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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

*४६. परमारथ कौ अंग १७/२०*

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*४६. परमारथ कौ अंग १७/२०*
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सौंज सकल ले राखिये, सुख का सागर मांहि ।
जगजीवन तौं जीविये, कोई दुख व्यापै नांहि ॥१७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सब साधन रखें जो सच्चे साधक को रखने चाहिए तभी अथाह सुख मिलता है संत कहते हैं इस प्रकार जीवन से कोइ दुख नहीं व्यापता है ।
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नर निरमल तेई गिनौ, जे लहैं पराई पीर३ ।
कहि जगजीवन रांमजी, धनि ते भांनै भीर४ ॥१८॥
(३. पीर=पीड़ा, दुःखमय अनुभूति)   {४.भीर=भीड़(विपत्ति,संकट)} 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि वे ही मनुष्य निर्मल हैं जो पराई पीड़ा जानते हैं । तभी परमात्मा उनके हर कष्ट दूर करते हैं ।
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कहि जगजीवन रांमजी, पररमारथ हरि नांम ।
कहि जगजीवन विणजता५, सरि आवै सब काम ॥१९॥
(५. विणजतां=व्यापार करते हुए)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सबसे अच्छा व्यापार प्रभु का नाम है जिसके व्यापार से सब काम पूर्ण होते हैं ।
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धरम धजा परमारथी, धर्म नांव सत पारि ।
कहि जगजीवन बैठि तहां, निरमल नूर निहारि६ ॥२०॥ 
(६. निहारि=निरीक्षण कर)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म की ध्वजा यानि धर्म में अग्रणी परमार्थी ही हैं । इससे ही सत्य पार पहुंच पाता है । और धर्म धारण कर सत्य का आलम्बन ले कर ही जीव जीव प्रभु के तेज के दर्शन कर पाते हैं ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

*४६. परमारथ कौ अंग १३/१६*

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*४६. परमारथ कौ अंग १३/१६*
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परमारथ जिस देह मैं, प्रेम पिवै अरु पाइ ।
कहि जगजीवन रांम रटि, रांमहि मांहि समाइ ॥१३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिस देह में परमार्थ द्वारा प्रेम बांटा व ग्रहण किया जाता है वे जीव स्मरण द्वारा राम में ही समा जाते हैं । उनपर प्रभु कृपा होती है ।
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जगजीवन बैठे सकल, करम किया५ की नालि६ ।
साध निरंतर नांम ले, हरि भजि रांम संभालि ॥१४॥
(५. कीया=कृत कर्म) (६. नालि=साथ)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो कर्म व सभी क्रियाओं करते हुये भी स्मरण नहीं भूलते वे ही साधुजन राम स्मरण निष्ठा पूर्वक सम्भाले हुये हैं ।
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जगजीवन सत बांटिये, सत ही मांहि संतोष ।
जहां की तहां पहुँचावतां, नहिं लिया१ दिया२ को दोष ॥१५॥
(१. लिया=ग्रहण किया) (२. दिया=प्रदत्त)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सत्य ही बरतिये सत्य में ही संतोष है जिसका है उस तक देने में कोइ दोष नहीं है नाम प्रभु का लेकर प्रभु तक ही अर्पण करना है ।
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रिधि सिधि जन के रांम से, प्रेम पिवै अरु पाइ ।
ए खाणां ए पीवणां, जगजीवन तहां ताहि ॥१६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो रिद्धि व सिद्धि सिद्धियां है वे भी प्रभु भक्तों की सेवा में हैं । प्रेम पीती व पिलाती हैं । उनका यह भी भोजन है । अर्थात प्रेम से ही सब सिद्ध या प्राप्त होती हैं ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 21 मार्च 2025

*४६. परमारथ कौ अंग ९/१२*

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*४६. परमारथ कौ अंग ९/१२*
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मैं मेरी सब कोइ करैं, हरि हरि करै न कोइ ।
जगजीवन हरि हरि करै, बड़ा सबन थैं सोइ ॥९॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि मैं ओर मेरा सब कोइ करते हैं यह मेरा है मैं इसका हूँ । हरि मेरे हैं ऐसा कोइ नहीं करता जो हरि हरि करते हैं वे ही जन सबसे बड़े है ।
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परमारथ जिस देह मैं, परम पुरिष सौं रत्त ।
कहि जगजीवन भगतिमत, (सोइ) कबीर गोरख दत्त ॥१०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो देह परमार्थ चाहती है और प्रभु भजन में लीन है । वह भक्ति युक्त बुद्धि कबीर साहब, गोरखनाथ जी महाराज व भगवान दत्तात्रेय जी की देन है ।
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परमारथ जिस देह मैं, ग्यांन ध्यांन गुणवंत ।
कहि जगजीवन सोइ जन, जत सत जा कै वित्त ॥११॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिस देह में ज्ञान व्यापता है ध्यान होता है । ऐसी गुणी देह में ही सत्य संन्यास जैसे धन होते हैं ।
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परमारथ जिस देह मैं, पांचौं राखै पाक३ ।
कहि जगजीवन नांव भजि, रांम रसायंन छाक४ ॥१२॥
{३. पाक=पाँचों इन्द्रियाँ संयत कर उनको पवित्र(निर्विकार) रखे ।}
{४. छाक=पूर्ण सन्तोष(तृप्ति) होने तक पीता रहे ।}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिस देह में परमार्थ से पांचो इन्द्रियां पवित्र होती है । वे ही स्मरण से राम रसायन का पान करते हैं ।
(क्रमशः)

रविवार, 16 मार्च 2025

*४६. परमारथ कौ अंग ५/८*

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*४६. परमारथ कौ अंग ५/८*
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जो दीजै सो पाइये, जो बोवै सो लूंण ।
जगजीवन हरि नांम नित, जन कहिये अस सूंण ॥५॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो देंगे वही मिलेगा, जो बीजेंगे वही उगेगा अतः नित्य ही परभु नाम का स्मरण कर शगुन मनाये ।
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जो प्रांणी जैसा करै, तैसा पावै लोइ ।
कहि जगजीवन रांम रस, हरि भजि पीवै सोइ ॥६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो जैसा करता है वह वैसा ही पाता है । राम रस का पान या आनंद वे ही लेते हैं जो इसका स्मरण करते हैं ।
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अपणैं१ अपणैं कीया की, सब कोई बैसे पालि१ ।
कहि जगजीवन हरि भगति, मिलि रहै रांम संभालि ॥७॥
(१-१. अपणैं अपणैं=सब कोई स्वकृत कर्म के फलभोग के ही अधिकारी होते हैं ॥७॥)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सब जीव अपने अपने कर्मों । का फल भोगते हैं जो स्मरण कर राम संभाले रहते हैं उन्हें ही प्रभु भक्ति मिलती है ।
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देह२ के संबंधि करै, ते सब स्वारथ भोग२ ।
कहि जगजीवन काज पर, खरचैं ते जगि जोग ॥८॥
(२-२. देह के संबंधि करै=शरीर से सम्बद्ध सभी कृत्य ‘स्वार्थ भोग’ ही कह्काते हैं ॥८॥)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि देह के सभी संबध से तो सब स्वार्थ के भोग ही पूरे होते हैं । तो परमार्थ पर खर्च करें तो वे संसार मे सच्चा खर्च है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 13 मार्च 2025

*४६. परमारथ कौ अंग १/४ *

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*४६. परमारथ कौ अंग १/४*
परमारथ सुकृत फल्या, पत्थर लिया बिगास३ ।
रांम रतन धन नीकस्या, सु कहि जगजीवनदास ॥१॥
३. बिगास=विकास(विस्तार) 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परार्थ अच्छे कर्म से फलित होता है । परमार्थ से तो निष्प्राण पत्थर भी विकसित हो जाते हैं । उनमें राम जैसी मूरत निकलती है, ऐसा संत कहते हैं ।
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परमारथ की बासनां, पूरि रहै सब ठांम ।
जगजीवन स्वारथ सकल, दूरि करै भजि नांम ॥२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परमार्थ की सुगंध हर स्थान को भर देती है । प्रभु नाम स्मरण कर स्वार्थ को दूर भगाये़ ।
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परमारथ प्रांणी तिरै, स्वारथ४ बूडै देह४ ।
जगजीवन हरि सेविये, जीवन का फल एह ॥३॥
(४-४. स्वारथ बूडै देह- स्वार्थी जन सांसारिक भोगों में लिप्त रह जाते हैं ॥३॥)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि परमारथ से प्राणी भव पार होते हैं । और स्वार्थ से यह शरीर डूब जाता है । परमात्मा की सेवा पूजा ही इस जीवन का उद्देश्य है, फल है ।
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अपणैं अपणैं काम कौं, सावधान सब कोइ ।
जगजीवन परमारथी, हरि जन कहिये सोइ ॥४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सब को पता है कि उनका कार्य क्या है ? सब सचेत हैं । जो परमार्थी जीव हैं वे ही सच्चे प्रभु के बंदे हैं ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

*४५. स्वारथ कौ अंग १/५*

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*४५. स्वारथ कौ अंग १/५*
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स्वारथ बंधी आतमा, निस दिन करै उपाइ ।
कारज कोई सर्या, जगजीवन जुगि१ आइ ॥१॥
१. जुगि=कलियुग में ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जीवात्मा स्वार्थ से बंधी है और रात दिन उसमें ही लगी है । इस कलियुग में किसी का सच्चा कार्य ऐसे कभी पूरा हो सकता है क्या ।
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स्वारथ करतां सब गया, माल मुलक रग राज ।
जगजीवन केता खप्या, रांम बिमुख बेकाज ॥२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि स्वार्थ से धन देश आनंद व राज्य सभी चले गये हैं । राम विमुख हो कितने ही इसमें अपना जीवन खो बैठे हैं ।
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जगजीवन स्वारथ करै, समझै नहीं गंवार ।
स्वाद बंधाना जीभ कै, सोई जाति चमार ॥३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जीव मूर्ख बन कर स्वार्थ करता है । जीभ तो चमड़े की है इसके स्वाद में बंधना यह तो चर्मकारों सा कार्य है जो चमड़े का कार्य करते हैं या उसके पारखी है ।
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जौरि सयानप२ जीव मंहि, स्वारथ स्वाद बिलास ।
ताथैं निरफल रांम भगति बिन, कहि जगजीवनदास ॥४॥
२. सयानप=बुद्धिमता ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जीव बुद्धि मता लगाता है जिससे कि स्वाद व स्वार्थ सधते रहे । किंतु राम भक्ति के बिना यह सब निष्फल है ।
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स्वारथ दुविध्या ऊपजै, जहँ दुविध्या तहँ दोष ।
कहि जगजीवन रांम न सुमरै, तिनकों सुकति न मोक्ष ॥५॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि स्वार्थ से दुविधा उपजती है । जहां दुविधा होती है वहां विकार आते हैं । संत कहते हैं कि बिना प्रभु स्मरण के मोक्ष भी नहीं मिलता है ।
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इति स्वारथ कौ अंग संपूर्ण ॥४५॥

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2025

*४४. रस कौ अंग ११३/११६*

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*४४. रस कौ अंग ११३/११६*
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इस मारग मंहिं आइ करि, काहे अटकै बीच ।
जगजीवन तहँ पहुँचिये, रोम रोम रस सींच ॥११३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे जीवात्मा प्रभु के मार्ग में आकर फिर बीच में क्यों रुकते हो जहाँ वास्तविक विश्राम है प्रभु शरण वहां ही पहुंचो । और अपने हर रोम में राम रस सिंचित कर लीजिये ।
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निरमल कीजै आरती, रांम नांम ल्यौ लाइ ।
तौ जगजीवन प्रेम रस, पीवै प्रांण अघाइ ॥११४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि शुद्ध मन से प्रभु की आरती करें । और राम नाम की लिव लगा लें । तब ये प्राण भरपूर जी भर कर प्रेमरस का पान करेंगे ।
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जब लग जीवन जीव७ है, तब लग पीस्यां८ प्रेम ।
जगजीवन हारी भजन सौं, हियड़ा होसी हेम९ ॥११५॥
७. जीवन जीव=प्राणियों में प्राण । ८. पीस्यां=पीवेंगे । ९. हेम=सुवर्ण ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जब तक शरीर में प्राण हैं तब तक प्रेम पान करेंगे । इस प्रकार हरि भजन से ह्रदय स्वर्ण जैसा मूल्यवान हो जायेगा निर्मल शुद्ध हो जायेगा ।
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आदि देव अमर स्थान, अलख लखिआनंद कृतं ।
कहि जगजीवन निरख नूर१०, जागि जन अम्रित क्रितं ॥११६॥
१०. नूर=तेज ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि दादूजी महाराज ही हमारे आदि देव हैं जो अमर स्थान पर विराजते हैं । उनको देखने मात्र से ही जीव अमृत प्राप्ति सा अनुभव करता है ।
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सांठो११ हरि मंहि रस रहै, मीठौ लागै मांहि ।
कहि जगजीवन परमारथ करि, कोइ दुख व्यापै नांहि ॥११७॥
११. सांठो=इक्षु (ईख) ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सद्गुण ईख के रस जैसे मीठे लगते हैं । ऐसे ही जो दूसरों की भलाई करते हैं उन्हें कोइ दुख नहीं व्यापता है ।
इति रस का अंग संपूर्ण ॥४४॥ 
(क्रमशः)

सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

*४४. रस कौ अंग १०९/११२*

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*४४. रस कौ अंग १०९/११२*
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खिजमत१ कीजै खसम की१, तन मन सौंपी सरीर ।
जगजीवन तौ२ पीजिये, हरि जल अम्रित नीर ॥१०९॥
१-१. खिजमत कीजै खसम की=पति की सेवा करे । २. तौ=तब ।
संत जगजीवन जी कह रहैं है कि अपने प्रभु रुपी पति की सेवा तन मन व देह अर्पण कर करें । तभी तुम्हें परमात्मा की कृपा रुपी अमृतजल पान करने को मिलेगा ।
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हरि रस भीजै आतमा, झिलै प्रेम रस दास ।
जगजीवन बरिषै घटा, मिटै जनम की प्यास ॥११०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हरि कृपा रुपी रस में आत्मा आनंदित है । जिससे प्रभु भक्त सिक्त हो रहे है । ऐसी वर्षा का आनंद अनुभव हो रहा है कि जन्म जन्म की प्यास मिट रही है ।
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मालिक३ मीत४ पिछांणि ले, अल्लह एक अजीज५ ।
कहि जगजीवन चेति चित्त, चाखै अम्रित चीज६ ॥१११॥
३. मालिक=स्वामी । ४. मीत=मित्र(सहायक) । ५. अजीज=प्रिय ।
६. चीज=पदार्थ ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अपने मालिक और मित्र की पहचान कर ले वह ही सबका प्रिय अल्लाह है । जो चित से जागृत हैं वे ही अमृत पदार्थ पाते हैं ।
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गुणै न रीझै निरगुणी, रीझै सौ रस राखि ।
जगजीवन प्रहरी बिषै, चरन कंवल रस चाखि ॥११२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो निर्गुणी है वह किसी भी गुण को नहीं मानता न आकर्षित होता है । उनके चाहे विषयों के कितने ही पहरे हो वे चरण कमलों का आनंद लेते ही है ।
(क्रमशः)

रविवार, 9 फ़रवरी 2025

*४४. रस कौ अंग १०५/१०८*

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*४४. रस कौ अंग १०५/१०८*
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पुल५ बांधै पांणी थंभै, प्रेम पिवन के काज ।
जगजीवन करि बंदगी, गगन मांहि चढ़ि गाज६ ॥१०५॥
५. पुल=बन्धा या सेतु । ६. गाज=गर्जता ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जीव पीने के लिये पानी जब एकत्र करते हैं तो जल में ही खम्ब स्थापित कर सेतु निर्माण करते हैं । जो कठिन कार्य है । यदि तू प्रभु की बंदगी साधना कर ले तो पानी का जो मूल है जहां के लिये तेरे इतने प्रयत्न हैं वे सब गौण हो जायेगें और हे जीवात्मा तू उस प्रभु के सामीप्य में बैठकर उस जल मूल या कृपा मूल को ही पा लेगा जिस गगन से जल बरसता है तुझे इकट्ठा करने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी तू स्वयं उसका मालिक होगा यदि तुझपर प्रभु कृपा होगी तो ।
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गगन गरज बिजुरी चमक, मेघ बरस धर सींचि ।
कहि जगजीवन रालि जल, बहुरि लिया हरि खींचि ॥१०६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि गगन गरजते हैं बिजली चमकती है तब मेघ बरस कर धरती को सिंचित करते हैं । प्रभु ने जो आयु रुपी जल दिया था उसमें से उन्होंने बहुत सारा खींच लिया है ।
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कहि जगजीवन कांम तजि, रांम ह्रिदा मंहि राखि ।
पांचौ पीवैं प्रेम रस, उपजै अनहद साखि ॥१०७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि कामादि को छोड़कर राम स्मरण को ह्रदय में रखो । फिर पांचो ज्ञानेन्द्रियां अनहद की उपस्थिति में प्रेम रस का पान करेगी ।
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नूर निहाली७ ऊपरै, ग्यांन गलेफ८ बनाइ ।
कहि जगजीवन गुपत रहै, मैल न लागै ताहि ॥१०८॥
७. निहाली=रजाई । ८. गलेफ=खोली, आवरण ।
संत जगजीवन जी कहते हैं कि इस जीव को निष्कलंक रखने के लिये प्रभु स्मरण रुपी रजाई पर ज्ञान की खोली चढा फिर यह सुरक्षित रहेगा इस पर कोइ विकार रुपी मैल नहीं जमेगा ।
(क्रमशः)

बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

*४४. रस कौ अंग १०१/१०४*

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*४४. रस कौ अंग १०१/१०४*
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कहि जगजीवन आतमा, आतम अस्थल दीन ।
रांम अकल अबिगत अलख, पार ब्रह्म रस लीन ॥१०१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जीवात्मा का आत्मस्थल में दीन हो तब ही वह कला रहित न जाने जा सकनेवाले अलख पार ब्रह्म के आनंद में लीन होता है ।
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प्रीति ठिकाणैं१ प्रेम रस, नांम ठिकाणैं नेह ।
ग्यांन ठिकाणैं गहर गुण, जगजीवन जस देह ॥१०२॥
(१. ठिकाणैं=स्थान)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रीति का जहाँ स्थान हैं वहाँ प्रेम रस है जहाँ स्मरण का स्थान प्राबल्य है वहाँ स्नेह है । जहां ज्ञान का स्थान है वहां गुण है इस प्रकार देह भासित होती है । जैसै भाव का प्राबल्य हो ।
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हंस पिवैंगें रांम रस, प्रहरी२ माया मोह ।
जगजीवन किस बोल का, जीव मंहि करै अनोह३ ॥१०३॥
(२. प्रहरी=पहरेदार) (३. अनोह=स्नेहाभाव)
संत जगजीवन जी कहते हैं जो जीव हंस के समान ग्यानी हैं वे राम स्मरण का आनंद लेंगे और जो सिर्फ माया के रक्षक प्रहरी है वे मोह में रहेंगे । जैसी जीव की प्रवृति होगी वह वैसा ही उसी भाव से आसक्ति या स्नेह रखेगा ।
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घर आंगन बैरी सरस, मीठा जल की सीर४ ।
गुरु प्रसादैं पीजिये, जगजीवन सौ नीर ॥१०४॥
(४. सीर=स्त्रोत)
संत जगजीवन जी कहते हैं जो जीव संसार में भले ही शत्रु हो किंतु भगवद् मार्ग में यदि वह मीठे जल के झरने सदृश है तो उसकी बात गुरु महाराज के प्रसाद या कृपा की भांति स्वीकार करनी चाहिये ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 28 जनवरी 2025

*४४. रस कौ अंग ९७/१००*

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*४४. रस कौ अंग ९७/१००*
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कहि जगजीवन नांम मंहि, अनंत जोग अरु भोग ।
भोगी रोगी बियोगी१०, जोगी हरष न सोग ॥९७॥
(१०. बियोगी=धन, स्त्री आदि से रहित)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु के नाम में अनंत योग व भोग है । जो भोगी है वे प्रभु से वियोग तो सहते ही हैं आत्म रोगी भी होते हैं । और जो योगी जन हैं उन्हें न दुख है न खुशी है ।
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सम्रथ दे तो पाइये, धरी बसत धरि ध्यांन ।
कहि जगजीवन दूजा नहीं, हरि सुमिरन के ग्यांन ॥९८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि अगर प्रभु दे तो अवश्य लीजिये क्योंकि वे समर्थ हैं देने योग्य वे ही हैं । अंतर में उस वस्तु का ध्यान भी करें प्रभु स्मरण से बढकर और कोइ ज्ञान नहीं है ।
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समरथ दे तो पाइये, परम पियाला सार ।
जगजीवन रस पीजिये, तब जाइ पाइए पार ॥९९॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि यदि प्रभु दे तो अवश्य ज्ञान का सार ग्रहण कीजिये और उसके आनंद को आत्म सात कर ही भव पार हो सकते हैं ।
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सम्रथ दे तो पाइए, भाव भगति फल एह ।
जगजीवन रस पीवतां, नख सिख भीजै देह ॥१००॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि यदि प्रभु दें तो भाव भक्ति अवश्य लीजिये । उस आनंद से पूरी देह प्रभु नामासिक्त हो जायेगी ।
(क्रमशः)

रविवार, 12 जनवरी 2025

*४४. रस कौ अंग ९३/९६*

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*४४. रस कौ अंग ९३/९६*
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जिस सूरति मूरति ह्रिदै, सो है सो क्रित साधि ।
जगजीवन अंग एकरस, अकल पुरिष आराधि ॥९३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु मूरत तेरे मन में है उसे ही साधने का काम करो । सभी इन्द्रियों को उन प्रभु में लगाकर ही उनकी आराधना करो ।
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प्रिथिवी सब हरि हरि करै, पांणी बांणी रांम ।
अनल पवन अबिगत अलख, गगन मगन निज नांम ॥९४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि देह स्थित पांचों तत्व पृथ्वी जल आकाश वायु व गगन अग्नि सभी में प्रभु व्याप्त हैं अतः हे जन सभी उसी में मग्न हैं ।
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कहि जगजीवन बंदगी७, सेवा चार्यूं जांम८ ।
आग्याकारी अकल९ की, सावधान सब ठांम ॥९५॥
(७. बंदगी=विनयपूर्ण) {८. चार्यूं जाम=चारों याम(प्रहार)}
{९. अकल=कला(विभाग) रहित(अखण्ड)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु आपकी विनय पूर्वक वन्दना और चारों पहर सेवा बिना चतुराई आज्ञानुसार चलना और सदा सावधान सब जगहों पर रहना हो यह ही प्रार्थना है ।
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कहि जगजीवन जोग मंहि, भगति प्रेम रस भोग ।
भावै भुगतै भाव सौं, ना तिंहिं हरष न सोग ॥९६॥
संत जगजीवन जी कहते है कि हैं जीव योग में ही भक्ति प्रेम का आनंद ले । उसे भाव पूर्वकभोग उसमें हर्ष व शोक की प्रतीति न हो वह समर्पण भाव से हो ।
(क्रमशः)

बुधवार, 8 जनवरी 2025

*४४. रस कौ अंग ८९/९२*

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*४४. रस कौ अंग ८९/९२*
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मगन मस्त लय लीन मन, हरि चरनै धन हेत ।
प्रांण पुरिष धापै४ नहीं, जगजीवन सुख लेत ॥८९॥
{४. धापै-संतुष्ट(तृप्त) हो}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि मन मगन और मस्त हो जब प्रभु स्मरण में लीन होता है तो वह प्रभु चरणों को ही श्रेष्ठ धन मानता है । और उससे उसे इतना आनंद मिलता है पर फिर भी तृषा बनी रहती है ।
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जगजीवन नीझर झरै, पच्छिम बरसै मेह ।
रोम रोम सुख ऊपजै, नख सिख भीजै देह ॥९०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिस प्रकार पश्चिम दिशा से आये बादल छाए नवरत बरसते हैं ऐसे ही राम नाम स्मरण से यह देह नख शिख भीग कर रोम रोम से सुखी होती है ।
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जगजीवन लिखि राखिये, रोम रोम हरि नांम ।
अंग सौं अंग लगाइ करि, तौ रस पावै रांम ॥९१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि रोम रोम हरि को समर्पित हो । इस प्रकार के समर्पण से ही राम स्मरण का आंनद रस प्राप्त होता है ।
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सरस रसांइण५ सीख ले, काया कंचन होइ ।
हरि भजि आनन्द ऊपजै, जगजीवन घट धोइ६ ॥९२॥
(५. रसांइण=पारे से बनी सिद्ध औसध) {६. धोइ=धो(स्वच्छ) कर}
संत जगजीवन जी कहते हैंकि हे जीव सरल रसायन है प्रभु नाम ओर तू जिससे देह कंचन हो जाती है उसके मूल्य बढते हैं । हरि भजन से आनंद बढता है अतः निर्मल ह्रदय करें ।
(क्रमशः)

शनिवार, 4 जनवरी 2025

*४४. रस कौ अंग ८५/८८*

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*४४. रस कौ अंग ८५/८८*
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रहसी ते रस पीवसी, जासी ते फिरि आइ ।
कहि जगजीवन रहसी जासी, सब ऊधरसी५ भाइ ॥८५॥
(५. ऊधरसी=उद्धार होगा)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो परमात्मा के आश्रित हो रहेंगे वे आनंद रस का पान करेंगे और जो बिना पीये अर्थात स्मरण बिना जायेंगे वे फिर जन्म लेंगे । संत कहते हैं कि रहने व जानेवालों सभी का उद्धार होगा ।
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सबै उधारैं६ रांमजी, जे हरि हूंहि७ दयाल ।
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि भज बंचै काल ॥८६॥
(६. उधारैं=उद्धार करैं) (७. हूंहि=हों)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जब प्रभु दया करते हैं तो सब जीवों का उद्धार करते हैं । संत कहते हैं कि प्रभु भक्त परभु स्मरण द्वारा ही काल से बचते हैं ।
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सिघ्र१ कारज होइ सिधि, जे जन सुमिरैं नांम ।
कहि जगजीवन छिप्रमेव२ हरि, ह्रिदै बिराजै रांम ॥८७॥
{१. सिघ्न=शीघ्र (जल्दी ही)} (२. छिप्रमेव=क्षिप्रमेव=तत्काल ही)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि यदि जीव स्मरण करते हैं तो उनके सब कारज शीघ्र ही सिद्ध हो जाते हैं । स्मरण से तत्काल ही प्रभु मन में विराजते हैं ।
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रांम नांम रस परम सिधि, रांम नांम रस जोग ।
कहि जगजीवन रांम रस, रांम सिरै३ रस भोग ॥८८॥
(३. सिरै=श्रेष्ठ)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि राम नाम आनंद ही परम सिद्धि है जो सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं । और यह ही योग है जो प्रभु से जोड़ता है । यह ही सब भोगों में श्रेष्ठ है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 1 जनवरी 2025

*४४. रस कौ अंग ८१/८४*

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*४४. रस कौ अंग ८१/८४*
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रांम कहाई४ जिनि कहौ, सावधान सुंनि राखि ।
कहि जगजीवन भगति करि, गुरु सेवा रस चाखि ॥८१॥
(४. कहाई=कथा)
संत जगजीवन ज कहते हैं कि प्रभु राम की कथा को सुनकर सावधानी पूर्वक मनन करो । प्रभु भक्ति कर गुरु सेवा रुपी आनंदरस का भी पान करो ।
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अठ सिधि नौ निधि नांउं मंहि, बिन सेवा क्यूं पाइ ।
कहि जगजीवन जागि लहै जन, रांम रिदै लिव लाइ ॥८२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि आठ सिद्धि व नौ निधि बिना सेवा के नहीं मिलती जीव अज्ञान निद्रा से जाग कर ही राम नाम से ह्रदय में लगन लगा सकता है ।
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कहि जगजीवन रांम रस, रसना हरि रस राचि ।
नर निरबांण निरमोह रहै, बिषै बंचि हरि राचि ॥८३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि राम स्मरण रुपी आनंद को जिह्वा पर रंग लो यदि जीव मुक्त निर्मोही होकर रहे तो वह विषय रुपी विष से बचता है ।
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अम्रित रस आकास का, स्त्रवै प्रांण मंहि पूरि ।
कहि जगजीवन नांउं लिया हरि, बिघन जांहि सब दूरि ॥८४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि आकाश से अमृत रस का स्त्राव होता है, जो प्राणों को मिलता है । हरि का नाम लेने से ही संत कहते हैं कि सब विध्न दूर हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2024

*४४. रस कौ अंग ७६/८०*

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*४४. रस कौ अंग ७६/८०*
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राजा खुसी न बादशाह, अैसी खुसी अतीत ।
कहि जगजीवन पिवै रांमरस, सत संगति लहै सीत ॥७७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि न तो राजा को प्रसन्न कर ना ही बादशाह को खुश कर पूर्व में कभी ऐसी खुशी मिली है जो सत्संग में राम स्मरण से मिलती है ।
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मरै पै माया न तजै, कोटि करै जे कोइ ।
कहि जगजीवन रांमरस, पिवै न पावन होइ ॥७८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जीव मरनेवाले होते हैं फिर भी माया को नहीं छोड़ते चाहे करोड़ो यत्न कर लो वे रामस्मरण रुपी रस पीकर पवित्र नहीं होते हैं ।
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कोदों१ बेद पुराण मत, अनभै संस्क्रित२ भात ।
कहि जगजीवन संहसक्रित प्राक्रित, रांम अरथ रस बात ॥७९॥
(१. कोदों=एक निकृष्ट अन्न) {२. संस्क्रित भात=सिद्ध(पका हुआ) चावल}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि वेद पुराणों के मत तो कोदों भात की भांति हैं । और अनुभव से उपजा ग्यान संस्कृत की भांति हैं संत कहते हैं कि चाहे संस्कृत हो या प्राकृत भाषा राम शब्द का अर्थ एक ही है ।
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दरसन देख्यां मन खुसी, जिस दरसन मंहि जीव ।
कहि जगजीवन नील टांस३ जग, भ्रमै त्यागि रस पीव ॥८०॥
(३. नील टांस=नीलकण्ठ नामक पक्षी)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि दर्शन से मन प्रसन्न होता है । जिसके दर्शन के लिये मन में उत्कंठा होती है । जन श्रुति के अनुसार नीलकंठ के दर्शन होने से लोग प्रभु दर्शन का भ्रम पालते हैं ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 24 दिसंबर 2024

*४४. रस कौ अंग ७३/७६*

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*४४. रस कौ अंग ७३/७६*
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पंचाम्रित एही बिष, बिष अम्रित कहै लोइ ।
कहि जगजीवन अम्रित अमीरस, ताहि न चिन्हैं कोइ ॥७३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हमारी पंच इन्द्रियों के सुख ही विष है जिसे लोग अमृत कहते हैं । अमृत परमात्मा का परमानन्द है जिसे कोइ नहीं पहचानता है ।
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भू पृथ्वी सा गगन हरि, नूर निरंजन नांम ।
कहि जगजीवन उदर भरि, बिलसि ह्रिदै रस रांम ॥७४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु नाम का आनंद तो पृथ्वी व आकाश जैसा है जहां सबकी उदरपूर्ति होती है ।
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केइ दक्खिण केइ पूरब पच्छिम, केइ उत्तर केइ मधि ।
कहि जगजीवन जे रस बिलसैं, ते जन पावैं सिधि७ ॥७५॥
(७. सिधी=सिद्धि, सफलता)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि कोइ परमात्मा को पाने पूर्व दिशा उत्तर दिशा, कोइ पश्चिम और कोइ दक्षिण भागता है । कोइ मध्य ढूंढता है जो इसके आनंद को देख जान पाते हैं वे ही इसे सिद्ध या पा लेते हैं ।
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बिच हरि पड़दा दूरि करि, पूरन जोति प्रकास ।
प्रांन पिवै हरि अमीरस, सु कहि जगजीवनदास ॥७६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु और जीव के मध्य के आवरण को हटाकर उस पूर्ण ब्रह्म के साक्षात्कार को करो इस अवस्था में प्राण अमृतरस का पान कर पाते हैं ।
(क्रमशः)

शनिवार, 21 दिसंबर 2024

*४४. रस कौ अंग ६९/७२*

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*४४. रस कौ अंग ६९/७२*
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सत रज तम की बासना, प्रव्रिति५ पद मंहि बास ।
न्रिवर्ति धरि जन नाऊं रत, सु कहि जगजीवनदास ॥६९॥
(५. प्रव्रिति=प्रवृत्ति, लोकव्यवहार)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि तीनों गुणों सत, रज, तम, की इच्छा लोकव्यवहार में ही है । संसार से निवृत्ति में तो राम नाम ही पर्याप्त है ।
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कहि जगजीवन सहज मैं, सकल तजै आरंभ ।
सुमिरन लागा जन रहै, तहँ देव निरंजन स्यंभ६ ॥७०॥
{६. स्यंभ=शम्भू, शंकर(आदिनाथ)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो जीव सहज में सब आरंभ से ही त्याग देते हैं वे नाम स्मरण में ही लगे रहते हैं और उनके निकट ही परमात्मा होते हैं ।
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विद्या नांम बिसार हरि, बिष्नु अविद्या जास ।
सो क्यूं पीवै रांम रस, सु कहि जगजीवनदास ॥७१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जो जन हरि नाम की विद्या को भूल आशा पूर्ण करनेवाले विष्णु या देवों को संसारिक मनोकामना हेतु भजते हैं वे प्रभु स्मरण रुपी आनंद रस का पान कैसे कर सकते हैं ।
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परस्या* प्रेम न रांम रस, प्रीति न ह्रिदै प्रकास ।
डंडवत त्रिए सुध हरि भगता*, सु कही जगजीवनदास ॥७२॥
(*-*. गुरुचरणों का प्रेम भाव से स्पर्श, उन के प्रति ह्रदय से स्नेह प्रकट करना तथा सम्मुख आने पर तीन दण्डवत् प्रणाम करना- यह निश्छल साधु का लक्षण माना जाता है ॥७२॥)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि गुरु चरणों का स्पर्श उनमें प्रेम तथा सन्मुख आने पर दण्डवत करना ये निश्छल साधु जन के लक्षण कहे गये हैं ।
(क्रमशः)

शनिवार, 14 दिसंबर 2024

*४४. रस कौ अंग ६५/६८*

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*४४. रस कौ अंग ६५/६८*
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हरि रस मांहि मिलाइ तन, रांम रसिक जन होइ ।
कहि जगजीवन निरंजन, निराकार भजि सोइ ॥६५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हरी स्मरण रुपी रस में ही देह का धर्म रखने वाले जन ही निरजंन निराकार प्रभु का भजन करते हैं ।
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कहि जगजीवन कोहतल१, मोर करै हरि सोर१ ।
अलह साहिब सो सुनैं, कहा करै कोई जोर२ ॥६६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पर्वत की तलहटी में जिस प्रकार बैठ कर यदि मोर शोर करता है तो भी अर्श(ऊंचाई) पर बैठै प्रभु सुन लेते हैं प्रभु हमारी हर गतिविधि देखते सुनते हैं चाहे हम कितना ही गुप्त रखें ।
(१-१. कोह तल मोर करै हरि सोर=पर्वत की तलहटी में बैठ कर मयूर उच्च स्वर से ध्वनि करे । २. जोर=बल, सामर्थ्य)
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कहि जगजीवन अस्त३ गलि, तुचा४ गली रस मांहि ।
तब तन हरि हरि रांम हरि, दूजा भासै नांहि ॥६७॥
(३. अस्त गलि=हड्डियाँ गल गयीं) (४. तुचा गली=त्वचा गल गयी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अस्थि व त्वचा तो रामानंद में गल गयीं अब देह में राम और राम में देह एकाकार है दूजा दिखता ही नहीं है ।
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रस बांधे रुचि ऊपजी, रांम किया रलियाति ।
कहि जगजीवन मूल की, जनम पिछांणै जाति ॥६८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम रस में अनुराग होने से राम जी ने उसमें ही लीन कर लिया । उस मूलरूप प्रभु को जानने से जन्म का उद्देश्य भी समझ आ जाता है ।
(क्रमशः)

रविवार, 1 दिसंबर 2024

*४४. रस कौ अंग ६१/६४*

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*४४. रस कौ अंग ६१/६४*
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वकुला मांही प्रेम रस, रस मंहि स्वाद सुरांम ।
कहि जगजीवन रांम मंहि, साध सुखी सब ठांम ॥६१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसे आम के छिलके में आम का रस रहता है जो आनंदप्रद है ऐसे ही राम में ही नहीं अपितु राम के नाम में भी आनंद है । सभी साधु जन वहां सुखी रहते हैं ।
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रस मंहि बकुला गालिये, सब रस जैसैं नीर ।
कहि जगजीवन रांम मंहि, निहचल रहै सरीर ॥६२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आम के रस में छिलका रख दीजिए फिर उसका आस्वादन कीजिये उसमें से भी आम रस का स्वाद आयेगा ऐसे ही राम नाम व राम में सब देह एकरूप होते हैं ।
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बीरज थैं बकुला भया, बीरज बकुला मांहि ।
कहि जगजीवन रांम पिछांणै, तौ ए बिनसै नांहि ॥६३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बीज रुप से आम बना और फलित होजाने पर उसमें पुनः बीज हुआ अगर जीव राम की निरन्तरता को जान ले कि वे तो शाश्वत हैं फिर देह विनाश का भय रहेगा ही नहीं ।
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हरि रस हाड़डियन रस्या५, अब रस मिलै न आंन ।
कहि जगजीवन रांम रस, रसिक पिवै धरि ध्यांन ॥६४॥
(५. हाड़डियन रस्यां=यह भगवत्प्रेम मेरी हड्डियों तक में समा गया है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु का नाम रस तो हड्डियों तक में रमा है अब दूसरा रस कैसे मिले ! जो राम नाम के रसिया हैं वे ध्यान धर कर भगवत्प्रेम में डूबे रहते हैं ।
(क्रमशः)