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बुधवार, 22 अप्रैल 2020

*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*को साधु जन उस देश का, आया इहि संसार ।*
*दादू उसको पूछिये, प्रीतम के समाचार ॥*
*दादू दत्त दरबार का, को साधु बांटै आइ ।*
*तहाँ राम रस पाइये, जहँ साधु तहँ जाइ ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*
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पुजारी के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर पुरी महाराज कुछ लज्जित हुए। वे भगवान की कृपालुता, भक्त वत्‍सलता और अपने भक्तों के प्रति अपार ममता के भावों को स्‍मरण करके प्रेम में विभोर होकर रुदन करने लगे। रोते-रोते उन्‍होंने भगवान का दिया हुआ वह महाप्रसाद दोनों हाथ फैलाकर अत्‍यन्‍त ही दीन-भाव से भिखारी की भाँति ग्रहण किया।
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एकान्‍त में प्रेम में पागल हुए उस महाप्रसाद को वे पाने लगे। उस समय के उनके अनिर्वचनीय आनन्‍द का अनुमान लगा ही कौन सकता है? एक तो भगवान का महाप्रसाद और दूसरे साक्षात भगवान ने अपने हाथ चोरी करके दिया। पुरी रोते जाते थे और उस प्रसाद को पाते जाते थे। चारों ओर से पात्र को खूब चाट-चाटकर पुरी ने प्रसाद पाया।
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फिर जल डालकर उसे धोकर पी गये और उस मिटटी के पात्र के टूकड़े कर करके उन्‍हें अपने वस्‍त्र में बाँध लिया। भला, भगवान के दिये हुए पात्र को वे फेंक कैसे सकते थे? उस को रोज नियम से एक-एक करके खा लेते थे।
जब रेमुणाय के लोगों को भगवान की क्षीर-चोरी की बात मालूम पड़ी, तब तो हजारों नर-नारी पुरी महाराज के दर्शन के लिये आने लगे।
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चारों ओर पुरी महाराज के प्रभु प्रेम की प्रशंसा होने लगी। सभी के मुखों पर वही पुरी महाराज की अलौकिक भक्ति की बात थी, सभी उनके भगवत प्रेम की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। प्रतिष्‍ठा को शूकरीविष्‍ठा और गौरव को रौरव-नरक के समान दु:खदायी समझनेवाले पुरी महाराज अब अधिक काल तक वहाँ न ठहर सके, वे श्रीगोपीनाथ भगवान क चरणों की वन्‍दना करके जगन्‍नाथ पुरी के लिये चले गये।
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जगन्‍नाथ जी में पहुँचते ही पुरी महाराज के आगमन का समाचार चारों ओर फैल गया। दूर-दूर से लोग पुरी महाराज के दर्शन के लिये आने लगे। सचमुच मान-प्रतिष्‍ठा तथा कीर्ति की गति अपनी शरीर की छाया के समान ही है, तुम यदि स्वयं छाया को पड़ने दौड़ोगें तो वह तुमसे आगे-ही-आगे भगती जायगी। तुम कितना भी प्रयत्‍न करो, वह तुम्‍हारे हाथ न आवेगी।
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उसी की तुम उपेक्षा करके उससे पीछा छुड़ाकर दूसरी ओर भागो, तुम चाहे उससे कितना भी पीछा छुड़ाना चाहो, किंतु वह तुम्‍हारा पीछा न छोड़ेगी। तुम जिधर भी जाओगे उधर ही वह तुम्‍हारे पीछे-पीछे लगी डोलेगी। जो लोग प्रतिष्‍ठा चाहते हैं, प्रतिष्‍ठा के लिये सब कुछ करने को तैयार हैं, उनकी प्रतिष्‍ठा नहीं होती और जो संसार में पृथक होकर एकदम प्रतिष्‍ठा से दूर भागते हैं, संसार उनकी प्रतिष्‍ठा करता है। इसीलिये तो संसार की गति को उलटी बताते हैं।
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गोपीनाथ भगवान के दरबार में से पुरी महाराज प्रतिष्‍ठा के ही भय से भाग आये थे, उसने यहाँ भी पिण्‍ड नहीं छोड़ा। अस्‍तु, कुछ काल तक जगन्‍नाथपुरी में निवास करके ब्राह्मणों के समुख अपने श्रीगोपाल की इच्‍छा कह सुनायी। भगवान की इच्‍छा को समझकर पुरीनिवासी ब्राह्मण परम प्रसन्‍न हुए और उन्‍होंने पुरी महाराज के लिये बहुत-से मलयागिरी चन्‍दन की व्‍यवस्‍था कर दी।
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राजा से कहकर उन्‍होंने चन्‍दन के लिये यथेष्‍ट कर्पूर तथा केसर-कस्‍तूरी का भी प्रबन्‍ध कर दिया। उन्‍हें व्रज तक पहुँचाने के लिये दो सेवक भी पुरी महाराज के साथ कर दिये और राजाज्ञा दिलाकर उन्‍हें प्रेमपूर्वक विदा कर दिया। चन्‍दन, कर्पूर आदि को लिये हुए पुरी महाराज फिर रेमुणाय में पधारे और श्रीगोपीनाथ भगवान के दर्शन के निमित वहाँ दो चार दिन के लिये ठहर गये।
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भगवान तो भाव के भूखे हैं, उन्‍हें किसी संसारी भोग की वांछा नहीं, वे तो भक्त का भक्ति-भाव ही देखना चाहते हैं। पुरी महाराज की अलौकिक श्रद्धा तो देखिये, भगवान की आज्ञा पाते ही चन्‍दन लेने के लिये भारत के एक छोर से समुद्र के किनारे दूसरे छोर पर आपत्ति-विपत्तियों की कुछ भी परवा न करते हुए प्रेम सहित चल दिये।
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अब भक्त की अग्नि-परीक्षा हो चुकी। वे उसमें खरे सोने के समान निर्मल होकर चमकते हुए ज्‍यों-के-त्‍यों ही निकल आये। अब भगवान ने भक्त को और अधिक क्‍लेश में डालना उचित नहीं समझा। उस समय मुसलमानी शासन में इतनी दूर तक चन्‍दन आदि को ले जाना बड़ा कठिन था। फिर स्‍थान-स्‍थान पर घोर युद्ध हो रहे थे, कहीं भी निर्विघ्‍न पथ नहीं था।
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इसीलिये भगवान ने पुरी महाराज को स्‍वप्‍न में आज्ञा दी- ‘श्री गोपीनाथ और मैं एक ही हूँ। तुम हमारे दोनों विग्रहों में किसी प्रकार की भेद-बुद्धि मत रखो। तुम इस चन्‍दन का लेप श्रीगोपीनाथ के ही विग्रह में करो। इसी से हमारा ताप दूर हो जायगा। हमारे वचनों पर विश्‍वास करके तुम नि:संकोच-भाव से इस चन्‍दन को यहीं पर घिसवाकर हमारे अभिन्‍न विग्रह में लगवा दो।’
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पुरी महाराज को पहले जो स्‍वप्‍न में आदेश हुआ था, उसकी पूर्ति के लिये तो वे जगन्‍नाथ जी चन्‍दन लेने के लिये दौड़े आये थे, अब जो भगवान ने स्‍वप्‍न में आज्ञा दी उसे वे कैसे टाल सकते थे, इसीलिये भगवान की आज्ञा शिरोधार्य करके वे वहीं ठहर गये और चन्‍दन घिसवाने के लिये दो आदमी नौकर और रख लिये।
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ग्रीष्‍मकाल के चार महीनों तक वहीं रहकर पुरी महाराज भगवान के अंग पर कर्पूर, चन्‍दन आदि का लेप कराते रहे और जब भगवान का ताप दूर हो गया, तो वे चतुर्मास बिताने के लिये निमित्त पुरी चले गये और वहाँ चार महीने निवास करके फिर अपने श्रीगोपाल के समीप लौट आये।
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इस प्रकार सभी भक्‍तों को श्रीमन्‍माधवेन्‍द्रपुरी को उत्‍कट और अलौकिक प्रेम की कहानी कहते-कहते प्रभु का गला भर आया। प्रभु के दोनों नेत्रों से अश्रुधारा निकल-निकलकर उनके वक्ष:स्‍थल को भिगोने लगी। पुरी के महात्‍म्‍य का वर्णन करते-करते अन्‍त में उन्‍हें उस श्‍लोक का स्‍मरण हो आया जिसे पढ़ते-पढ़ते पुरी महाराज ने इस पांच भौतिक शरीर का परित्‍याग किया था।
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वे रुँधे हुए कण्‍ठ से उस श्‍लोक को बार-बार पढ़ने लगे-श्‍लोक पढ़ते-पढ़ते वे बेहोश होकर नित्‍यानन्‍द जी की गोद में गिर पड़े। अन्‍य उपस्थित भक्त भी प्रभु को रुदन करते देखकर जोरों से क्रन्‍दन करने लगे। उसी समय भगवान का भोग लगाकर शयन-आरती हुई। प्रभु ने सभी भक्‍तों के सहित शयन-आरती के दर्शन किये और फि‍र वहीं मन्दिर के समीप ही एक स्‍थान में रात्रि बिताने का निश्‍चय किया।
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पुजारियो ने लाकर भगवान के क्षीर-भोग के बारह पात्र प्रभु के सामने रख दिये। प्रभु भगवान के उस महाप्रसाद के दर्शनमात्र से ही परम प्रसन्‍न हो उठे। प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए उन्‍होंने कहा- आज हमारा जन्‍म सफल हआ, जो हम गोपीनाथ भगवान के क्षीर के अधिकारी समझे गये। भगवान के प्रसाद के सम्‍बन्‍ध में लोभवृति करना ठीक नहीं है।
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हम पाँच ही आदमी हैं, अत: आप हमें पांच पात्र देकर सात पात्रों को उठा ले जाइये। भगवान के प्रसाद के अधिकारी सभी हैं। उसे अकेले-ही-अकेले पा लेना ठीक नहीं है। यह कहकर प्रभु ने पाँच पात्रों को ग्रहण करके शेष सात पात्रों को लौटा दिया। भगवान के उस अदभुत महाप्रसाद ने प्रभु ने अपने भक्तों के साथ श्रद्धासहित पाया और वह रात्रि वहीं भगवान के चरणों के समीप बितायी।
(क्रमशः)

*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*

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*तब भरम करम भय भाजै,*
*तब तीनों लोक विराजै ॥*
*जब चरण कमल रुचि तेरी,*
*तब चार पदारथ चेरी ।*
*तब दादू और न बांछै,*
*जब मन लागै सांचै ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. १८२)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*
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इसके पश्‍चात अन्‍य ग्रामों के भी पुरुष बारी-बारी से श्रीगोपाल भगवान का अन्‍नकूट करने लगे। इस प्रकार रोज ही पुरी महाराज की कुटिया में अन्‍नकूट की धूम रहने लगी। यह समाचार दूर-दूर फैल गया। मथुरा के बड़े-बड़े सेठ श्रीगोपाल भगवान के दर्शन को आने लगे और वे सोना, चांदी, हीरा, जवाहिरात तथा भाँति-भाँति के वस्‍त्राभूषण भगवान की भेंट करने लगे।
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किसी पुण्‍यवान पुरुष ने श्रीगोपाल भगवान का बड़ा भारी विशाल मन्दिर बनवा दिया। सभी व्रजवासियों ने एक-एक, दो-दो गाय मन्दिर के लिये भेंट दी। इससे हजारों गौएं मन्दिर की हो गयीं। पुरी महाराज बड़े ही भक्तिभाव से भगवान की सेवा-पूजा करने लगे। उनका शरीर कुछ क्षीण-सा हो गया था; वे सेवा-पूजा के लिये कोई योग्‍य शिष्‍य चाहते थे, उसी समय गौड़-देश से दो सुन्‍दर युवक आकर पुरी महाराज के शरणापन्‍न हुए।
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पुरी ने उन्‍हें योग्‍य समझकर दीक्षित किया और उन्‍हें श्रीगोपाल भगवान की पूजा का काम सौंपा। इस प्रकार दो वर्षो तक पुरी महाराज श्रीगोपाल भगवान की पूजा करते रहे। एक दिन स्‍वप्‍न में भगवान ने पुरी महाराज से कहा- ‘माधवेन्‍द्र ! बहुत दिनों तक पृथ्‍वी के अंदर रहने के कारण हमारे सम्‍पूर्ण शरीर में दाह होती है, यदि तू जगन्‍नाथ पुरी से मलयागिरी-चन्‍दन लगाकर हमारे शरीर में लेपन करे तो हमारी यह गर्मी शान्‍त हो।’
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भगवान की आज्ञा शिरोधार्य करके दूसरे दिन शिष्‍यों को पूजा का सभी काम सौंपकर और भगवान से आज्ञा प्राप्‍त करके पुरी महाराज ने नीलाचल के लिये प्रस्‍थान किया। इसी यात्रा में वे नवद्वीप पधारे और अद्वैताचार्य के घर पर आकर ठहरे। आचार्य उनके अदभुत भक्तिभाव को देखकर उनके भगवत-प्रेम पर आसक्‍त हो गये और उन्‍होंने पुरी महाराज से दीक्षा लेकर उन्‍हें अपना गुरु बनाया।
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कुछ दिन शान्तिपुर में रहकर और अद्वैताचार्य को दीक्षा देकर पुरी महाराज नीलाचल के लिये चले। चलते-चलते वे यहाँ रेमुणाय में आये और उन्‍होंने श्रीगोपीनाथ के दर्शन किये। गोपीनाथ भगवान के दर्शन से पुरी को अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍नता हुई। यहाँ पर भगवान का साज-श्रृंगार तथा भोग-राग बड़ी ही भावमय पद्धति से किया जाता था, पुरी महाराज वहाँ की पूजा पद्धति को खूब ध्‍यानपूर्वक देखते रहे।
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अन्‍त में उन्‍होंने पुजारियों से पूछा- ‘यहाँ पर भगवान का मुख्‍य भोग किस वस्‍तु का लगता है?’ पुजारियों ने उतर दिया- ‘यहाँ श्रीगोपीनाथ भगवान का क्षीरभोग ही सर्वोत्तम प्रधान भोग है। गोपीनाथ जी की क्षीर को ‘अमृतकेलि’ नाम से पुकारते हैं।
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गोपीनाथ जी की प्रसादी खीर सर्वत्र प्रसिद्ध है। बारह पात्रों में शाम को खीर का भोग लगता है।’ पुरी महाराज की इच्‍छा थी, कि मैंने पूजा की पद्धति तो समझ ली, किन्‍तु खीर कैसी होती है, इसे मैं ठीक-ठीक नहीं समझ सका। यदि भगवान की प्रसादी थोड़ी-सी खीर मिल जाती, तो उसका स्वाद देखकर मैं भी अपने श्री गोपाल को ऐसी ही खीर अर्पण करता।
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इस विचार के मन में आते ही उन्‍हें भय प्रतीत हुआ कि यह मेरी जिह्रा-लोलुपता तो नहीं है। ऐसे भाव रसना-स्‍वाद के निमित तो मेरे हृदय में उत्‍पन्‍न नहीं हो गये। फिर उन्‍होंने सोचा- ‘भगवान के प्रसाद में क्‍या इन्द्रिय-लोलुपता? मैं जिह्वा-स्‍वाद के लिये तो इच्‍छा कर ही नहीं रहा हूँ, अपने भगवान को भी ऐसी ही खीर खिलाने की मेरी इच्‍छा थी।’
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इन विचारों से उन्‍हें कुछ-कुछ सन्‍तोष हुआ, किन्‍तु वे किसी से प्रसाद माँग तो सकते ही नहीं थे, कारण कि उनका तो अयाचित व्रत था। बिना मांगे जो भी कोई कुछ दे देता, उसी से जीवन-निर्वाह करते, इसलिये प्रसाद को चखने की उनकी इच्‍छा मन-की-मन में ही रह गयी। उन्‍होने किसी के सामने अपनी इच्‍छा प्रकट नहीं की।
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संध्‍या को भोग लगाकर शयन-आरती हो गयी। भगवान के कपाट बंद कर दिये गये। सभी लोग अपने-अपने घरों को चले गये। पुरी महाशय भी गांव से थोड़ी दूर पर एक कुटिया में जाकर पड़ रहे। आधी रात्रि के समय पुजारी ने स्‍वप्‍न देखा- मानो साक्षात गोपीनाथ भगवान उसके सामने खड़े होकर कह रहे हैं- ‘पुजारी ! पुजारी !! तुम अभी उठकर मेरा एक जरुरी काम करो।
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मेरा एक परम भक्त माधवेन्‍द्रपुरी नाम का महाभागवत संन्‍यासी ग्राम के बाहर ठहरा हुआ है। उसकी इच्‍छा मेरे ‘क्षीर-प्रसाद’ को पाने की है। अपने भक्‍त की मनोवां‍छा को पूर्ण करने के निमित्त मैंने अपने भोग के बारह पात्रों में से एक को चुराकर अपने वस्‍त्रों में छिपा लिया है, तुम उसे ले जाकर अभी माधवेन्‍द्र को दे आओ।’
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इतना सुनते ही पुजारी चौंककर उठ पड़ा। उसने भगवान के पट खोलकर उनके वस्‍त्रों को देखा। सचमुच उनमें एक क्षीर से भरा पात्र छिपा हुआ रखा है। पुजारी उस पात्र को लेकर नगर के चारों ओर चिल्‍लाता फिर रहा था- ‘माधवेन्‍द्रपुरी किनका नाम है? जो माधवेन्‍द्रपुरी नाम के साधु हों, वे इस क्षीर के पात्र को ले लें। भगवान ने उसके निमित्त क्षीर की चोरी की है।’
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इस प्रकार चिल्‍लाते-चिल्‍लाते पुजारी उसी स्‍थान पर पहुँचा जहाँ पुरी महाराज ठहरे हुए थे। भगवान के पुजारी के मुख से अपना नाम सुनकर पुरी महाराज बाहर निकल आये और कहने लगे- ‘महाराज ! मेरा ही नाम माधवेन्‍द्रपुरी है, कहिये क्‍या आज्ञा है?’
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पुरी महाराज का परिचय पाकर पुजारी उनके पादपद्मों में प्रणत हुआ और बड़े ही विनीत वचनों से कहने लगा- ‘महाभाग ! आप धन्‍य है। आपकी इस अलौकिक भक्ति को कोटि-कोटि धन्‍यवाद है ! आज हम आपके दर्शन से कृतार्थ हुए। इतने दिन की भगवान् की पूजा का फल आज प्राप्‍त हो गया। हम-जैसे पैसों के गुलामों को भगवान के साक्षात दर्शन तो हो ही कैसे सकते हैं?
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किन्‍तु हम अपना इसी में अहोभाग्‍य समझते है कि भगवान की पूजा करने के प्रभाव से आप-जैसे भगवान के परम प्रिय भक्त के दर्शन हो गये। हम तो आपको साक्षात् भगवान ने भी क्षीर की चोरी की, वे भी चोर बने, वे महाभागवत तो भगवान से भी बढ़कर हैं। यह लीजिये भगवान ने यह क्षीर आपके लिये चुराकर रख छोड़ी थी। उन्‍हीं की आज्ञा से मैं इसे आपके पास लाया हूँ।’
(क्रमशः)

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*

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*राते माते प्रेम रस, भर भर देहु खुदाइ ।*
*मस्तान मालिक कर लिये, दादू रहे ल्यौ लाइ ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*
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पुरी महाशय ने उस दूध को पीया। इतना स्‍वादिष्‍ट दूध उन्‍होंने अपने जीवन में कभी नहीं पीया था, वे मन में अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न होते हुए उस दूध को पीने लगे। उनके हृदय में उस साँवले ग्‍वाले के लड़के की सूरत गड़-सी गयी थी, वे बार-बार उसका चिन्‍तन करने लगे। दूध पीकर पात्र को पृथ्‍वी पर रख दिया और उस ग्‍वाल-कुमार की प्रतीक्षा में बैठे रहे।
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आधी रात्रि बैठे-ही-बैठे बीत गयी, किन्‍तु वह ग्‍वाल-कुमार नहीं लौटा। अब तो पुरी महाराज की उत्‍सुकता उस लड़के को देखने की अधिकाधिक बढ़ने लगी। उसी स्थिति में उन्‍हें कुछ तन्‍द्रा-सी आ गयी। उसी समय सामने वही बालक खड़ा हुआ दिखायी देने लगा।
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उसने हंसते-हंसते कहा- पुरी ! मैं बहुत दिन से तुम्‍हारे आने की प्रतीक्षा कर रहा था। तुम आ गये, यह अच्‍छा ही हुआ। ग्‍वाले के लड़के के वेष में ही तुम्‍हें दुग्‍ध दे गया था। अब तुम मेरी फिर से यहाँ प्रतीक्षा करो। मैं यहाँ इस पास की झाड़ी के नीचे दबा हुआ हूँ।
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पहले मेरा यहाँ मन्दिर था, मेरा पुजारी म्‍लेच्‍छों के भय से मुझे इस झाड़ी के नीचे गाड़कर भाग गया था। तब से मैं इस झाड़खण्‍ड में ही दबा हुआ पड़ा हूँ। अब तुम मुझे यहाँ से निकालकर मेरी विधिवत पूजा करो। मेरा नाम ‘श्री गोपाल’ है, मैंने ही इस गोवर्धन को धारण किया था, तुम इसी नाम से मेरी प्रतिष्‍ठा करना।’
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इतना कहकर वह बालक पुरीक का हाथ पकड़कर उस कुंज के समीप ले गया और उन्‍हें वह स्‍थान दिखा दिया। आँखे खुलने पर पुरी महाराज चारों ओर देखने लगे, किन्‍तु वहाँ कोई नहीं था। प्रात: काल उन्‍होंने ग्राम के लोगों को बुलाकर सब वृतान्‍त कहा और श्रीगोपाल के बताये हुए स्‍थान को उन्‍होंने खुदवाया।
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बहुत दूरी खुदने पर उसमें से एक बहुत ही सुन्‍दर श्‍यामवर्ण की सुन्‍दर सी मन को मोहने वाली मूर्ति निकली। पुरी ने उसी समय ग्रामवासियों से एक छप्‍पर छवाकर उसमें एक ऊँचा-सा आसन बनाया और उसके उपर उस श्री गोपाल की मूर्ति को स्‍थापित किया।
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मूर्ति को स्‍थापित करके उन्‍होंने विधिवत भगवान को पंचामृत से स्‍नान कराया, फिर शीतल जल से भगवान के श्रीविग्रह को खूब मल-मलकर धोया। सुगन्धित चन्‍दन घिसकर सम्‍पूर्ण शरीर पर लेपन किया और धूप, दीप, नैवेद्य तथा वन्‍य फल-फूलों से उनकी यथाविधि पूजा की।
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अब पुरी महाराज ने अन्‍नकूट-उत्‍सव करने का निश्‍चय किया। उस ग्राम में जितने ब्राह्मणों के घर थे, सभी से कह दिया कि वे यथाशक्ति अपने घर से भोजन की सामग्री लेकर अपनी-अपनी स्त्रियों के सहित यहाँ अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भाँति-भाँति के व्‍यंजन बनावें। सभी ब्राह्मणों ने प्रसन्‍नतापूर्वक पुरी की आज्ञा का पालन किया।
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वे अपने-अपने घरों से बड़े-बड़े घड़ों में दूध, दही तथा घृत भर-भरकर पुरी की कुटिया के समीप लाने लगे। ग्‍वालों ने अपने घर का सम्‍पूर्ण दूध दे दिया। दूकान करने वाले बनियों ने चावल, बूरा तथा घृत आदि बहुत-सी भोजन की सामग्री भगवान के भोग के लिये प्रदान की।
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सुपात्र ब्राह्मणों की स्त्रियाँ आ-आकर अपनी-अपनी इच्‍छा के अनुसार सुन्‍दर-सुन्‍दर पदार्थ भगवान के भोग के लिये तैयार करने लगीं। पदार्थो में कच्‍चे-पक्‍के का भेद-भाव नहीं था, जिसे जो भी बनाना आता था और जिसे जो भी अधिक प्रिय था, वही अपनी शुद्ध भावना के अनुसार उसी पदार्थ को भक्तिभाव से बनाने लगी।

कोई तो फिलौरीदार बढ़िया कढ़ी ही बना रही है, कोई मूँग के, उड़द के बड़े ही बनाती है, कोई दही-बड़े, काँजी के बड़े, सोंठ के बड़े बना-बनाकर रख रही है, कोई पूड़ी, कचौड़ी, मालपुआ, मीठे पुआ, बेसन के पुआ, बाजरे की टिकियाँ ही बना रही है, कोई बेसन के लड्डू, मूँग के लड्डू, निकुती के लड्डू, सूजी के लड्डू, चूरमा के लड्डू, काँगनी के लड्डू आदि भाँति-भाँति के लड्डूओं को ही भोग के तैयार कर रही है,
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कोई भाँति-भाँति के साग, खट्टे, मीठे विविध प्रकार के रायते ही बना-बनाकर एक ओर रखती जाती है, कोई छोटी-छोटी बाटियाँ ही बनाकर उन्‍हें घी के डूबो-डूबोकर रखती जा रही है, कोई उन्हे हाथ से मीजकर चूरमा बना रही है, कोई पतली-पतली फुलकियाँ पका रही है, कोई-कोई मोटे-मोटे रोट ही बनाकर भगवान को खिलाना चहाती है, कोई काँगनी का भात बना रही है तो कोई बाजरे का भात रही है।
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कोई रमासों को उबालकर हीं छौंक रही है। कोई चनों को फुलाकर उन्हें घी में तल रही है। कोई अमचूर की, पोदीना की मेवाओं की, इमली की तथा और भी कई प्रकार की चटनियों को पीस-पीसकर पत्थर की कटोरियों में रखती जाती है। कोई मखानों की, चावलों की तथा और भी भाँति-भाँति की खीर ही बना रही है, कोई दूध का खोआ बनाकर पेड़ा, बरफी, खोआ के लड्डू, गुलाबजामुन आदि फलाहारी मिठाइयाँ बना रही है,
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कोई दूध की रबड़ी बना रही है, कोई खुरचन तैयार करके दूसरी ओर रखती जाती है, कोई मट्ठा की महेरी ही भगवान को भोग लगाना चाहती है। कोई सुन्‍दर-सुन्‍दर भाँति-भाँति के चावलों को ही इस प्रकार से राँध रही है। कोई रोटियों को दूध में मीजकर उन्‍हें दूध में फुला रही है। कोई लपसी बना रही है। कोई हलवा, मोहनभोग, दूधलपसी आदि पदार्थो को बनाने मे लगी हुई है।
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इस प्रकार सभी ने अपनी-अपनी इच्‍छा के अनुसार सैकड़ों प्रकार के षट्र्सयुक्‍त भोजन बनाये। उन्‍होंने क्‍या बनाये, श्री गोपाल भगवान ने स्‍वंय उनके हृदय में प्रेरणा बनवाये, नहीं तो भला गांव की रहने वाली वे गंवारों की स्त्रियाँ ऐसे पदार्थो का बनाना क्‍या जानें। भगवान तो सर्वसमर्थ हैं, वे जिसके हाथ से जो भी चाहें करा सकते हैं।
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इस प्रकार सब सामान तैयार होने पर पुरी महाराज ने भगवान का भोग लगाया। पता नहीं भगवान कितने दिनों के भूखे थे, देखते-ही-देखते वे उन सभी पदार्थो को चट कर गये। पुरी महाशय को बड़ा विस्‍मय हुआ। तब भगवान ने हंसकर अपने हाथों से उन पात्रों को छू दिया। भगवान के स्‍पर्शमात्र से ही वे सभी पदार्थ फिर ज्‍यों-के-त्‍यों ही हो गये। पुरी महाराज ने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए सभी व्रजवासी स्‍त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध तथा युवकों को वह प्रसाद बाँटा।
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पुरी महाराज ने भगवान श्रीगोपाल को प्रकट किया है, यह समाचार दूर-दूर तक फैल गया था। हजारों स्‍त्री-पुरुष भगवान के दर्शन के लिये आने लगे। उस दिन भगवान के दर्शन को जो भी आता, उसे ही पेट भरकर प्रसाद मिलता। रात्रिपर्यन्‍त हजारों आदमी आते-जाते रहे, किंतु अन्‍त तक सभी को यथेष्‍ट प्रसाद मिला, कोई भी प्रसाद से विमुख होकर नहीं गया। इस प्रकार उस दिन का अन्‍नकूट उत्‍सव बड़ा ही अदभुत रहा।
(क्रमशः)

*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*परम कथा उस एक की, दूजा नांही आन ।*
*दादू तन मन लाइ कर, सदा सुरति रस पान ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*
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यस्‍मै दातुं चोरयन् क्षीरभाण्‍डं
गोपीनाथ: क्षीरचोराभिधोऽभूत्।
श्रीगोपाल: प्रादुरासीद् वश: सन्
यत्‍प्रेम्‍णा तं माधवेन्‍द्रं नतोऽस्मि॥[१]
([१] जिन्‍हें चोरी से क्षीर का पात्र देने से साक्षात गोपीनाथ भगवान क्षीरचोर कहलाये, जिनके प्रेम के प्रभाव से साक्षात श्रीगोपाल जी प्रकट हुए, उन महामान्‍य श्रीमन्‍माधवेन्‍द्रपुरीजी के चरणों में हम प्रणाम करते हैं। चै. च. म. ली. 4/1)
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भक्तों के सहित आनन्‍द-विहार करते-करते जलेश्‍वर, ब्रह्मकुण्‍ड, मन्‍दार आदि तीर्थो में दर्शन-स्‍नान करते हुए महाप्रभु रेमुणाय नामक तीर्थ में पहुँचे। वहाँ जाकर क्षीरचोर गोपीनाथ भगवान के मन्दिर में जाकर प्रभु ने भगवान के दर्शन किये। प्रभु आनन्‍द में विभोर होकर गोपीनाथ भगवान की बड़े ही करुण-स्‍वर में स्‍तुति करने लगे। स्‍तुति करते-करते वे प्रेम में बेसुध हो गये।
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अन्‍त में उन्‍होंने भगवान के चरण-कमलों में साष्‍टांग प्रणाम किया। उसी समय भगवान् के शरीर से एक पुष्‍पों का बड़ा भारी गुच्‍छा निकलकर ठीक प्रभु के मस्‍तक के ऊपर गिर पड़ा। सभी दर्शनार्थी तथा पुजारी प्रभु के ऐसे भक्तिभाव को देखकर अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हुए और महाप्रभु के प्रेम की सराहना करने लगे। प्रभु ने उस पुष्‍प-गुच्‍छ को भगवान की प्रसादी समझकर भक्ति-भाव से सिर पर धारण कर लिया और बहुत देर तक भक्तों के सहित मन्दिर में संकीर्तन करते रहे। अन्‍त में वहीं पर रात्रि में विश्राम भी किया।
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नित्‍यानन्‍द जी ने पूछा- ‘प्रभो ! इन श्रीगोपीनाथ भगवान का नाम ‘क्षीरचोर’ क्‍यों पड़ा है?’ प्रभु ने हँसकर उतर दिया- ‘आपसे क्‍या छिपा होगा? गोपीनाथ भगवान को क्षीरचोर बनाने वाले आपके पूज्‍यपाद गुरुदेव और मेरे गुरु के भी गुरु श्री मन्‍माधवेन्‍द्रपुरी जी महाराज ही हैं। उनके मुख से आपने ‘क्षीरचोर’ भगवान की कथा अवश्‍य ही सुनी होगी।
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किन्‍तु फिर भी आप अन्‍य भक्तों के कल्‍याण के निमित्त मेरे मुख से इस कथा को सुनना चाहते हैं तो जिस प्रकार मैंने अपने पूज्‍यपाद गुरुदेव श्रीईश्‍वरीपुरी के मुख से सुनी है, उसे आपको सुनाता हूँ। ऐसी कथाओं को तो बार-बार सुनना चाहिये। इन कथाओं के श्रवण से भगवान के पादपद्मों में प्रीति उत्‍पन्‍न होती है और भगवान की भक्तवत्‍सलता के विषय में दृढ़ भावना होती है कि वे अपने भक्तों की इच्‍छा-पूर्ति के निमित्त सब कुछ कर सकते हैं।
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ऐसी कथाओं के सम्‍बन्‍ध में यह कभी भी न कहना चाहिये कि यह तो हमारी सुनी हुई है, इसे फिर क्‍या सुनें। जैसे एक दिन भरपेट भोजन कर लेने पर दूसरे दिन फिर उसी प्रकार के भोजन करने की इच्‍छा होती है, इसी प्रकार भक्तों को भगवान के सम्‍बन्‍ध की कथाएं सुनने में कभी उपेक्षा न करनी चाहिये, वे जितनी भी बार सुनने को मिल सकें, सुननी चाहिये। भक्त और भगवत-सम्‍बन्‍धी कथाओं के सम्‍बन्‍ध में सदा अतृप्‍त ही बने रहना चाहिये।
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अच्‍छा, तो मैं क्षीरचोर श्रीगोपीनाथ के उस पुण्‍य आख्‍यान को आप लोगों के सामने कहता हूँ, आप सभी लोग ध्‍यानपूर्वक सुनें।’ प्रभु की ऐसी बात सुनकर सभी भक्‍त उत्‍सुकतापूर्वक प्रभु के मुख की ओर देखने लगे। और भी दस-बीस भद्र पुरुष वहाँ आ गये थे, वे भी प्रभु के मुख से क्षीरचोर भगवान की कथा सुनने के निमित बैठ गये।
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सबको उत्‍साहपूर्वक अपनी ओर टकटकी लगाये देखकर प्रभु बड़े ही मधुर स्‍वर से कहने लगे- मेरे गुरु के भी गुरु वैकुण्‍ठवासी भगवान माधवेन्‍द्रपुरी की कृष्‍ण-भक्ति अलौकिक थी वे अहर्निश श्रीकृष्‍ण-कीर्तन में ही लगे रहते थे, सोते-जागते वे सदा श्रीहरि के ही रुप का चिन्‍तन करते रहते।
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उनकी जिह्वा को भगवन्‍नाम का ऐसा चश्‍का लग गया था कि वह कभी ख़ाली नहीं रहती, सदा उन जगत्‍पति के मंगलमय मंजुल नामों का ही बखान करती रहती। उनकी इस उत्‍कट भक्ति के ही कारण भगवान को खीर की चोरी करने पड़ी। भगवान माधवेन्‍द्रपुरी एक बार व्रज की यात्रा करते-करते गिरिराज गोवर्धन पर्वत के समीप पहुँचे।
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वहाँ पर गिरि-कानन की कमनीय छटा को देखकर वे मन्‍त्रमुग्‍ध-से बन गये और वहीं गिरिवर के समीप विचरण करने लगे। एक दिन उन्‍होंने गोवर्धन के निकट जंगल में एक वृक्ष के नीचे निवास किया। पुरी महाराज की अयाचित वृत्ति थी। वे भोजन के लिये भी किसी से याचना नहीं करते थे। प्रारब्‍धवशात जो भी कुछ मिल जाता उसे ही सन्‍तोषपूर्वक पाकर कालयापन करते थे।
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उस दिन उन्‍हें दिन भर कुछ भी आहार नहीं मिला। शाम के समय वे उसी वृक्ष के नीचे बैठे भगवन्‍नामों का उच्‍चारण कर रहे थे कि उन्‍हें किसी के पैरों की आवाज सुनायी दी। वे चौंककर पीछे की ओर देखने लगे। उन्‍होंने क्‍या देखा कि एक काले रंग का ग्‍यारह-बारह वर्ष की अवस्‍था वाला बालक हाथ में दूध का पात्र लिये उनकी ओर आ रहा है।
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शरीर का रंग काला होने पर भी बालक के चेहरे पर एक अदभुत तेज प्रकाशित हो रहा था, उसके सभी अंग सुडौल-सुन्‍दर और चित्ताकर्षक थे। उसने बड़े ही कोमल स्‍वर में कुछ हंसते हुए कहा-‘महात्‍मा जी ! भूखे क्‍यों बैठे हो ? लो इस दूध को पीलो।’ पुरी ने पूछा- ‘तुम कौन हो और तुम्‍हें इस बात का कैसे पता चला कि मैं यहाँ जंगल में बैठा हूँ?’
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बालक ने हंसते हुए कहा- ‘मैं जाति का ग्‍वाला हूँ, मेरा घर इसी झाड़ी के समीप के ग्राम में है। मेरी माता अभी जल भरने यहाँ आयी थी, उसी ने आपको यहाँ बैठे देखा था और घर जाकर उसी ने मुझसे दूध दे आने को कह दिया था। इसीलिये मैं जल्‍दी से गौ को दुहकर आपके लिये दूध ले आया हूँ।
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हमारे यहाँ का यह नियम है कि हमारे यहाँ का यह नियम है कि हमारे ग्राम के समीप कोई भुखा नहीं सोने पाता। जो मांगकर खाते हैं, उन्‍हें हम रोटी दे देते हैं और जिनका अयाचित व्रत हैं, उन्‍हें उनकी इच्‍छा के अनुसार दूध-फल अथवा अन्‍न के बने पदार्थ दे जाते हैं। आप इस दूध को पी लें, मैं फिर आकर इस पात्र को ले आऊँगा।’ इतना कहकर वह बालक चला गया।
(क्रमशः)

*९०. महाप्रभु का प्रेमोन्‍माद और नित्‍यानन्‍दजी द्वारा दण्‍ड–भंग*


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*ज्यों घट आत्म एक है, ऐसे होंहि असंख ।*
*भर भर राखै रामरस, दादू एकै अंक ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९०. महाप्रभु का प्रेमोन्माद और नित्यानन्दजी द्वारा दण्ड–भंग*
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प्रभु दौड़ मारकर आगे चलने लगे और दौड़ते-दौड़ते जलेश्वर नामक स्थान में पहुँचे। वहाँ जलेश्वर नामक शिव जी का एक बड़ा भारी मन्दिर है, उस समय बहुत-से वेदज्ञ श्रद्धालु ब्राह्मण उस मन्दिर में धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन की सामग्रियों से शिव जी की स्तुति ही कर रहा था।
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भाँति-भाँति के बाजे बज रहे थे। प्रभु उस पूजन-कृत्य को देखकर बड़े ही संतुष्ट हुए। दण्ड-भंग कर देने के कारण नित्यानन्द जी के प्रति थोड़ा-सा क्रोध किया था, वह शिव जी के दर्शन मात्र से ही जाता रहा। वे आनन्द में निमग्न होकर जोर से शिव जी का कीर्तन करने लगे।
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भावावेश में आकर वे- ‘शिव-शिव शम्भो, हर-हर महादेव, इस पद को गा-गाकर नाचने-कूदने लगे। इनके नृत्य को देखकर सभी दर्शक आश्चर्य के सहित इन्हें चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये। उस समय सभी को इस बात का भान हुआ कि मानो साक्षात भोले बाबा ही सन्यासी वेश से ताण्डव-नृत्य कर रहे हैं।
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प्रभु के दोनों हाथ ऊपर उठे हुए थे, वे मस्त होकर पागल की भाँति प्रेमोन्माद में जोरों से उछल-उछलकर नाच रहे थे। उनके सम्पूर्ण शरीर से पसीनों की धाराएँ बह रही थी। नेत्रों में से श्रावण-भादों की तरह अश्रुओं की वर्षा हो रही थी। वे शरीर की सुध भुलाकर यन्त्र की भाँति घूम रहे थे।
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उसी समय पीछे से नित्यानन्द जी आदि भक्‍त भी मन्दिर में आ पहुँचे और प्रभु को नृत्‍य करते देखकर वे भी प्रभु के ताल-स्‍वर मिलाकर नाचने-गाने लगे। इससे प्रभु का आनन्‍द और भी कई गुना अधिक हो गया, उनके सुख की सीमा नहीं रही। सभी दर्शक प्रभु की ऐसी अपूर्व अवस्‍था देखकर अवाक रह गये।
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इस प्रकार संकीर्तन कर लेने के अनन्‍तर प्रभु ने प्रेमपूर्वक नित्‍यानन्‍द जी का आलिंगन किया और उन पर स्‍नेह प्रदर्शित करते हुए कहने लगे- ‘श्रीपाद ! आप तो मेरे अभिन्‍न-हृदय हैं। आप जो भी करेंगे, मेरे कल्‍याण के ही निमित करेंगे।
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मैंने उस समय भावावेश में आकर जो कुछ कह दिया हो, उसका आप बुरा न मानें। संसार में आपसे बढ़कर मेरा प्रिय और हो ही कौन सकता है- आप मेरे गुरु, माता, पिता और सखा हैं। जो आपका प्रिय है वही मेरा प्रिय है। आप मेरी बातों को कुछ बुरा न मानें।’
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प्रभु के मुख से अपने लिये ऐसे स्‍तुति-वाक्‍य सुनकर नित्‍यानन्‍द जी से कुछ लज्जित-से हुए और संकोच के स्‍वर में कहने लगे- ‘प्रभो ! आप सर्व-समर्थ हैं, जिसे जो चाहें सो कहें, जिसे जितना ऊँचा चढ़ाना चाहें चढ़ा दें। आप तो अपने सेवकों को सदा से ही अपने से अधिक सम्‍मान प्रदान करते रहे हैं।
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यह तो आपकी सनातन रीति है, इस प्रकार प्रेम की बातें होने पर सभी ने विश्राम किया और उस रात्रि में वहीं निवास किया। प्रात: काल नित्‍यकर्म से निवृत होकर प्रभु आगे चलने लगे। मत्त गजेन्‍द्र की भाँति प्रेम-वारुणी के मद में चूर हुए नाचते, कूदते और भक्तों के साथ कुतूहल करते हुए प्रभु आगे चले जा रहे थे, कि इतने में ही इन्‍हें एक वाममार्गी शाक्त पन्‍थी साधु मिला।
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प्रभु की ऐसी प्रेम की उच्‍चावस्‍था देखकर उसने समझा ये भी कोई वाममार्गी साधु हैं, अत: प्रभु से वाममार्गी पद्धति से प्रणाम करके कहने लगा- ‘कहो, किधर-किधर से आ रहे हो? आज तो बहुत दिन में दर्शन हुए?’
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प्रभु ने विनोद के साथ कहा- ‘इधर से ही चले आ रहे हैं, आपका आना किधर से हुआ? कुछ हाल-चाल तो सुनाओ। भैरवी चक्र में खूब आनन्‍द उड़ाता है न ?’ प्रभु की बातें सुनकर और ‘भैरवी चक्र’ तथा ‘आनन्‍द’ आदि वाममार्गियों के सांकेतिक शब्‍दों को सुनकर वह सब स्‍थानों के शाक्तों का सम्‍पूर्ण वृतान्‍त सुनाने लगा।
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प्रभु उसकी बातों को सुनते जाते थे और साथियों की ओर देखकर हंसते जाते थे। अन्‍त में उसने कहा- ‘चलिये, आज हमारे मठ पर ही निवास कीजिये। वह सब मिलकर खूब ‘आनन्‍द’ उड़ावेंगे।’ प्रभु हँसते हुए नित्‍यानन्‍द जी से कहने लगे- ‘श्रीपाद ! ‘आनन्‍द’ उड़ाने की इच्‍छा है? ये महात्‍मा तो शान्तिपुर के रास्‍ते में जैसे आनन्‍दी संन्‍यासी मिले थे, उसी प्रकार के जन्‍तु हैं। आपके पास आनन्‍द की कमी हो तो कहिये।’
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नित्‍यानन्‍द जी ने प्रभु की बात का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वे जोरों से हंसने लगे तब उस वाममार्गी साधु ने कहा- ‘नहीं आप लोग कुछ और न समझें। मेरे मठ में ‘आनन्‍द’ की कुछ कमी नहीं है। आप लोग जितना भी उड़ाना चाहे उड़ावें। चलिये, आप लोग आज मेरे मठ को ही कृतार्थ कीजिये।’
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प्रभु ने हँसते हुए कहा- ‘हाँ-हाँ, ठीक तो हैं, आप आगे चलकर सब ठीक-ठाक करें, हम पीछे से आते हैं। यह सुनकर वह साधु अगे को चला गया। प्रभु की प्रेममयी अवस्‍था देखकर उसने समझा, ये भी कोई हमारी तरह संसारी नशीली चीजों का सेवन करके पागल बनने वाले साधु होंगे। उसे पता नहीं था कि इन्‍होंने ऐसे प्‍याले का पी लिया, जिसे पीकर फिर दूसरे अम्‍ल की जरुरत ही नही पड़ती।
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उसी के नशे में सदा झूमते रहते हैं। कबीरदास जी ने इसी प्‍याले को तो लक्ष्‍य करके कहा है-
कबीर प्‍याला प्रेम का अन्‍तर लिया लगाय।
रोम-रोम में रमि रहा, और अमल का खाय॥
धन्‍य है, ऐसे अ‍मलियों को। ऐसे नशेखोरों के सामने ये संसारी सभी नशे तुच्‍छ और हेय हैं। इस प्रकार अपने सभी साथियों को आनन्दित और सुखी बनाते हुए प्रभु पुरी के पथ को तै करने लगे।
(क्रमशः)

रविवार, 19 अप्रैल 2020

*९०. महाप्रभु का प्रेमोन्‍माद और नित्‍यानन्‍दजी द्वारा दण्‍ड–भंग*

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*प्रेम भक्ति जिन जानी,*
*सो काहे भरमै प्राणी ।*
*हरि सहजैं ही भल मानैं,*
*तातैं दादू और न जानैं ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ३०८)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९०. महाप्रभु का प्रेमोन्‍माद और नित्‍यानन्‍दजी द्वारा दण्‍ड–भंग*
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भोजन करके आगे बढ़े। आगे चलकर पुरी जानेवाली सड़क पर उन्‍होंने कर-गृह देखा। वहाँ पर राजा की ओर से प्रत्‍येक यात्री पर कुछ नियमित शुल्‍क लगता था, तब यात्री आगे जा सकते थे।
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उस समय शुल्‍क लेने वाले अधिकारी यात्रियों से शुल्‍क लेने में इतनी अधिक कठोरता करते थे कि बिना नियमित द्रव्‍य लिये वे किसी को भी आगे नहीं जाने देते थे। यहाँ तक कि वे साधु-सन्‍यासियों तक से भी वसुल करते थे। प्रभु को भी उन लोगों ने आगे जाने से रोका और कहने लगे- ‘बिना नियमित द्रव्‍य दिये तुम आगे नहीं जा सकते।’
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प्रभु इस बात को सुनते ही रुदन करने लगें। उनकी आँखों में से निरन्‍तर अश्रु निकल-निकलकर पृथ्‍वी को गीली कर रहे थे। वे ‘हा प्रभो ! हे मेरे जगन्‍नाथदेव ! क्‍या मैं तुम्‍हारे शीघ्र दर्शन न कर सकूंगा ? क्‍या नाथ ! मुझे तुम्‍हारे दर्शन होंगे?’ ऐसे आर्त वचनों को कह-कहकर रुदन करने लगे। इनके इस हृदयविदारक करुण क्रन्‍दन को सुनकर पाषाण-हृदय अधिकारी को लगा, ऐसा भाव तो किसी भक्त का ही हो सकता है? अवश्‍य ही ये कोई महापुरुष हैं। इन्‍हें जगन्‍नाथ जी जाने से नहीं रोकना चाहिये।’
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यह सोचकर शुल्‍क एकत्रित करने वाला अधिकारी प्रभु के समीप जाकर पूछने लगा- ‘सन्‍यासी बाबा ! तुम इतने अधीर क्‍यों होते हो? तुम्‍हारे साथ कितने आदमी है? तुम सब साथी कितने हो?’ प्रभु ने रोते-रोते अत्‍यन्‍त ही दीनभाव प्रदर्शित करते हुए कहा- ‘हमारा इस संसार में साथी ही कौन हो सकता है? हम तो घर-बार-त्‍यागी विरागी सन्‍यासी हैं, हम तो अकेले ही हैं। हमारा दूसरा कोई साथी नहीं है।’

प्रभु की ऐसी बात सुनकर अधिकारी ने कहा-‘अच्‍छा तो आप जायँ।’ उसकी बात सुनकर प्रभु आगे चलने लगे। थोड़ी दूर चलकर प्रभु अपने घुटनों में सिर देकर रुदन करने लगे। इनके रुदन को सुनकर अधिकारियों ने नित्‍यानन्‍द जी आदि भक्‍तों से इसके कारण की जिज्ञासा की।
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तब नित्‍यानन्‍द जी ने सब हाल बता दिया और कहा- ‘हम चारों प्रभु के साथी हैं, वे हमारे बिना अकेले न जायँगे’ तब अधिकारियों ने इन सबको भी जाने दिया। इस प्रकार उन शुल्‍क एकत्रित करने वाले अधिकारियों के हृदय में अपने प्रेम-भाव को जताते हुए प्रभु अपने साथियों के सहित स्‍वर्णरेखा नदी के तट पर पहुँचे।
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वहाँ पहुँचकर प्रभु तो नित्‍यानन्‍दन जी को प्रतीक्षा में थोड़ी दूर पर जाकर बैठ गये। जगदानन्‍द–दामोदर आदि पीछे-पीछे आ रहे थे। जगदानन्‍द जी के हाथ में प्रभु का दण्‍ड था। उन्‍होंने नित्‍यानन्‍द जी से कहा- ‘श्रीपाद ! यदि आप महाप्रभु के इस दण्‍ड को भली-भाँति पकड़े रहें तो मैं गांव में से भिक्षा कर लाऊं।’
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नित्‍यानन्‍द जी ने कहा- ‘अच्‍छी बात है, मैं दण्‍ड को खूब सावधानी से रखूँगा, तुम आनन्‍द के साथ जाकर भिक्षा कर लाओ।’ यह कहकर नित्‍यानन्‍द जी ने जगदानन्‍द पण्डित के हाथ में से दण्‍ड ले लिया। जगदानन्‍द भि‍क्षा करने चले गये।
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इधर नित्‍यानन्‍द जी ने सोचा- ‘यह दण्‍ड तो प्रभु के लिये एक जंजाल ही है। जिन्‍हें प्रेम में अपने शरीर तक का होश नहीं रहता उन्‍हें दण्‍ड की भला क्‍या अपेक्षा हो सकती है? इसकी देख-रेख को एक और आदमी चाहिये। दण्‍ड का विधान तो साधारण अवस्‍था वाले सन्‍यासी के लिये हैं। महाप्रभु तो प्रेम के अवतार ही हैं, ये तो विधि-निषेध दोनों से ही परे हैं। इसलिये इनके लिये इस दण्‍ड का रखना व्‍यर्थ है।’
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ऐसा सोचकर नित्‍यानन्‍द जी ने उस दण्‍ड के बीच में से तीन टूकड़े कर दिये और उसे तोड़-ताड़कर वहीं फेंक दिया। भिक्षा करके जगदानन्‍द पण्डित लौटे, उन्‍होंने नित्‍यानन्‍द जी के पास दण्‍ड न देखकर आश्‍चर्य के साथ पूछा- ‘श्रीपाद ! आपने दण्‍ड कहाँ रख दिया, कुछ गम्‍भीरता के साथ इधर-उधर देखते हुए धीरे से नित्‍यानन्‍द जी ने उतर दिया- ‘यही कहीं पड़ा होगा, देख लो।’
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जगदानन्‍द जी ने देखा दण्‍ड एक ओर टूटा हुआ पड़ा है। टूटे हुए दण्‍ड को देखकर डरते हुए जगदानन्‍द जी ने कहा- 'श्रीपाद ! यह आपने क्‍या किया ? महाप्रभु के दण्‍ड को तोड़ दिया। उन्‍होंने तो मुझे सावधानी से रखने के लिये दिया था, आपने प्रभु के दण्‍ड को तोड़कर अच्‍छा काम नहीं किया, अब मैं उनसे जाकर क्‍या कहूंगा ?’
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यह कहकर जगदानन्‍दजी बहुत ही दु:खी प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘प्रभो ! नित्‍यानन्‍दजी को दण्‍ड देकर मैं भिक्षा करने के निमित्‍त समीप के ग्राम में गया था, तब तक उन्‍होंने दण्‍ड को तोड़ डाला। इसमें मेरा कुछ भी अपराध नहीं है, यदि मुझे इस बात का पता होता, तो कभी उन्‍हें देकर नहीं जाता।’ इतने में ही नित्‍यानन्‍दन जी भी मुकुन्‍द आदि सहित वहाँ आ पहुँचे।
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तब प्रभु ने प्रेम का रोष प्रकट करते हुए नित्‍यानन्‍द जी से कहा- ‘श्रीपाद ! आपके सभी काम बड़े ही चपलतापूर्ण होतो हैं, भला दण्‍ड-भंग करके आपको क्‍या मिल गया ? आप तो मुझे अपने धर्म से भ्रष्‍ट करना चाहते हैं। सन्‍यासी के पास एक दण्‍ड ही तो परमधन है, उसे आपने अपने उद्धत स्‍वभाव से भंग कर दिया। अब बताइये, कैसे मैं आपके साथ रहकर अपने धर्म का पालन कर सकूंगा ?’
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नित्‍यानन्‍द जी ने बात को टालते हुए कुछ हंसी के भाव में कहा- ‘वह तो बाँस का ही दण्‍ड था, उसके बदले में आप मुझे अपना दण्‍डमात्र बना लीजिये और जो भी उचित दण्‍ड समझें दे लीजिये।’ महाप्रभु ने कहा- ‘वह बाँस का दण्‍ड कैसे था, उसमें सभी देवताओं का अधिष्‍ठान था। आप तो मुझे न जाने क्‍या समझते हैं, अपनी दशा का पता मुझे ही लग सकता है। आपके हाथ में रहने का मुझे यही फल मिला।
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एक दण्‍ड था, वह भी आपने नष्‍ट कर दिया, अब न जाने क्‍या करेंगे। इसलिये मैं अब आप लोगों के साथ न जाऊँगा। या तो आप लोग जायँ या मुझे आगे जाने दें।’ इस पर मुकुन्‍द दत्त ने कहा- ‘प्रभो ! आप ही आगे चलें।’ बस, इतना सुनना था कि प्रभु दौड़ मारकर आगे चलने लगे और दौड़ते-दौड़ते जलेश्‍वर नामक स्‍थान में पहुँचे।
(क्रमशः)

*९०. महाप्रभु का प्रेमोन्‍माद और नित्‍यानन्‍दजी द्वारा दण्‍ड–भंग*

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*जे चित्त चहुँटै राम सौं, सुमिरण मन लागै ।*
*दादू आत्मा जीव का, संसा सब भागै ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९०. महाप्रभु का प्रेमोन्‍माद और नित्‍यानन्‍दजी द्वारा दण्‍ड–भंग*
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पातालं वज्र याहि वासवपुरीमारोह मेरो: शिर:
पारावारपरम्‍परास्‍तर तथाप्‍याशा न शान्‍तास्‍तव ।
आधिव्‍याधिजरापराहत यदि क्षेमं निजं वाञ्छसि
श्रीकृष्‍णेति रसायनं रसय रे शून्‍यै: किमन्‍यै: श्रमै:॥[१]
([१] चाहे तू पाताल में चला जा, चाहे स्‍वर्ग में जाकर निवास कर, चाहे सुमेरु के शिखर पर चढ़कर वहाँ बैठ जा अथवा समुन्‍द्र से पार होकर किसी अपरिचित देश में चला जा। यह सब करने पर भी तेरी आशा शान्‍त न होगी। यदि तू सचमूच अपना कल्‍याण चाहता है, यदि वास्‍तव में तेरी आधि-व्‍याधि और जरा-मृत्‍यु के भय से बचने की इच्‍छा है, तो ‘श्रीकृष्‍णरुपी’ रसायन का सेवन कर। उसी से तेरे सम्‍पूर्ण रोग दूर हो जायँगे। अन्‍य व्‍यर्थ के उपायों से लगे रहने से क्‍या लाभ?)
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छत्रभोग में उस रात्रि को बिताकर प्रभु प्रात:काल अपने नित्‍यकर्म से निवृत हुए। उसी समय रामचन्‍द्र खाँ ने समाचार भेजा कि प्रभु को पार करने के लिये घाट पर नाव तैयार हैं। इस समाचार को पाते ही प्रभु अपने साथियों के सहित नाव पर जाकर बैठ गये।
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मल्‍लाहों ने नाव खोल दी, महाप्रभु आनन्‍द के सहित हरिध्‍व‍नि करने लगे। भक्‍तों ने भी प्रभु की ध्‍वनि में अपनी ध्‍वनि मिलायी। उस गगनभेदी ध्‍वनि की प्रतिध्‍वनि जल में सुनायी देने लगी। दसों दिशाओं में से वही ध्‍वनि सुनायी देने लगी। तब प्रभु ने मुकुन्‍द दत्त से संकीर्तन का पद गाने के लिये कहा।
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मुकुन्‍द अपने मीठे स्‍वर से गाने लगे-
हरि हरये नम: कृष्‍ण यादवाय नम:।
गोपाल गोविन्‍द राम श्रीमधुसूदन॥
अन्‍य भक्‍त भी मुकुन्‍द की ताल में ताल मिलाकर इसी पद का संकीर्तन करने लगे। महाप्रभु आवेश में आकर नाव में ही खड़े होकर नृत्‍य करने लगे।
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नौका नृत्‍य के वेग को न सह सकने के कारण डगमग-डगमग करने लगी। सभी मल्‍लाह घबड़ाने लगे कि हमारी नाव इस प्रकार के नृत्‍य से तो डूब जायगी। उन्‍होंने कहा- ‘सन्‍यासी बाबा ! हमारे ऊपर दया करो, उस पार पहुँचकर जी चाहे जितना नृत्‍य कर लेना। हमारी नाव को पार भी लगने दोगे या बीच में ही डुबा दोगे?’
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इस प्रकार मल्‍लाह कुछ क्षोभ के साथ दीन वचनों में प्रार्थना कर रहे थे, किन्‍तु महाप्रभु किसकी सुनने वाले थे। वे उनकी बातों को अनसुनी करके निरन्‍तर श्रीकृष्‍ण–कीर्तन करते ही रहे। तब तो नाविकों को बड़ा भारी आश्‍चर्य हुआ कि यह सन्‍यांसी हमारी बात तक नहीं सुनता और उसी प्रकार प्रेम में विह्वल होकर नृत्‍य कर रहा है।
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उन्‍होंने कुछ भय दिखाते हुए विवशता और कातरता के स्‍वर में कहा- ‘महाराज ! आप हमारी बात को मान जाइये। नाव में इस प्रकार उछल-उछलकर नृत्‍य करना ठीक नहीं है। आप देखते नहीं, उस पार घोर जंगल है, उसमें बड़े-बड़े खूंखार भेड़िये तथा जंगली सूअर रहते हैं। आपकी आवाज को सुनकर वे दौड़े आवेंगे, जल के भीतर मगर और घडियाल हैं, नदी में चारों ओर नावों पर चढ़कर डाकू चक्‍कर लगाते रहते हैं, वे जिसे भी पार होते देखते हैं, उसे ही लूट लेते हैं। कृपा करके आप बैठ जाइये और अपने साथ हमें भी विपत्ति के गाल में न डालिये।’
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उनकी ऐसी कातर वाणी सुनकर मुकुन्‍द दत्त आदि तो कीर्तन करने से बंद हो गये, किन्‍तु भला प्रभु कब बंद होने वाले थे। वे उसी प्रकार की‍र्तन करते ही रहे और अन्‍य साथियों को भी कीर्तन करने के लिये उत्‍साहित करने लगे। प्रभु के उत्‍साहपूर्ण वाक्‍यों को सुनकर फिर सब-के-सब कीर्तन करने लगे। धन्‍य हैं, ऐसे श्रीकृष्‍ण प्रेम को, जिसके आनन्‍द में प्राणों तक की भी परवा न हो।
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अमृत के सागर में डूबने का भय कैसा? श्रीकृष्‍ण नाम तो जीवों को आधि-व्‍याधि तथा सम्‍पूर्ण भयों से मुक्‍त करने वाला हैं। उसके सामने मगर, घड़ियाल, भेड़िया तथा डाकुओं का भय कैसा ? राम-नाम के प्रभाव से तो विष भी अमृत बन जाता है। हिंसक जन्‍तु भी अपना स्‍वभाव छोड़कर प्रेम करने लगते हैं।
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प्रभु को इस प्रकार कीर्तन में संलग्‍न देखकर नाविक समझ गये कि ये कोई असाधारण महापुरुष है, इन्‍हे कीर्तन से रोकना व्‍यर्थ हैं,जहाँ पर ये विराजमान हैं, वहाँ किसी प्रकार का अमंगल हो ही नहीं सकता। यही सोचकर वे चूप हो गये। फिर उन्‍होंने प्रभु से कीर्तन करने के लिये मना नहीं किया। प्रभु उसी प्रकार अपने अश्रुओं की धाराओं को गंगा जी के प्रवाह में मिलाते हुए कीर्तन करते रहे।
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उसी कीर्तन के समारोह में नाव प्रयाग घाट पर आ लगी। प्रभु ने अपने साथियों के सहित नाव से उतरकर प्रयागघाट पर स्‍नान किया और फिर आगे बढ़ें। अब उन्‍होंने गौड़-देश को छोड़कर उड़ीसा-देश की सीमा में प्रवेश किया। आज प्रभु ने अपने साथियों से कहा- ‘तुम लोग सब यहीं बैठो, आज मैं अकेला ही भिक्षा करने जाऊँगा।’
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प्रभु जी की बात को टाल ही कौन सकता था ? सबने इस बात को स्‍वीकार किया। प्रभु अपने रंगे वस्‍त्र को झोली बनाकर भिक्षा मांगने के लिये चले। यह हम पहले ही बता चुके हैं कि उड़ीसा तथा बंगाल में बने-बनाये अन्‍न की भिक्षा देने की परिपाटी नहीं है। अब तो कुछ-कुछ लोग सीखने भी लगे है। भट्टाचार्य ब्राह्मण संन्‍यासी को बने-बनाये सिद्ध अन्‍न की भिक्षा देने लगे हैं।
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पहले तो लोग सुखा ही अन्‍न भिक्षा में देते थे। ग्रामवासी स्‍त्री-पुरुष प्रभु की झोली में चावल दाल और चिउरा आदि डालने लगे। प्रभु जिसके भी द्वार पर जाकर ‘नारायण-हरि’ कहकर आवाज लगाते वही बहुत-सा अन्‍न लेकर उन्‍हें देने के लिये दौड़ा आता।
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उनके अद्भुत रुप-लावण्‍य को देखकर सभी स्‍त्री-पुरुष चकित रह जाते और एकटक भाव से प्रभु को ही निहारते रहते। उनके चेहरे में इतना अधिक आकर्षण था कि जो भी एक बार उनके दर्शन कर लेता वहीं अपना सर्वस्‍व प्रभु के ऊपर निछावर कर देने की इच्‍छा करता। जिसके घर में जो भी उत्तम पदार्थ होता, वही लाकर प्रभु की झोली में डाल देता।
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इस प्रकार थोड़ी ही देर में प्रभु की झोली भर गयी। विवश होकर कई आदमियों की भिक्षा लौटानी पड़ी। इससे प्रभु को भी कुछ दु:ख-सा हुआ। वे अपनी भरी हुई झोली को लेकर बाहर बैठे हुए अपने भक्‍तों के समीप आये। नित्‍यानन्‍द जी भरी हुर्इ झोली को देखकर हंसने लगे। अन्‍त में जगदानन्‍दजी ने प्रभु से झोली लेकर भोजन बनाया और सभी ने साथ बैठकर बड़े ही आनन्‍द के सहित उस महाप्रसाद को पाया।
(क्रमशः)

*८९. पुरी के पथ में*

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*राम रसायन भर भर पीवै,*
*सदा सजीवन जुग जुग जीवै ॥*
*राम रसायन त्रिभुवन सार,*
*राम रसिक सब उतरे पार ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ६०)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*८९. पुरी के पथ में*
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इस प्रकार अम्‍बुलिंग घाट पर पहुँचकर प्रभु ने साथियों सहित स्‍नान किया और भक्‍तों को अम्‍बुलिंग शिव जी के सम्‍बन्‍ध में कथा सुनाने लगे। प्रभु ने कहा- जब महाराज भगीर‍थ स्‍वर्ग से गंगा जी को ले आये, तब उनके शोक में विकल होकर शिव जी यहाँ जल में गिर पडे। गंगा जी के प्रेम के कारण यहाँ शिव जी के प्रेम को जानती थीं, उन्‍होंने यहीं आकर शिव जी की पूजा की और जल में रहने की प्रार्थना की।
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गंगा जी के प्रेम के कारण यहाँ शिव जी जल में ही निवास करते हैं, इसीलिये ये अम्‍बुलिंग कहाते हैं, इनके दर्शन से कोटि जन्‍मों के पापों का क्षय हो जाता हैं।’ इस प्रकार शिव जी का माहात्‍म्‍य सुनाकर प्रभु फिर प्रेम में विह्रल होकर नृत्‍य करने लगे।
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उसी समय उस प्रान्‍त के शासक राजा रामचन्‍द्र खाँ भी वहाँ आ पहुँचे। इस बात को हम पहले ही बता चुके है कि गौड़ाधिपति की ओर से बड़े-बड़े लोगों को बहुत-से गांवों का ठेका दिया जाता था और उन्‍हें बादशाह की ओर से मजूमदार, खान अथवा राजा की उपाधि भी दी जाती थी। रामचन्‍द्र खां गौड़ाधिप के अधीनस्‍थ गौड़देशीय सीमा प्रान्‍त के ऐसे ही राजा थे।
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रामचन्‍द्र खां जा‍ति के कायस्‍थ थे और शाक्त-धर्म को मानने वाले थे। उनका जीवन जिस प्रकार साधारण विषयी धनी पुरुषों का होता है, उसी प्रकार का था, किन्‍तु वे भाग्‍यशाली थे, जिन्‍हें महाप्रभु की थोड़ी-बहुत सेवा करने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ। प्रभु के स्‍थान पर पधारने का समाचार सुनकर रामचन्‍द्र खां पालकी से उतरकर उनके दर्शन के लिये गये।
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उस समय आनन्‍द में विभोर हुए ‘महाप्रभु गदगद कण्‍ठ से कृष्‍ण का कीर्तन करते हुए रुदन कर रहे थे। रामचन्‍द्र खां प्रभु के तेज और प्रभाव से प्रभावान्वित हो गये और उन्‍होंने दूर से ही प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया। किन्‍तु प्रभु तो बाह्यज्ञान शून्‍य हो रहे थे।
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वे तो चक्षुओं को आवृत करके प्रेमामृत का पान कर रहे थे। उन्‍हें किसी के नमस्‍कार-प्रणाम का क्‍या पता। प्रभु के सा‍थियों ने प्रभु को सचेत करते हुए राजा रामचन्‍द्र खाँ का परिचय दिया। प्रभु ने उनका परिचय पाकर प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- ओह ! आपका ही नाम राजा रामचन्‍द्र खाँ है, आपके अकस्‍मात खूब दर्शन हुए !’
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दोनों हाथो को अंजलि बांधे हुए रामचन्‍द्र खाँ ने कहा- प्रभो ! इस विषयी कामी पुरुष को ही रामचन्‍द्र खाँ के नाम से पुकारते हैं। आज मैं अपने सौभाग्‍य की सराहना नहीं कर सकता, जो मुझ-जैसे संसारी गर्त में सने हुए विषयी पामर को आपके दर्शन हुए। आपके दर्शन से मेरे सब पाप क्षय हो गये। अब आप मेरे योग्‍य जो भी आज्ञा हो, उसे बताइये।’
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‘प्रभु ने कहा- ‘रामचन्‍द्र ! हम अपने प्राणवल्‍लभ से मिलने के लिये व्‍याकुल हो रहे हैं। पुरी में जाकर हम अपने हृदयमण के दर्शन करके जीवन को सफल बना सकें, तुम वैसा ही उद्योग करो। हमें घाट से उस पार पहुँचाने का प्रबन्‍ध करो। जिस प्रकार हम गंगा जी को पार कर सकें वही काम तुझे इस समय करना चाहिये।’
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हाथ जोड़े हुए रामचन्‍द्र खाँ ने कहा- ‘प्रभो ! इस युद्धकाल में गौड़देशीय लोगों को उस पार उतारना बड़ा ही कठिन कार्य हैं। बादशाह की ओर से मुझे कठिन आज्ञा है कि जिस किसी पुरुष को वैसे ही पार न उतारा जाय। फिर भी मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी आपको पार उतारूँगा। आज आप कृपा करके यहीं निवास कीजिये, कल प्रात: मैं आपके पार होने का यथाशक्ति अवश्‍य ही प्रबन्‍ध कर दूँगा।’
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रामचन्‍द्र खाँ की बात को प्रभु ने स्‍वीकार कर लिया और छत्रभोग नगर में जाकर प्रभु ने एक भाग्‍यवान ब्राह्मण के यहाँ निवास किया। रात्रिभर प्रभु अपने साथियों के सहित संकीर्तन करते रहे। संकीर्तन की सुमधुर ध्‍वनि से वह सम्‍पूर्ण स्‍थान परम पावन बन गया। वहाँ पर चारों ओर भगवन्‍नाम की ही गूंज सुनायी देने लगी।
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प्रभु के संकीर्तन को सुनने के लिये छत्रभोग के बहुत से नर-नारी एकत्रित हो गये और वे भी प्रभु के साथ ताली बजा-बजाकर की‍र्तन करने लगे। रामचन्‍द्र खाँ भी उस संकीर्तनरसामृत का आस्‍वादन करके अपने जीवन को धन्‍य किया। इस तरह रात्रि भर संकीर्तन के प्रमोद मे ही प्रभु ने वह रात्रि बितायी।
(क्रमशः)

*८९. पुरी के पथ में*


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*ऐसा जनम अमोलिक भाई,*
*जामें आइ मिलै राम राई ॥टेक॥*
*जामें प्राण प्रेम रस पीवै,*
*सदा सुहाग सेज सुख जीवै ॥१॥*
*आत्मा आइ राम सौं राती,*
*अखिल अमर धन पावै थाती ॥२॥*
*प्रकट दर्शन परसन पावै,*
*परम पुरुष मिलि मांहि समावै ॥३॥*
*ऐसा जन्म नहीं नर आवै,*
*सो क्यों दादू रतन गँवावै ॥४॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ३४)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*८९. पुरी के पथ में*
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जब तक उन्‍हें प्रभु के पैरों से उड़ी हुई धूलि और जगदानन्‍द के हाथ प्रभु का दण्‍ड दिखायी देता रहा तब तक तो वे एकटक भाव से देखते रहे, अन्‍त में जब प्रभु अपने साथियों के सहित एकदम अदृश्‍य हो गये, तब खिन्‍न-मन से देखते रहे, अन्‍त में जब प्रभु अपने साथियों के सहित एकदम अदृश्‍य हो गये, तब खिन्‍न-मन से माता को आगे करके भक्‍तों के सहित अद्वैताचार्य अपने घर की ओर लौट आये और श्रीवास आदि भक्‍त उसी समय माता को साथ लेकर नवद्वीप के लिये चले गये।
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इधर महाप्रभु बन्‍धन से छूटे हुए मत गजेन्‍द्र की भाँति द्रुत गति से गंगा जी के किनारे-किनारे चले जा रहे थे। उनके पीछे नित्‍यानन्‍द जी आदि भक्‍त भी प्रभु का अनुसरण कर रहे थे। सब-के-सब गृहत्‍यागी विरागी और अल्‍पवयस्‍क युवक ही थे।
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सभी के हृदय में त्‍याग-वैराग्‍य की अग्नि प्रज्‍वलित हो रही थी। प्रभु ने उन सबके त्‍याग-वैराग्‍य की परीक्षा करने के निमित सभी से पूछा- 'तुम लोग मुझसे सच-सच बताओ, तुमने अपने साथ क्‍या-क्‍या सामान बांधा है और किस-किसने तुम्‍हें मार्ग-व्‍यय के लिये कितना-कितना द्रव्‍य दिया है?'
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प्रभु के ऐसे प्रश्‍न को सुनकर सभी ने दीनभाव से कहा- प्रभो ! हम भला, आपकी आज्ञा के बिना कोई वस्‍तु साथ कैसे ले सकते थे और किसी के द्रव्‍य को आपके बिना पूछे कैसे स्‍वीकार कर सकते थे? आप हमारे सम्‍पूर्ण शरीर को देख लें, हमारे पास कुछ भी नहीं है और न हमसें से किसी ने द्रव्‍य ही साथ में बाँधा।'
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महाप्रभु उनके ऐसे निष्‍कपट, सरल और नि:स्‍पृहतापूर्ण उतर को सुनकर बड़े ही प्रसन्‍न हुए। उन्‍होंने प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए कहा- मैं तुम लोगों से अत्‍यन्‍त ही प्रसन्‍न हूँ। तुमने साथ में द्रव्‍य न बांधकर अपनी नि:स्‍पृहता का परिचय दिया है। नि:स्‍पृहता ही तो त्‍याग का भूषण है।
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जो किसी से धन की इच्‍छा करके संग्रह करता है, वह कभी त्‍यागी हो ही नहीं सकता। त्‍यागी के लिये तो भोजन की चिन्‍ता करनी ही न चाहिये। उसे तो प्रारब्‍ध के उपर छोड़ देना चाहिये। जो प्रारब्‍ध में होगा वह अवश्‍य मिलेगा, फिर चाहे तुम मरुभुमि के घोर बालुकामय प्रदेश में ही जाकर क्‍यों न बैठ जाओ।
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और भाग्‍य में नहीं हैं, तो भोगों के बीच में रहते हुए भी उन्‍हें उन से वंचित रहना पड़ेगा। चाहे जितना धनी क्‍यों न हो, उसके पास कितनी भी भोज्‍य-सामग्री क्‍यों न हो, जिस दिन उसके भाग्‍य में न होगी, उस दिन वह पास में रखी रहने पर भी उन्‍हें नहीं खा सकता। या तो बीमार हो जायगा या किसी पर नाराज होकर खाना छोड़ देगा, अ‍थवा दूसरा आदमी आकर उसे खा जायगा।
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सारांश यह है कि हमें भोग भाग्‍य के ही अनुसार प्राप्‍त हो सकेंगे। फिर किसी से मांगकर संग्रह क्‍यों करना चाहिये। भूख लगने पर घर-घर से मधुकरी कर लो। यही त्‍यागी का परम धर्म हैं।’
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इस प्रकार अपने साथियों को त्‍याग, वैराग्‍य और भक्ति का तत्त्व समझाते हुए सायंकाल के समय आठिसारा नामक ग्राम में पहुँचे और वहाँ परम भाग्‍यवान अनन्‍त पण्डित नामके एक ब्राह्मण के घर ठहरे। प्रभु के दर्शन से वह कृतार्थ हो गया और उसने प्रभु को साथियों सहित भिक्षा आदि कराके उनकी विधिवत सेवा-पूजा की।
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प्रात:काल वहाँ से चलकर खाड़ी नामक ग्राम के समीप छत्रभोग तीर्थ में पहुँचे। यहाँ पर गंगा जी के किनारे एक अम्‍बुलिंग नामक जलमग्‍न शिव है। आज कल तो छत्रभोग और अम्‍बुलिंग शिव जी गंगा जी से दूर पड़ गये हैं, उस समय गंगा जी की शेष सीमा यहीं पर थी। यहीं पर त्रिलोकी पावनी भगवती भागीरथी सहस्‍त्र धाराओं का रुप धारण करके समुद्र में मिलती थी।
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गंगा जी के इस पार छत्रभोग, पीठस्‍थान और सुन्‍दर नगर था। यही गौड़-देश की सीमा समाप्‍त होती थी। गंगा जी के उस पार उड़ीसा-देश की सरहद थी और उसी पर जयपुर-माजिलपुर उड़ीसा के महाराज की अन्तिम सीमा के नगर थे। इन दोनों स्‍थानों में तीन-चार कोस का अन्‍तर था।
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गौड़-देश और उड़ीसा-देश की सीमा को भगवती भागीरथी ही पृथक करती थीं। यह हम पहले ही बता चुके हैं कि वह युद्ध का समय था। जिधर देखो उधर ही युद्ध छिड़ा हुआ है। गौड़देश के बादशाह और उड़ीसा के तत्‍कालीन महाराज प्रताप रुद्र के बीच मे तो लड़ाई-झगड़ा होता रहता था। इसी कारण जगन्‍नाथ जी जाने वाले यात्रियों को गंगा पार होने में बड़ा कष्‍ट होता था।
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गौड़-देश के अधिपति की आज्ञा थी कि उधर से कोई भी पुरुष इधर न आने पावे। उधर उड़ीसा के शासक बंगालियों पर सन्‍देह करते। जो भी पार आता युद्ध के समय सब जगह एक राज्‍य की सीमा से दूसरे राज्‍य की सीमा में जाने पर सभी लोगों को बड़े-बड़े कष्‍ट सहने पड़ते हैं।
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दोनों देशों के शासक सदा शत्रुओं के मनुष्‍यों से शंकित रहते हैं। इसके अतिरिक्‍त पार उतारने वाले बिना उतराई लिये लोगों को पार उतारते ही नहीं थे। बहुत-से पुरी के यात्री उस पार जाने के लिये पड़े हुए थे। प्रभु भी अपने साथियों के सहित वहाँ पहुँच गये। मुकुन्‍ददत अपने सुरीले कण्‍ठ से कृष्‍ण-कीर्तन कर रहे थे।
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प्रभु उनके मुख से भगवान के मधुर नामों को सुनकर आनन्‍दन में विह्रल हो नृत्‍य कर रहे थे, उनके दोनों नेत्रों में से दो धाराएं निकलकर समुद्र में लीन होने वाली गंगा जी के वेग को और अधिक बढ़ा रही थीं। प्रभु की ऐसी अद्भुत अवस्‍था देखकर घाट पर के बहुत-से आदमी वहाँ आकर एकत्रित हो गये। सभी प्रभु के दर्शन से अपने को कृतार्थ मानने लगे।
(क्रमशः)


*८९. पुरी के पथ में*


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*दादू सुख सांई सौं, और सबै ही दुख ।*
*देखूँ दर्शन पीव का, तिस ही लागे सुख ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*८९. पुरी के पथ में*
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मा याहीत्‍यपमंगलं वज्र सखे स्‍नेहेन हीनं वच-
स्तिष्‍ठेति प्रभुता यथारुचि कुरुष्‍वैषाप्‍युदासीनता।
नो जीवामि विना त्‍वयेति वचनं सम्‍भाव्‍यते वा न वा
तन्‍मां शिक्षय नाथ यत्‍सुमुचितं वक्‍तुं त्‍वयि प्रस्थिते॥[१]
([१] अपने प्राणप्‍यारे के परदेश प्रयाण करते समय उसके वियोग से उतपन्‍न हुई वेदना को व्‍यक्‍त करती हुई नायिका पति से कह रही है, विदा के अन्तिम समय का वर्णन है। प्रियतम पूछते हैं - अच्‍छा, जाउं? उतर देती है - 'मत जाओ' इस अमंगलसूचक शब्‍द को यात्रा के शुभ मुहुर्त में कैसे मुख से निकालूं ? यह कहूँ कि 'अच्‍छा जाओ' तो यह स्‍नेहहीन शब्‍द है। यदि कहूँ 'रुक जाओ' तो इसमें प्रभुता प्रदर्शित होती है। और यह कह दूं कि 'जैसी आपकी इच्‍छा हो वैसा करें' तो इससे उदासीनता प्रकट होती है। यदि यह कह दूं कि 'तुम्‍हारे बिना मैं जीवित न रह सकूंगी' तो पता नहीं तुमको इस बात पर विश्‍वास हो अथवा न हो। इसीलिये मेरे प्राणनाथ ! तुम्‍हीं मुझे भिक्षा दो कि तुम्‍हारे प्रस्‍थान के समय क्‍या कहना उपयुक्‍त होगा, इस समय मैं किस वाक्‍य का प्रयोग करुं?)
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गोस्‍वामी तुलसीदास जी ने सज्‍जन और दुर्जन के समागम की तुलना करते हुए कहा है-
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं ।
मिलत एक दारुन दुख देहीं ॥
सचमुच अपने प्रियजन के बिछोह के समय तो सहृदय पुरुषों को मरण-समान ही दु:ख होता है।
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जिसके साथ इतने दिनों तक हास-परिहास, भोजन-पान आदि किया, जो निरन्‍तर अपने सहवास-सुख का आनन्‍द पहुँचाता रहा, वही अपना प्‍यारा प्रियतम आज सहसा हमसे न जाने कब तक के लिये पृथक हो रहा है, इस बात के स्‍मरण मात्र से सहृदय सज्‍जनों के हृदय में भारी क्षोभ उत्‍पन्‍न होने लगता है। किन्‍तु उस दु:ख में भी मीठा-मीठा मजा हैं, उसका आस्‍वादन भावुक प्रेमी पुरुष ही कर सकते हैं।
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संसारी स्‍वार्थपूर्ण पुरुषों के भाग्‍य में वह सुख नही बदा है। दस दिनों तक भक्‍तों के चित को आनन्दित कराते रहने के अनन्‍तर आज प्रभु शान्तिपुर को परित्‍याग करके पुरी के पथिक बन जायँगें, इस बात के स्‍मरण मात्र से सभी परिजन और पुरजनों के हृदय में प्रभु के वियोगजन्‍य दुख की पीड़ा-सी होने लगी। सभी के चेहरों पर विषण्‍णता छायी हुई थी।
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प्रभु ने कुछ अन्‍यमनस्‍क भाव से अपने ओढ़ने का रँगा वस्‍त्र उठाया, लंगोटी को कमर से बांध लिया और छोटी-सी साफी सिर से लपेट ली। एक हाथ में दण्‍ड लिया और दूसरे में कमण्‍डलु लेकर प्रभु उस बैठक से बाहर हुए । प्रभु को यात्री के वेष में देखकर उपस्थित सभी भक्‍त फूट-फूटकर रोने लगे। वृद्धा शची माता का तो दिल ही धड़कने लगा।
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जगदानन्‍द ने प्रभु के हाथ से दण्‍ड ले लिया और दामोदर पण्डित ने कमण्‍डलु। अब प्रभु के दोनों हाथ खाली हो गये। उन दोनों हाथों से वृद्धा माता के चरणों को स्‍पर्श करते हुए प्रभु ने गदगद कण्‍ठ से कहा - 'माता ! मुझे ऐसा आशीर्वाद दो कि मैं अपने सन्‍यांस-धर्म का विधिवत पालन कर सकूँ।' पता नहीं उस समय पुत्र स्‍नेह से दु:खी हुई माता को इतना साहस कहाँ से आ गया?
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उसने अपने प्‍यारे पुत्र के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा - बेटा ! तुम्‍हारा पथ मंगलमय हो, वायु तुम्‍हारे अनुकुल रहे, तुम अपने धर्म का विधिवत पालन कर सको।' इतना कहते-कहते ही माता का गला भर आया, आगे वह और कुछ न कह सकी। उसी अवस्‍था में रोती हुई अपनी माता की प्रभु ने प्रदक्षिणा की और दोनों हाथों को जोड़कर वे नि:स्‍पृहभाव से गंगा जी के किनारे-किनारे पुरी की ओर चल पड़े। सैकड़ों भक्‍त आंसू बहाते हुए और आर्तनाद करते हुए प्रभु के पीछे-पीछे चले।
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शचीमाता भी लोक-लाज की कुछ भी परवा न कर रोती हुई पैदल ही अपने प्राणप्‍यारे पुत्र के पीछे-पीछे चलीं। जिस प्रकार नि:स्‍पृह बछड़ा माता को छोड़कर पुरी के पथ में दूसरी ओर जा रहा हो और उसकी माता वृद्धा गाय रंभाती हुई उसके पीछे-पीछे दौड़ रही हो, इसी प्रकार शरीर की सुधि भुलाकर शची माता प्रभु के पीछे क्रन्‍दन करती हुई भक्‍तों के आगे-आगे चल रही थीं।
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उनके क्रन्‍दन से कलेजा फटने लगता था। उनके सफेद बाल बिखरे हुए थे, आँसुओं से वक्ष:स्‍थल भींगा हुआ था। वे पछाड़ खाती हुई प्रभु के पीछे-पीछे चल रही थीं। प्रभु माता को देखते हुए भी संकोचवश उनसे आँखे नहीं मिलाते थे। बूढ़े अद्वैताचार्य भी जोरों से बच्‍चों की भाँति रुदन कर रहे थे। इस प्रकार के रुदन को सुनकर प्रभु अधीर हो उठे।
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वे चलते-चलते ठहर गये और आँखों से आँसू बहाते हुए अद्वैताचार्य जी से कहने लगे - आचार्यदेव ! इतने वृद्ध होकर जब आप ही इस प्रकार बालकों की तरह रुदन कर रहे हैं तो फिर भक्‍तों को और कौन धैर्य बँधावेगा? आपका मुझ पर सदा पुत्र की भाँति स्‍नेह रहा है। यह मैं जानता हूँ कि मेरे वियोग से आपको अपार दु:ख हुआ है, किन्‍तु आप तो सर्वसमर्थ हैं।
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आपके साहस के सामने मेरा वियोगजन्‍य दु:ख कुछ भी नहीं है। आप अब मेरे कहने से शान्तिपुर लौट जायँ। आप यदि मेरे साथ चलेंगे तो यहाँ माता की तथा भक्‍तों की देख-रेख कौन करेगा। आप मेरे काम के लिये शान्तिपुर में रह जाइये। मैं माता को तथा भक्‍तों को आप के हाथ में सौंपता हूँ। आप ही सदा से इनके रक्षक रहे हैं और अब भी इन सबका भार आपके ही ऊपर है। यह करुणापूर्ण दृश्‍य अब और अधिक मुझसे नहीं देखा जाता। अब आप इन सभी भक्‍तों के सहित लौट जायँ।'
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आचार्य ने प्रभु की आज्ञा का पालन किया। वे वहीं ठहर गये। उन्‍होंने भूमि में लोटकर प्रभु के लिये प्रणाम किया। प्रभु ने उनकी चरण-धूली अपने मस्‍तक पर चढ़ायी और माता के चरणों की वन्‍दना करते हुए वे उन सबको पृथ्‍वी पर ही पड़ा छोड़कर जल्‍दी से आगे के लिये दौड़ गये।
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नित्‍यानन्‍द, दामोदर, जगदानन्‍द और मुकुन्‍ददत्त भी सभी लोगों से विदा होकर प्रभु के पीछे-पीछे दोड़ने लगे और सब लोग वहीं पड़े-के-पड़े ही रह गये। जब भक्‍तों ने देखा कि प्रभु तो हमें छोड़कर चले ही गये तब उन्‍होंने और अधिक प्रभु का पीछा नहीं किया। वे खड़े होकर गंगा जी की ओर देखते रहे।
(क्रमशः)