपति माँगै कब्ब२ ।
रज्जब राते३ इस मतै४, निरिहाई५ सो सब्ब६ ॥२३॥
जब नारायण भगवान से ही नहीं मांगते१ तब इन्द्र से तो कब२ मांग सकते हैं ? जो इच्छारहित५ हैं सो सभी६ इस निष्कामता के सिद्धान्त में ही अनुरक्त३ हैं ।
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रज्जब रिधि सिधि ना रुचै, जा जिव में जगदीश ।
निरिहाई१ निष्काम सो, मन वच विसवाबीस२ ॥२४॥
जिस जीव के हृदय में निरंतर जगदीश्वर का चिन्तन होता है, उसे ॠद्धि सिद्धि रुचिकर नहीं होती वह इच्छा रहित१ व्यक्ति ही मन वचन कर्म से निश्चय२ ही निष्कामी होता है ।
(क्रमशः)

रविवार, 5 सितंबर 2021

*सकाम निष्काम का अंग १५९(१७/२०)*

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*देह रहै संसार में, जीव राम के पास ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥*
===============
*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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सकल प्राणि स्वारथ वशी, उलझे आशा फंद ।
रज्जब रट रज काटि कर्म, मुक्ता सोइ स्वच्छंद ॥१७॥
सभी प्राणी स्वार्थ के वश में होकर आशा रूप फंदे में फंसे हैं । जो प्रतिक्षण प्रभु नाम का उचारण और चिंतन करता है, वही ज्ञान प्रकाश द्वारा अपने कर्मों को नष्ट करके मुक्त तथा स्वतंत्र होता है ।
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काम कंद पसरै नहीं, सुरति सुन्दरी भूल ।
जन रज्जब रंकार रत, सो आतमा अमूल ॥१८॥
जिसकी वृत्ति रूप बेलि काम रूप जड़ से निकल कर नारी रूप वृक्ष पर भूल से भी नहीं फैलती, अर्थात नारी के आकार नहीं होती और राम मंत्र के बीज "रा" के चिंतन में निरंतर अनुरक्त रहती है वही जीवात्मा अमूल्य अर्थात महान माना जाता है ।
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एक मनारत एक सौं, काढि कामना कंद ।
उर अंजन उलझै नहीं, वह आतम अबंद ॥१९॥
जिसका एकाग्र मन सांसारिक कामनाओं की जड़ काट कर एक ब्रह्म मे ही अनुरक्त रहता है और हृदय माया में नहीं फंसता, वह जीवात्मा बंधन से रहित मुक्त ही माना जाता है ।
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उर औरै आशा नहीं, मिले न माया मन्न ।
रज्जब मुक्ता मांड में, सुलझ्या साधू जन्न ॥२०॥
जिसके हृदय में ब्रह्म विचार से भिन्न और कोई भी आशा नहीं है । मन माया से कभी भी नहीं मिलता अर्थात माया में अनुरक्त नहीं होता, विचार द्वारा संसार बंधन से निकला हुआ हरि भक्त ब्रह्माण्ड में मुक्त ही माना जाता है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

*सकाम निष्काम का अंग १५९(१३/१६)*

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साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*मांही सूक्ष्म ह्वै रहै, बाहरि पसारै अंग ।*
*पवन लाग पौढ़ा भया, काला नाग भुवंग ॥*
===============
*सकाम निष्काम का अंग १५९*
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कामी क्वैलों१ की कला, बुझ्यों बुझी सो नांहिं ।
रज्जब अबला आगि मिल, एक मेक ह्वै जाँहिं ॥१३॥
कामी कोयलों१ की अग्नि की कला समान है । जैसे कोयलों की अग्नि बुझने पर भी नहीं बुझी के समान है । अग्नि से मिलते ही कोयले अग्नि रूप हो जाते हैं । वैसे ही कामी नारी से मिलते ही उसमें आसक्त हो जाता है ।
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दुर्मति दारू१ सौं भरे, वपु सु बाण विधि मांहिं ।
रज्जब त्रिगुणी२ जरे बिन, निश्चल उभय सु नांहिं ॥१४॥
जैसे अग्नि बाण में बारूद१ भरी रहती है, वैसे ही सकामी में दुर्बुद्धि भरी रहती है । बाण की बारूद जले बिना बाण पृथ्वी पर निश्चल नहीं होता । वैसे ही त्रिगुणात्मिका५ माया के जले बिना अर्थात हृदय से मायिक भावना निकाले बिना सकामी ब्रह्म में स्थिर नहीं हो सकता ।
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मुक्ति निराशा बंधन आस, घर वन मांहिं कहीं करि बास ।
एक ज्ञान घर एक अज्ञान, रज्जब समझे सुख दुख थान१ ॥१५॥
घर में तथा वन में कहीं भी रहो, निराशा से मुक्ति होती है, और आशा बंधन होता है । एक ज्ञान रूप घर है और एक अज्ञान रूप घर है, समझे हुये ज्ञानी को ज्ञान रूप घर में सुख रहता है । अज्ञानी को अज्ञान दुख का घर१ बना रहता है ।
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रज्जब खुले न व्योम बँध, मही न मुक्ता होय ।
पाताल सु फाँसी न कटै, आशा वश सब कोय ॥१६॥
आशा का बंधन आकाश में अर्थात स्वर्ग में भी नहीं खुलता, पृथ्वी में भी आशा से मुक्त नहीं होता, पाताल में भी आशा की फाँसी नहीं कटती, सुर, नर, नागादि सभी आशा के वश में हैं ।
(क्रमशः)