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गुरुवार, 4 जून 2015

= २०० =

卐 सत्यराम सा 卐
दादू अंतर कालिमा, हिरदै बहुत विकार ।
प्रकट पूरा दूर कर, दादू करै पुकार ॥
सब कुछ व्यापै राम जी, कुछ छूटा नांही ।
तुम तैं कहाँ छिपाइये, सब देखो मांही ॥
सबल साल मन में रहै, राम बिसर क्यों जाइ ।
यहु दुख दादू क्यों सहै, साँई करो सहाइ ॥
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साभार ~ Desh Kumar Kaushik ~
कितना सुंदर चिन्‍ह, अपने आत्‍मगौरव का ! कितनी अनमोल क्‍यारी आत्‍मभिमान को पल्‍लवित करने के लिए ! अपनी की हुई भूलों को सुधार लेना, अपने दुराशय से पूरित भावों के लिए सिहार उठना, अपने दुष्‍कृत्‍यों पर पश्‍चाताप करना कितना मधुमय है! अभीष्‍ट धर्म में पश्‍चाताप की बड़ी महिमा गायी गयी है।
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रोमन कैथोलिक धर्म की नींव इसी अनुताप की तप्‍तशिला पर है। शब्‍द में ही कितनी पवित्रता है! 'पश्‍चाताप' 'अनुताप' यह शब्‍द कितना ऊँचा उठाने वाला है! इसके शाब्दिक अर्थ ही में वह गहनता है जिस पर विचार करने से आत्‍मा को आनंद लाभ होता है। 'पश्‍चात' के अर्थ हैं 'अनंतर' 'बाद'। वही अर्थ, 'अनु' के हैं, 'ताप' के अर्थ हैं 'उष्‍णता' 'गर्मी'।
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शब्‍द के इस आशय को हृदयंगम कर लेने के अनंतर इस शब्‍द का उच्‍चारण करने से हृदय में एक अत्‍यंत पुनीत भावना का उदय हो जाता है। 'अनुताप' 'पश्‍चाताप' इन शब्‍दों से ही प्रतीत होता है मानो शुद्ध-स्‍वच्‍छ-स्‍वर्णमयी हार्दिक भावना अपने दुष्‍कृत्‍यों के कारण गंदी हो गयी और वह एक जलती हुई, तापपूर्ण भट्टी के मुख के सामने खड़ी है।
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और अब मानो 'अनुताप', दृष्‍कृत्‍यों के अनंतर होने वाला ताप-पूर्व कृत कर्मों की भस्‍मीभूत करके उस आत्‍मा को सुंदर निर्मल रूप दे देगा। इस शब्‍द में बड़ी महिमा है। ठीक-ठीक समझकर, सचेत होकर 'अनुताप' शब्‍द का उच्‍चारण मात्र करने से हृदय में बल-सा आता है।
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'अनुताप' अथवा 'पश्‍चाताप' क्‍या है? भौतिक मनोविज्ञान के आचार्यगण कदाचित् इस पश्‍चाताप का इस प्रकार वर्णन करने लगेंगे कि जिस समय कर्ता कोई ऐसा काम करता है जिसे आचार शास्‍त्र 'बुरा' कहता है उस समय उसके मस्तिष्‍क में उस कार्य की नवीनता के कारण नयी-नयी रेखाएँ बनती हैं तथा उस कार्य के करने में भौतिक इंद्रियों को अधिक पारिमाण में हलचल करनी पड़ती है।
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इसलिए जब वह कार्य समाप्‍त हो जाता है तो उसके बाद थकावट के कारण कुछ ऐसा अनुभव होता है जिससे तबीयत जरा गिरी-गिरी सी मालूम पड़ती है। इसलिए भावुक लोग इसी क्षणिक भावावेश को अनुताप व पश्‍चाताप के नाम से पुकारते हैं।
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इन मनोविज्ञानवेत्‍ताओं की दृष्टि में प्रत्‍येक प्रकार के भाव, प्रत्‍येक प्रकार के आत्‍मानुभव, सबके सब भौतिक कारणों के फल कहे जा सकते हैं। अतएव उनकी दृष्टि में इस प्रकार के मान व हृदय के आवेश भावनाओं का कोई आदर नहीं।
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दूसरी ओर आध्‍यात्मिक मनोविज्ञानवादी हैं। वे कहते हैं कि हम अपने बाल्‍यकाल से कुछ संस्‍कारों एवं अवस्‍थाओं में ललित-पालित होते हैं। उन्‍हीं संस्‍कारों के प्रभाव से हमारी आत्‍मा पर विशेष प्रकार के भावों का अंकुर जम जाता है। यदि हम सदाचारपूर्ण संस्‍कारों के मध्‍य पले हैं तो हमारी आत्‍मा उन संस्‍कारों की शिक्षाओं के विरुद्ध कार्य करने में हिच‍केगी।
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उदाहरणार्थ, माता यशोदा ने कृष्‍ण को ऐसे संस्‍कार में पाला-पोसा था जहाँ सतत यह कहा जाता था कि चोरी करना बुरा है, मिट्टी खाना ठीक नहीं, दधि भाँडों को तोड़ना उचित नहीं। किंतु जब कृष्‍ण बड़े हुए और यार लोगों ने गोपिकाओं के सदन से चोरी करने की बात समझायी तो वे चोरी करने तो गये लेकिन उन्‍हें यह खयाल सदा सताता रहा कि कहीं किसी गोपिका को इस बात का पता न लग जाय, किंवा कहीं यशोदा मैया को इस शैतानी की खबर न जो जाय।
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जब कभी कोई गोपिता उन्‍हें पकड़ लेती थी तो कम से कम उस समय के लिए तो उनहें अवश्‍य पश्‍चाताप होता था। उस समय तो जरूर वह यह समझते थे कि चोरी करना पाप है। आगे से न करनी चाहिए। अस्‍तु, कहने का सारा सारांश यह है किसी भी अनौचित्‍यपूर्ण काम करने से सदाचारी हृदय के भाव शांत नहीं रह सकते।
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उस कार्य के समाप्‍त होने के अनंतर उसके हृदय में आंदोलन होता है, दु:ख होता है, अशांति उत्‍पन्‍न होती है, 'अनुताप' अथवा 'पश्‍चाताप' होता है। मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में अनुताप कुछ भी हो किंतु हमारे लिए तो अनुताप वह वस्‍तु है जो मानव हृदय को उत्‍तरोत्‍तर उन्‍नत करती चली जाती है।
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स्‍वीकृति और अनुताप(Confession and Repentence) यह दो वस्‍तुएँ ऐसी हैं जो हृदय में धड़कन उत्‍पन्‍न न हो कि हमारे दोष स्‍वीकार कर लेने से हम लोगों की दृष्टि में गिर जायेंगे, तो उस दिन हम समझेंगे कि आज हमारी विजय का दिवस है। दोषों के स्‍वीकार कर लेने से हम अपने आत्‍मबल का परिचय देते हैं।
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हमारे पूजनीय महात्‍मा गाँधी सदा-सर्वदा इस बात को अपने समने रखते हैं कि कभी मनसा वाचा कर्मणा कोई ऐसी बात न हो जाय जो अनुचित हो। और यदि इतना होने पर भी वह जान लेते हैं कि कहीं कोई भूल हुई है तो अपने दोष को तुरंत स्‍वीकार कर लेना अपना आद्य कर्तव्‍य समझते हैं।
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एक बार यदि हममें से प्रत्‍येक अपने आपको उस मनुष्य के तथा अपने दोषों को स्‍वीकार करता है तो केवल उसी समय हम दोष-स्‍वीकृति तथा अनुताप की महत्‍ता का एवं उनको करने के लिए आत्‍मबल की जितनी आवश्‍यकता है उसको ठीक-ठीक समझ सकेंगे।
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इसके विपरीत यदि हम केवल मिथ्‍या आत्‍माभिमान तथा बेबुनियाद की थोथी लोक-लाज के मोहक पाश में फँसे रहे तो हम कदाचित् उस मनुष्य के आत्‍मबल की प्रशंसा नहीं कर सकते जो अपने विश्‍वास की दृढ़ता के कारण किसी की परवाह न कर सबके सम्‍मुख अपने दोष स्‍वीकार करता है तथा उसके लिए पश्‍चाताप करने को उद्यत है।
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अनुताप को हमने जलती हुई भट्टी कहा है और इसकी सत्‍यता को केवल वही अनुभव कर सकता है जिसके हृदय में कभी अनुताप की भट्टी जली हो। जिस समय नीचतम प्रकृति वाले पुरुष को अपनी नीचता की विकरालता का ज्ञान हो जाता है, जिस समय वह यह अनुभव करने लगता है कि नियंत्रित विश्‍व में केवल उसी का एक ऐसा जीवन है जो संसार में अनियंत्रण का संचार कर रहा है।
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जिस समय हृदय में छुपे हुए अपने कराल विषधर सर्प की फुँकार से वह स्‍वयं व्‍याकुल-सा हो जाता है, जिस समय उसी व्‍याकुलता की चरमता में वह कातर होकर उन्‍मादी प्राणी के समान अपने आपको भूल जाना चाहता है, जिस समय प्राचीन जीवन की एक-एक पैशाचिक क्रीड़ाएँ अपने नग्‍न रूप में उसके नेत्रों के सामने से गुजर जाती हैं' उस समय, केवल उसी समय, वह इस सत्‍यता का अनुभव करता है कि अनुताप काँच की भट्टी है।
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वह ऐसी भट्टी है कि यदि वह शरीर के अंग-प्रत्‍यंग को भी जला दे तो भी खुशी-खुशी मंजूर किया जा सकता है। उसमें जलते समय, उसमें तपते समय, उसकी उष्‍णता की पराकाष्‍ठा का अनुभव करते समय मनुष्य पद-पद पर यह अनुभव करता है कि उसके जीवन की एक-एक घटनाओं की स्‍मृति उस भट्टी की आग को धौंकनी बनकर फूँक रही है और लपटें ज्‍यों-ज्‍यों ऊँची-ऊँची उठती हैं, त्‍यों-त्‍यों हृदय अपनी नीचता, पशुता, कायरता, अनियंत्रितता आदि मैल को भस्‍मीभूत कर अतीव ऊँचा जीवन-लाभ कर रहा है। जी चाह उठता है कि सब अधोगतिकारिणी वृत्तियाँ भस्‍मीभूत हो जायें और अनुताप के लिए काँच की भट्टी का नाम सार्थक हो एवं उसकी एक-एक अंग-शिक्षा में मनुष्य अपने आत्‍मोत्‍सर्ग की छटा देखे।
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जिस समय भक्‍तवर कबीर के पास एक मुमुक्षु गया और दीक्षित होने की अपनी इच्‍छा प्रकट की, उस समय उन्‍होंने जो पद सुनाया था, वह इतना सारगर्भित है कि उसकी एक ध्‍वनि में अनुताप की महिमा का गुंजार होता है। कबीर ने उससे एकदम यह नहीं कहा कि आओ मैं तुम्‍हें दीक्षा देता हूँ। वे बोले -
चेला तुंबी भर के लाना रे, गुरु ने मँगाई।
पहले वक्‍त तू पटनी लाना, नदी ताल के पास न जाना।
कुआँ बावली छोड़ के लाना, तुंबी भर के लाना रे।
तुंबी भर के लाना रे, लाना बेटा, गुरु ने भर के मँगाई।
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कैसा अमूल्‍य जल मँगवाया है! कुआँ, नदी, ताल-तलैया, झील-पोखर का जल नहीं। संत कबीर को इस आदिभौतिक जल की आवश्‍यकता नहीं। उन्‍हें इस जल से क्‍या काम? उन्‍हें तो चाहिए वह जल जो हृदय-मंथन करने के बाद प्राप्‍त मुमुक्षु है, आत्‍मज्ञान प्राप्‍त करने की उसे उत्‍कट अभिलाषा है, किंतु गुरुदेव कबीर उस समय तक उसे आत्‍मज्ञानी कैसे बना सकते हैं, जब तक कि आत्‍मा पर मैल का आवरण चढ़ा है।
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भूत जीवन के कुकर्मों ने निर्मलता पर जो झिल्‍ली चढ़ा रखी है उसे धोने की आवश्‍यकता जो है, और इसीलिए उन्‍होंने अपने आगंतुक चेले से जल ले आने को कहा। उनका भाव था कि पुत्र, तुम आज मुझसे दीक्षा ग्रहण करने आये हो, लेकिन क्‍या तुम नहीं जानते कि तुम पर आवरण पड़ा हुआ है।
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अपने कृत कुकर्मों पर जब तक तुम पश्‍चाताप नहीं करते, तब तक मैं तुम्‍हें दीक्षा नहीं दे सकता। इसलिये तुम अनुपात करो, तुम अपने पापों के लिए इतना पश्‍चाताप करो, इतना रो दो कि तुम्‍हारे नेत्रों के जल से यह तुंबी भर जाय। इसलिए पहले 'चेला तुंबी भरके लाना रे गुरु रे मँगाई।'
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धन्‍य गुरुदेव! अनुताप की महिला को किस सुंदरता से, किस गूढ़ भाव से प्रकट किया है। प्रसिद्ध अंग्रेज लेखक मि. चार्ल्‍स रीड का एक संसार प्रसिद्ध ग्रंथ है। उसमें भी उन्‍होंने एक स्‍थान पर लिखा है :
"Lower a bucket into the well of self deception and what comes out must be immortal truth, must'nt it?"
- अर्थात् आत्‍मविस्‍मृति के कूप में एक घट डालो और उसमें जो कुछ आवेगा अमर सत्‍यता होगी। क्‍यों न? यह अनुताप ही का प्रताप है कि मनुष्य अपने दैन्‍य के कारण आत्‍मविस्‍मृति के महत्‍व को समझ सके।
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अनुताप तथा दोष स्‍वीकार(Repentence and confession) दोनों सहोदर भ्राता हैं। हमसे कोई पापकर्म हो जाय और उसके लिए हम यदि किसी के प्रति उत्‍तरदायी हैं तो हमारा बल तभी है, जब हम उसके सामने साफ-साफ शब्‍दों में अपने दोषों को स्‍वीकार कर लें। मनुष्य के हृदय में एक अशक्‍तता होती है।
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वह कोई गलती कर बैठता है और उस भूल को मिथ्‍या-अभिमान के वशीभूत होकर वह बजाय सुधारने के लिए उसे छिपाता जाता है और ऐसा करने में उसे कई कृष्‍ण कृत्‍य करने पड़ते हैं। आत्‍मबल तो कहता है कि सादर भूल स्‍वीकार करके अनुताप करो। तुम्‍हारा सच्चा स्‍वाभिमान इसी में है। किंतु झूठी लोक-लाज की एक ऐसी हिचक होती है कि हम उस भूल को स्‍वीकार नहीं करते।
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हमारे शासन दल सदा-सर्वदा इसी अशांतता के वशीभूत होकर अनेक पाप कर बैठते हैं। इसी मिथ्‍याभिमान शान(Prestige) के कारण शासक और शासित के मनों में मालिन्‍य बढ़ जाता है। हमारा जीवन भी इसी अशक्‍कता से खाली नहीं। हम यही प्रयत्‍न किया करते हैं कि किसी तरह हम अपनी भूलों को छिपाये रहें।
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किंतु ऐसा करना व्‍यक्तिगत रूप में ही हानिकारक नहीं, वरन् जातीय रूप में भी वह हानिकारक है, क्‍योंकि हमारी व्‍यक्तिगत करतूतें देश के सामने मिथ्‍याभिमान की आन निबाहने का नमूना रखती हैं और इससे ने केवल हमारा व्‍यक्तित्‍व ही मलिन होता है, वरन् हम अपने समाज, अपने देश, अपने आदर्श, अपने उत्‍कृष्‍ट विचार आदि सबको मैला करते हैं। क्‍या देश की आत्‍माओं में इतना बल आयेगा कि वे सदैव अपने कृत कुकर्मों पर खेद प्रकट करने को उद्यत रहें तथा उसे अनुताप की अंजलि से धो देने में न हिचकें?

= १९९ =

卐 सत्यराम सा 卐
दादू आपा गर्ब गुमान तज, मत मत्सर अहंकार ।
गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥
मद मत्सर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान ।
सपनै ही समझै नहीं, दादू क्या अभिमान ॥
झूठा गर्व गुमान तज, तज आपा अभिमान ।
दादू दीन गरीब ह्वै, पाया पद निर्वाण ॥
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सुधि शुक्ला ~ !! श्री गुरुभ्यो नम: !!
(साभार पूज्य स्वामी श्री सर्वज्ञ शंङकरेन्द्र जी)
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“सकल सोकदायक अभिमाना !”
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(भाग- १)
नारायण ! मेरी दादी माँ कहती थीं - "बच्चा, अहङ्कार तो भगवान् का आहार है ।" बचपन में मुझे उतनी समझ - बुझ नहीं थी । मैं दादी अम्बा से कहता - "तब ठाकुर जी को रोज घंटी बजा - बजाकर भोग क्यों लगाती हो ? क्या अहङ्कार खाने से उनका अर्थात् तुम्हारे प्रभु का पेट नहीं भरता ।"
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दादी अम्बा हँसती और कहती - "अरे नहीं रे पगले ! भगवान् का पेट बड़ा भारी है । देखा नहीं तूने । महाभारत में अठारह अक्षौहिणी सेना खा गये तो भी उनका पेट भरा नही, खाली - का - खाली । कभी किसी का पेट भरा है क्या ? खाओ तो लगता है भर गया, जरा हिले - डुले नहीं कि फिर खाली ।"
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मैंने दादी अम्मा को बीच में टोका - "तो क्या दादी माँ, भगवान् दिन - रात खाते रहते हैं ।" "हाँ भाई, हाँ । वे दिनभर खाते - पीते रहते हैं ।" दादी जी बोलीं । मैं तो सोच में पड़ गया । दादी झूठ नहीं बोलतीं । वे भगवान् के पूजा - पाठ में लगी रहती हैं । ठाकुरजी को सुबह - शाम भोग लगाती हैं ।
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हम लोग भी तो सुबह - शाम भोजन करते हैं । यह अलग बात है कि बीच में कुछ चना - चबेना हो जाता है । हाँ, एक बात याद आया । एक बार एक मौसाजी आये थे । वे जब तक रहे, हमेशा कुछ - न - कुछ खाते रहते थे । माँ ने बताया कि मौसा जी को मधुमेह - चिनीया बिमारी है । इसलिये इनका पेट खाली नहीं रहना चाहिये ।
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मैं यह सब सोच ही रहा था कि दादी माँने मुझे टोका - "अरे पगले ! किस उधेड़ - बुन में पड़ गया रे !" मैंने दादी माँ से पूछा - "दादी माँ, भगवान् जी को मधुमेह - चिनिया की बिमारी है क्या ?" दादी माँ जोर से ठट्ठा मारकर हँस पड़ी - "तूँ बहुत शरारती हो गया है । हमारे भगवान् जी कोई मरीज - वरीज नहीं हैं । तूँ, ऐसा कैसे सोच सकता है ?"
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हमने कहा - वो मौसा जी आये थे न ! दिन भर कुछ - न - कुछ खाते रहते थे । हमें माँ ने बताया था कि वे मधुमेह - चीनिया के रोग से ग्रस्त हैं । इसलिये खाली पेट नहीं रहते कुछ - न - कुछ बकरी जैसा खाते रहते हैं ।" मेरी बात सुनकर दादी माँ बोली - धत् कहीं का पगले ! भगवान् तो अपने भक्तों के भले के लिए दिनरात उनका अहंकार खाते रहते हैं । अहङ्कार उनका आहार है । खाते ही पच जाता है और उतना भक्त पतित होने से बच जाता है ।
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अच्छाई से बुराई अधिक होती है । अहङ्कार भी दुनिया में इतना अधिक है कि भगवान् उसे खाते रहते हैं फिर भी खतम होने का नाम नहीं लेता । देखो, किसी को अपने रूप का अहङ्कार है तो किसी को ज्ञान का, किसी को बल का , तो किसी को धन - जन का, किसी को तप की सिद्धि का तो किसी को अपनी प्रसिद्धि अर्थात् यश का, किसी को मान का तो किसी को दान का ।
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अहङ्कार के न जाने कितने रूप हैं । मैं भी सब नहीं जानती । लेकिन इतना जरूर जानती हूँ कि चाहे तिनका हो या भारी भरकम पेड़, सब अग्नि के आहार हैं वैसे ही अभिभान या अहङ्कार चाहे मामूली हो चारे भारी, सब भगवान् के आहार हैं । भगवान् सब देखते रहते हैं, उनसे कुछ भी छिपा नहीं, अहङ्कार अपने आप भगवान् के उदर में जाता रहता है ।"
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नारायण ! दादी माँ आगे बोली - "देख पगले ! मैं तुलसी बाबा जी का रामचरितमानस रोज - रोज बाँचती हूँ न । भगवान् रामजी भी कितना खेल करते हैं -
सबहिं नचावत राम गोसाईं । अपुना रहैं दास की नाई ॥
दास माने नौकर । नौकर को अहङ्कार नहीं होता । होना भी नहीँ चाहिए । बड़ा होने पर, कुछ सज्ञान होनेपर दादी माँ की बातें अब समझ पा रहा हूँ । लोक में एक कहावत है - "घमण्डी का सिर नीचा ।"
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नारायण ! "केनोपनिषद्" में एक बड़ा सुन्दर उपाख्यान आता है । ब्रह्म की सहायता से देवताओं ने दानवों को पराजित किया । अब इन्द्र, अग्नि और वायु को यह अभिमान हुआ कि यह विजय हमने अपने पुरुषार्थ से प्राप्त की है । उसके मन में इसका अहङ्कार आ गया ।
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ब्रह्म ने देखा कि ये तीनों देव तो अभिमान के मद में चूर हो रहे हैं । अतः इनका अभिमान दूर कर इन्हें सन्मार्गपर लाना चाहिए । तब ब्रह्म ने यक्ष का परम तेजोमय रूप धारण किया और जाकर देवों के निकट अवस्थित हो गये । परम तेजस्वी यक्ष को देखकर देवों के मन में उसे जानने की उत्कण्ठा हुई । इन्द्र ने अग्निदेव से कहा कि जाओ और इस यक्ष का परिचय प्राप्त करो ।
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अग्निदेव गये किन्तु उसके समीप पहुँच कर भी उससे कुछ पूछने का साहस न हुआ । तब यक्ष ने ही उनसे पूछा - "आप कौन हैं?" "मैं अग्नि हूँ और मेरे पास इतना सामर्थ्य है कि मैं इस संसार में सब कुछ जला सकता हूँ ।" अग्नि के ऐसा कहनेपर यक्ष ने एक तृण सामने रखकर कहा कि इसे जलाओ । अग्निने अपनी पूरी ताकत लगा दी किन्तु तिनके को न जला सके । सिर नीचा करके वापस चले गये ।
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तब इन्द्र ने वायु से कहा । वायु भी यक्ष के पास गये । यक्ष ने वही प्रश्न वायु से भी किया। वायु ने कहा - "मैं इस संसार की समस्त वस्तुओं को ग्रहण कर सकता हूँ ।" यक्ष ने वायु के समक्ष एक तिनका रखकर कहा - "इसे ग्रहण करो ।" वायु ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी किन्तु तिनके को तनिक भी न हिला सके । वे भी सिर नीचा किये लौट आये ।
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तत्पश्चात् सभी देवताओं ने इन्द्र को प्रेरित किया । इन्द्र के पहुँचते ही वह तेजस्वी यक्ष अन्तर्धान हो गया । इन्द्र तिरस्कृत होकर हतप्रभ हो गये । अग्नि और वायु की ही तरह उन्हें भी अपने "देवेन्द्रत्व" का जो अभिमान था, वह कपूर की तरह उड़ गया । वे चकित खड़े थे, कि वहा हैमवती भगवती उमा प्रकट हुई ।
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इन्द्र द्वारा प्रणति निवेदन करने पर भगवती उमा ने यक्ष का परिचय देते हुए कहा कि ब्रह्म {परमेश्वर} की शक्ति से देवों ने दानवोँ पर विजय प्राप्त की है किन्तु देवगणों को लगा कि यह विजय उन्होंने अपने बलबूते पायी है । इस प्रकार उनमें पैदा हुई अपनी शक्ति के मिथ्याभिमान को दूर करने के लिये ही उस सर्वशक्तिमान् ब्रह्म ने यक्ष का रूप धारण कर आप सबको अहङ्कार त्यागने की शिक्षा दी है ।
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नारायण ! दम्भ, दर्प, अभिमान, अहङ्कार, गर्व या घमण्ड का भाव केवल मनुष्य में ही नहीं अपितु हर योनि के जीवों में रहता है । देवों से लेकर सिद्ध ऋषि मुनि से होता हुआ कृमि - कीटों तक सर्वत्र यह व्याप्त है । वस्तुतः यह आसुर भाव या वृत्ति है । अन्तःकरण में इस वृत्ति के आजानेपर जीव में आसुरी प्रवृत्ति का उदय होता है, जो उसे पतन के मार्ग पर ले जाती है ।
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इसलिये हमारे अतिधन्य सन्त - महात्माओं ने सदैव अहङ्कार से दूर रहने का उपदेश दिया है । अहङ्कार अपने शरीर में स्थित वह कालानाग है जो अपने आश्रय को ही दंश मारता रहता है, अपने विष से व्याकुल किये रहता है । अहंकारी व्यक्ति अपने समक्ष किसी को कुछ भी नहीं गिनता । वह अधम होते हुए भी अपनेको सर्वोत्तम ख्यापित करता है ।
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अहंकार अपने साथ द्वेष और अमर्ष नामक दो बिच्छुओं को भी रख लेता है, जो गाहे - बगाहे डंक मारते रहते हैं । इन नागों बिच्छुओं की दवा है - विनम्रता, श्रद्धा, त्यागभावना और सेवापरायणता । जिन मनुष्यों में ये भाव दृढ़रूप से विद्यमान रहते हैं, उन्हें अहंकार छू भी नहीं सकता और यदि कदाचित् अहङ्कार का बीज कहीं से पड़ा हुआ है तो अङ्कुरित होने के पूर्व ही विनष्ट हो जाता है । इसलिये मनुष्यत्व, ऋषित्व और देवत्व, अहङ्कार रहित्व में ही है ।
सावशेष ......
हे हैमवती भगवती सबका मङ्गल करना ।

बुधवार, 3 जून 2015

= १९८ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरै साखि ।
दादू साबित सो सही, दूजा और न राखि ॥
करता है सो करेगा, दादू साक्षीभूत ।
कौतिकहारा ह्वै रह्या, अणकर्ता अवधूत ॥
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साभार : Rajesh Sharma Gumnam ~
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एक राजकुमार दीक्षित हुआ था। पहले दिन ही वह भिक्षा मांगने गया था। उसने, जिस द्वार पर बुद्ध ने भेजा था, भिक्षा मांगी। उसे भिक्षा मिली। उसने भोजन किया, वह भोजन करके वापस लौटा । लेकिन उसने बुद्ध को जाकर कहा, क्षमा करें, वहां मैं दुबारा नहीं जा सकूंगा। बुद्ध ने कहा, 'क्या हुआ ?'
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उसने कहा कि 'यह हुआ कि जब मैं गया, दो मील का फासला था, रास्ते में मुझे वे भोजन स्मरण आए, जो मुझे प्रीतिकर हैं । और जब मैं उस द्वार पर गया, तो उस श्राविका ने वे ही भोजन बनाए थे । मैं हैरान हुआ। मैंने सोचा, संयोग है । लेकिन फिर यह हुआ कि जब मैं भोजन करने बैठा, तो मेरे मन में यह खयाल आया कि रोज अपने घर था, भोजन के बाद दो क्षण विश्राम करता था। आज कौन विश्राम करने को कहेगा ! और जब मैं यह सोचता था, तभी उस श्राविका ने कहा, भंते, अगर भोजन के बाद दो क्षण रुकेंगे और विश्राम करेंगे, तो अनुग्रह होगा, तो कृपा होगी, तो मेरा घर पवित्र होगा ।
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तो मैं हैरान हुआ था। फिर भी मैंने सोचा कि संयोग होगा कि मेरे मन में खयाल आया और उसने भी कह दिया। फिर मैं लेटा और विश्राम करने को था कि मेरे मन में यह खयाल उठा कि आज न अपनी कोई शय्या है, न कोई साया है । आज दूसरे का छप्पर और दूसरे की दरी पर, दूसरे की चटाई पर लेटा हूं ।
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और तभी उस श्राविका ने पीछे से कहा, भिक्षु, न शय्या आपकी है, न मेरी है । और न साया आपका है, न मेरा है । और तब मैं घबरा गया । अब संयोग बार-बार होने मुश्किल थे । मैंने उस श्राविका को कहा, क्या मेरे विचार तुम तक पहुंच जाते हैं ? क्या मेरे भीतर चलने वाली विचारधाराएं तुम्हें परिचित हो जाती हैं ? उस श्राविका ने कहा, ध्यान को निरंतर करते-करते अपने विचार शून्य हो गए हैं और अब दूसरों के विचार भी दिखायी पड़ते हैं । तब मैं घबरा गया और मैं भागा हुआ आया हूं । और मैं क्षमा चाहता हूं, कल मैं वहां नहीं जा सकूंगा ।'
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बुद्ध ने कहा, 'क्यों ?' उसने कहा कि 'इसलिए कि...कैसे कहूं, क्षमा कर दें और न कहें वहां जाने को ।' लेकिन बुद्ध ने आग्रह किया और उस भिक्षु को बताना पड़ा । उस भिक्षु ने कहा, 'उस सुंदर युवती को देखकर मेरे मन में विकार भी उठे थे, वे भी पढ़ लिए गए होंगे। मैं किस मुंह से वहां जाऊं ? कैसे मैं उस द्वार पर खड़ा होऊंगा ? अब दुबारा मैं नहीं जा सकता हूं ।' बुद्ध ने कहा, 'वहीं जाना होगा । यह तुम्हारी साधना का हिस्सा है । इस भांति तुम्हें विचारों के प्रति जागरण पैदा होगा और विचारों के तुम निरीक्षक बन सकोगे ।' 
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मजबूरी थी, उसे दूसरे दिन फिर जाना पड़ा । लेकिन दूसरे दिन वही आदमी नहीं जा रहा था । पहले दिन वह सोया हुआ गया था रास्ते पर । पता भी न था कि मन में कौन-से विचार चल रहे थे । दूसरे दिन वह सजग गया, क्योंकि अब डर था । वह होशपूर्वक गया । और जब उसके द्वार पर गया, तो क्षणभर ठहर गया सीढ़ियां चढ़ने के पहले । अपने को उसने सचेत कर लिया । उसने भीतर आंख गड़ा ली । बुद्ध ने कहा था, भीतर देखना और कुछ मत करना । इतना ही स्मरण रहे कि अनदेखा कोई विचार न हो, अनदेखा कोई विचार न हो। बिना देखे हुए कोई विचार निकल न जाए, इतना ही स्मरण रखना बस ।
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वह सीढ़ियां चढ़ा, अपने भीतर देखता हुआ । उसे अपनी सांस भी दिखायी पड़ने लगी । उसे अपने हाथ-पैर का हलन-चलन भी दिखायी पड़ने लगा । उसने भोजन किया, एक कौर भी उठाया, तो उसे दिखायी पड़ा । जैसे कोई और भोजन कर रहा था और वह देखता था । जब आप दर्शक बनेंगे अपने ही, तो आपके भीतर दो तत्व हो जाएंगे, एक जो क्रियमाण है और एक जो केवल साक्षी है । आपके भीतर दो हिस्से हो जाएंगे, एक जो कर्ता है और एक जो केवल द्रष्टा है ।
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उस घड़ी उसने भोजन किया । लेकिन भोजन कोई और कर रहा था और देख कोई और रहा था । और हमारा मुल्क कहता है - और सारी दुनिया के जिन लोगों ने जाना है, वे कहते हैं - कि जो देख रहा है, वह आप हैं; और जो कर रहा है, वह आप नहीं हैं । उसने देखा, वह हैरान हुआ । 
.
वह नाचता हुआ वापस लौटा । और उसने बुद्ध को जाकर कहा, 'धन्य है, मुझे कुछ मिल गया । दो अनुभव हुए हैं; एक तो यह अनुभव हुआ कि जब मैं बिलकुल सजग हो जाता था, तो विचार बंद हो जाते थे ।' उसने कहा, 'एक अनुभव तो यह हुआ कि जब मैं बिलकुल सजग होकर देखता था भीतर, तो विचार बंद हो जाते थे । दूसरा अनुभव यह हुआ कि जब विचार बंद हो जाते थे, तब मैंने देखा, कर्ता अलग है और द्रष्टा अलग है ।' बुद्ध ने कहा, 'इतना ही सूत्र है । जो इसे साध लेता है, वह सब साध लेता है ।' विचार के द्रष्टा बनना है, विचारक नहीं । स्मरण रहे, विचारक नहीं, विचार के द्रष्टा ।

= १९७ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू मन ही मांहि समझ कर, मन ही मांहि समाइ ।*
*मन ही मांहि राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! अपने मन में ही राम - धन को स्मरण करके विचारपूर्वक परमेश्वर में लीन रहो । क्योंकि राम - धन ऐसा गुप्त धन है कि इसको मन में ही छिपा कर रखिये, किसी को कहकर नहीं बताना ॥४॥
.
*दादू समझ समाइ रहु, बाहरि कहि न जनाइ ।*
*दादू अद्भुत देखिया, तहँ ना को आवै जाइ ॥५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! सतगुरु उपदेश को और आत्म - तत्व को विचार करके समझो और उसी में लयलीन रहो । किन्तु बहिर्मुख होकर इस अपने भेद को किसी को नहीं कहना । इस प्रकार जो जरणावान पुरुष है, उसका आना - जाना नहीं होता है और गुरु उपदेश से आत्मा का जो साक्षात्कार हुआ है, उससे कभी विमुख नहीं होता । ऐसे जरणा करनेवाले साधक का और ब्रह्म का स्वरूप आश्चर्ययुक्त है । फिर उस स्थिति को प्राप्त करने के बाद उसमें व्यावहारिक प्रपंच कोई भी नहीं रहता है, अर्थात् सत्यस्वरूप से भिन्न नहीं होता है ॥५॥
.
*कहि कहि क्या दिखलाइये, सांई सब जाने ।*
*दादू प्रगट क्या कहै, कुछ समझि सयाने ॥६॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यह विश्वास रखिए कि घट - घट अन्तर्यामी प्रभु तेरे शुभ - अशुभ कार्यों को हृदय में ही स्थित होकर सब देख रहे हैं । उस प्रभु के सामने तुम अपने भक्तिभाव को क्या प्रकट करते हो ? क्योंकि इससे तुम्हारा द्वैतभाव प्रकट होगा । इसलिये अपनी उत्तम करणी, भजन भाव, आदि को सांसारिक लोगों को भी कहकर नहीं सुनाना, क्योंकि कहने से एक तो पतिव्रत खंडित होगा और द्वितीय, भजनभाव आदि का फल नष्ट हो जाएगा ॥६॥
"बाहर कहि न जनाइये, भीतर क्रिया साध ।
जगन्नाथ प्रगट किये, ह्वै अंतराइ उपाध ॥"
देख संत को तबकली, मैं क्यूं हूँ परसीध ।
लुख्यो जाइ आये प्रभु, तब खंकार्यो कीध ॥
दृष्टान्त - एक संत से किसी पुरुष ने प्रश्न किया कि आप दुनियां में प्रसिद्ध हो रहे हो और दुनियां आपको मानती है, इसका क्या कारण है ?
संत बोले - हम रामजी का भजन करते हैं और राम का विश्वास रखते हैं ।
तब वह पुरुष बोला - "मैं भी राम का विश्वास कर लूं ।"
संत बोले - "हाँ, जरूर करो ।"
"तुम्हारी तरह प्रकट हो जाऊँगा ?"
संत बोले - "जरूर हो जाओगे ।"
"कहाँ विश्वास करूँ ?"
संत बोले - जंगल में जा और हृदय में राम का विश्वास धारकर मुख से राम - नाम का उच्चारण कर ।"
तबकली बोला - "रोटी कहाँ से खाऊँगा ?"
संत - "जिसका भजन करेगा, वे आप ही लाकर देंगे ।"
संत के वचन में विश्वास कर के जंगल में जा बैठा । दो दिन तक कोई कुछ भी नहीं लाया । तीसरे दिन राम जी ने देखा कि यह तो संत - वचन में विश्वास किये बैठा है, अब तो मैं रोटी ले कर चलूं । दो रोटी और सब्जी लेकर जमींदार का रूप बनाकर उसके पास आए । बोले - "ले रोटी खा ले ।" रोटी खाई, पानी पीया और फिर ध्यान में बैठ गया । रोटी खिलाने वाला अंतर्ध्यान हो गया ।
इस प्रकार तीन रोज तक रोटियां ला - ला कर खिलाते रहे । चौथे दिन राम जी ने विचार किया - इसकी परीक्षा तो कर लें ? इसको मेरा विश्वास है भी कि नहीं ? तब बहुत देर लगा दी । वह बैठा - बैठा इधर - उधर झाँकने लगा और विचार किया, "आज रोटी लेकर नहीं आया ? क्या बात हुई ? कहीं भूल तो नहीं गया है ?"
राम जी ने देखा - इसके मन में घुड़दौड़ मच गई है । तब अचानक बहुत दूर इसको आते दिखलाई पड़े । फिर राम जी जरा टेढ़े - टेढ़े दूसरे रास्ते पर जाने लगे ।
तब यह जरा ऊँचा - ऊँचा होकर देखने लगा, घुटनों के बल खड़ा हो गया । फिर और भी टेढ़े चले राम जी । तो यह बिल्कुल खड़ा हो गया और सोचने लगा, "मुझे आज उसने देखा नहीं ।" तब तो दोनों हाथ ऊँचे उठा लिए, फिर भी राम जी उधर नहीं झाँके । तब तीन खँकारे किये । राम जी फिर भी नहीं झाँके ।
तब बोला - "मैं यहाँ हूँ । इधर आ, इधर ।" राम जी अन्तर्धान हो गए । यह सोचने लगा, "वह तो अब दिखलाई नहीं देता है ।"
तब आवाज हुई, "हे बंदे ! तैंने विश्वास त्याग दिया मेरा । क्या खँकारे करता हैं ? मैं तो घट - घट की जानता हूँ । अब जा, हल चला, कमा कर खा ।" वह मन में पश्चाताप करता हुआ अपने घर चला आया ।
.
दादू मन ही मांहैं ऊपजै, मन ही मांहि समाइ ।
मन ही मांहैं राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥७॥
टीका - हे जिज्ञासुओं ! मन में ही आत्मज्ञान उपजता है और उसको मन में ही रखना चाहिए । मन में ही ब्रह्म में लीन होना । अपने मन में ही ब्रह्मानन्द का अनुभव करना । किसी अनधिकारी को कहकर नहीं सुनाना । अथवा जो कुछ अच्छी - बुरी मन में उत्पन्न होवे अपनी - पराई, उसको मन में ही रखना, जरणा करना ॥७॥

मंगलवार, 2 जून 2015

= १९६ =

卐 सत्यराम सा 卐
दादू जा कारण जग ढूंढिया, 
सो तो घट ही मांहि ।
मैं तैं पड़दा भरम का, तातैं जानत नांहि ॥
दादू दूर कहैं ते दूर हैं, राम रह्या भरपूर ।
नैनहुं बिन सूझै नहीं, तातैं रवि कत दूर ॥
=====================
साभार ~ Ramjibhai Jotaniya ~
"जिसे भी खोजा जा सके वह सत्य
हो नही सकता, जहाँ पर जाकर सारी खोजे
और खोजी समाप्त हो जाता है, फिर जो शेष
रह जाता है वह सत्य है"
-- स्वामी शून्यानन्द
"That which can be found cannot
be true, where all the search and
the investigative ends, then what
remains is the truth"

= १९५ =

卐 सत्यराम सा 卐
*मैं मेरे में हेरा,*
*मध्य मांहिं पीव नेरा ॥टेक॥*
*जहाँ अगम अनूप अवासा,*
*तहँ महापुरुष का वासा ।*
*तहँ जानेगा जन कोई,*
*हरि मांहि समाना सोई ॥१॥*
*अखंड ज्योति जहँ जागै,*
*तहँ राम नाम ल्यौ लागै ।*
*तहँ राम रहै भरपूरा,*
*हरि संग रहै नहिं दूरा ॥२॥*
*तिरवेणी तट तीरा,*
*तहँ अमर अमोलक हीरा ।*
*उस हीरे सौं मन लागा,*
*तब भरम गया भय भागा ॥३॥*
*दादू देख हरि पावा,*
*हरि सहजैं संग लखावा ।*
*पूरण परम निधाना,*
*निज निरखत हौं भगवाना ॥४॥*
.
जब मैंने ध्यान के द्वारा अपनी आत्मा में उस परमात्मा को खोजा तो अति समीप ही हृदय-प्रदेश के मध्य में ही उस आत्मा को प्राप्त किया । बाह्य इन्द्रियों से अगम्य, अनुपम जो अष्टदल कमल है, वहां पर उस परमात्मा का विशिष्ट निवास स्थान है । वहां पर स्थित उस परमात्मा को जो ध्यान के द्वारा देखता है वह उसी में लीन हो जाता है ।
.
जहां पर हृदय प्रदेश में आत्मा की अखण्ड ज्योति जल रही है, जहां पर राम नाम की साधना द्वारा अन्तःकरण की वृत्ति स्थिर रहती है, वहीँ पर सर्व व्यापक ब्रह्म विशेष रूप से विराजता है । अतः परमात्मा सर्वरूप होने से सब के साथ ही है, दूर नहीं ।
.
जहां पर इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, नाड़ियों का संगम है जिसको त्रिवेणी कहते हैं, उसके किनारे पर ध्यान द्वारा हीरे के समान अमूल्य जो ब्रह्म है, उसका ज्ञान प्राप्त किया । उस ज्ञान से मेरे भ्रम और भय नष्ट हो गये और उसी ज्ञान से मैंने ब्रह्म को प्राप्त कर लिया । इस समय मैं सब के आश्चर्य-स्वरूप पूर्ण ब्रह्म को निरन्तर देखता हूँ ।
.
श्वेताश्व में लिखा है कि-
यह अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला अन्तर्यामी परम पुरुष सदा ही मनुष्यों के हृदय में सम्यक् प्रकार से स्थित है और वह मन का स्वामी है । निर्मल हृदय और निर्मल मन से ध्यान में लाया हुआ प्रत्यक्ष है । जो इस परमेश्वर को जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ।
.
हठयोग में-
बाहर की ओर निर्निमेष दृष्टि और भीतर की तरफ लक्ष्य हो, उसको सब तंत्रों में गुप्त वैष्णवी=मुद्रा कहते हैं, जिससे ब्रह्म का साक्षात्कार होता है ।

सोमवार, 1 जून 2015

= १९४ =


卐 सत्यराम सा 卐
साहिब को सुमिरै नहीं, बहुत उठावै भार ।
दादू करणी काल की, सब परलै संसार ॥ 
सूता काल जगाइ कर, सब पैसैं मुख मांहि ।
दादू अचरज देखिया, कोई चेतै नांहि ॥
============================
साभार ~ Brajendra Seth ~

यक्ष ने प्रश्न किया – मनुष्य का साथ कौन देता है ?
युधिष्ठिर ने कहा – धैर्य ही मनुष्य का साथ देता है.
यक्ष – यशलाभ का एकमात्र उपाय क्या है ?
युधिष्ठिर – दान.
यक्ष – हवा से तेज कौन चलता है ?
युधिष्ठिर – मन.
यक्ष – विदेश जानेवाले का साथी कौन होता है ?
युधिष्ठिर – विद्या.
यक्ष – किसे त्याग कर मनुष्य प्रिय हो जाता है ?
युधिष्ठिर – अहम् भाव से उत्पन्न गर्व के छूट जाने पर.
यक्ष – किस चीज़ के खो जाने पर दुःख नहीं होता ?
युधिष्ठिर – क्रोध.
यक्ष – किस चीज़ को गंवाकर मनुष्य धनी बनता है ?
युधिष्ठिर – लोभ.
यक्ष – ब्राम्हण होना किस बात पर निर्भर है ? जन्म पर, विद्या पर, या शीतल स्वभाव पर ?
युधिष्ठिर – शीतल स्वभाव पर.
यक्ष – कौन सा एकमात्र उपाय है जिससे जीवन सुखी हो जाता है ?
युधिष्ठिर – अच्छा स्वभाव ही सुखी होने का उपाय है.
यक्ष – सर्वोत्तम लाभ क्या है ?
युधिष्ठिर – आरोग्य.
यक्ष – धर्म से बढ़कर संसार में और क्या है ?
युधिष्ठिर – दया.
यक्ष – कैसे व्यक्ति के साथ की गयी मित्रता पुरानी नहीं पड़ती ?
युधिष्ठिर – सज्जनों के साथ की गयी मित्रता कभी पुरानी नहीं पड़ती.
यक्ष – इस जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?
युधिष्ठिर – रोज़ हजारों-लाखों लोग मरते हैं फिर भी सभी को अनंतकाल तक जीते रहने की इच्छा होती है. इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है ?

= १९३ =


#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
परब्रह्म परापरं, सो मम देव निरंजनम् ।
निराकारं निर्मलं, तस्य दादू वन्दनम् ॥
=========================
साभार ~ hindi.webdunia.com
ईश्वर एक ही है कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। उसे ही ब्रह्म, परब्रह्म, परमात्मा और परमेश्वर कहा जाता है। वह निराकार, निर्गुण और अजन्मा है। उसकी कोई मूर्ति नहीं बनायी जा सकती। वेद अनुसार उसे छोड़कर और किसी की पूजा और प्रार्थना करने वाला उसके लोक में न जाकर जन्म-जन्मांतर तक भटकता रहता है। उसको जो याद करता रहता है उसके सभी दुख मिट जाते हैं। देवता, दानव, भगवान पितर आदि सभी उसी ईश्वर के अधिन है। वे सब भी उसी की प्रार्थना करते हैं।

रविवार, 31 मई 2015

= १९२ =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
दादू अनुभव काटै रोग को, अनहद उपजै आइ ।
सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौ लाइ ॥
सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तत सार ।
सुनतां ही साहिब मिलै, मन के जाहिं विकार ॥
=====================
साभार : Ramjibhai Jotaniya ~

एक बाग है, अनुभव का,
उसमें खिले हैं भाव पुष्प ये पुष्प
बरसों का निदाघ झेल कर
बड़े हुए ये पुष्प समय के शेष नाम हैं,
अनुभव का अपना एक पूरा आकाश है
उस आकाश में उगा है एक चाँद,
चाँद की एक जिद है
अनवरत वह रोज-ब-रोज
मुझे समझाना चाहता है,
मैं उस चाँद के डूब जानेकी 
प्रतीक्षा करती हूँ,
अनुभव एक कौतुक है
अपने होने का और खुद को
खोने के बीच के सफर का,
जहाँ जाता है रास्ता सिफर का.... ॐ

= १९१ =


#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
भाई रे घर ही में घर पाया ।
सहज समाइ रह्यो ता मांही, सतगुरु खोज बताया ॥टेक॥
ता घर काज सबै फिर आया, आपै आप लखाया ।
खोल कपाट महल के दीन्हें, स्थिर सुस्थान दिखाया ॥१॥
भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया ।
पिंड परे जहाँ जिव जावै, ता में सहज समाया ॥२॥
निश्चल सदा चलै नहिं कबहूँ , देख्या सब में सोई ।
ताही सौं मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥३॥
आदि अनन्त सोई घर पाया, अब मन अनत न जाई ।
दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥४॥
===================
साभार : राधा शरण दास ~
किसी ने मिलने पर पूछा कि कहाँ से आ रहे हो? दास ने उत्तर दिया-"धर्मशाला से"। उन्होंने परिहास-व्यंग से बुद्धि का प्रयोग कर कहा-"अच्छा ! बहुत दूर से ! धर्मशाला तो हिमाचल प्रदेश में है !"
दास ने उत्तर दिया कि दास के लिये "धर्मशाला" का अर्थ यह भौतिक संसार है; यहाँ दास का "घर" नहीं है; न ही दास यहाँ का है, न ही होना चाहता है। यहाँ तो कुछ दिनों का ठहराव है किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु ! किन्तु यहाँ "घर" नहीं बनाना है; मुझे तो लौटना है, जहाँ से आया हूँ, वापस अपने "घर" ! अपने "प्रियजन" के समीप ! 
यही तो स्मरण रखना है कि हम कहाँ से आये हैं; और यहाँ कब तक और क्यूँ हैं। यहाँ "घर" मत बना लेना। यात्रा में कम से कम वस्तुओं का भार ताकि असुविधा न हो। कुछ दिन ठहरना है फ़िर छोड़कर चल देना है। यहाँ "घर" बना लिया तो लौट न सकोगे क्यूँकि दास ने अनुभव किया है कि जिसने भी घर बना लिया, वह बँधन में आ गया। कहीं जाने की कहो तो उत्तर मिलता है कि "घर" को खाली छोड़कर कैसे जावें ! किन्तु "घर" तो छूटेगा ही ! राजी-राजी, गैर-राजी ! आये थे हरि-भजन को, ओटन लगे कपास !
जय जय श्री राधे !

शनिवार, 30 मई 2015

= १९० =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
आदि शब्द ओंकार है, बोलै सब घट माँहि ।
दादू माया विस्तरी, परम तत्त यहु नांहि ॥ 
दादू ओंकार तैं ऊपजै, अरस परस संजोग ।
अंकुर बीज द्वै पाप पुण्य, इहि विधि जोग रु भोग ॥ 
ओंकार तैं ऊपजै, विनशै बहुत विकार ।
भाव भक्ति लै थिर रहै, दादू आतम सार ॥
पहली किया आप तैं, उत्पत्ति ओंकार ।
ओंकार तैं ऊपजै, पंच तत्त्व आकार ॥ 
पंच तत्त्व तैं घट भया, बहु विधि सब विस्तार ।
दादू घट तैं ऊपजै, मैं तैं वर्ण विकार ॥ 
एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समर्थ सोइ ।
आगै पीछे तो करै, जे बलहीना होइ ॥ 
निरंजन निराकार है, ओंकार आकार ।
दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥ 
=================
साभार ~ Ramjibhai Jotaniya ~
ॐ में सारा ब्रह्माण्ड सम्मिलित है, हमारे जीवन, विचार व बुद्धि का यह प्रतीक है और आधार है, इस विश्व का आदि व अन्त ॐ में ही है, हमारी चेतन या सुषुप्तावस्था में जो कुछ हम देखते हैं या अनुभव करते हैं उससे भी परे जहाँ बुद्धि का प्रवेश भी नहीं है, वह भी ॐ ही है, यह समस्त ब्रह्माण्ड ॐ का ही प्रसार है.... 
ॐ ही शान्ति, आनन्द, ज्ञान, शक्ति तथा परमं अस्तित्व स्वरूप है, ॐ ही सत्य, शिवं तथा सुन्दरं का उद्घोष है, अत: मानव-जीवन का शाश्वत आध्यात्मिक कल्याणकारी लक्ष्य ॐ का ध्यान कर आत्मसाक्षात्कार द्वारा जीवन को ओममय बना कर ॐ में ही विलीन हो जाना है, इस संदर्भ में जो प्रयास हैं वे ही साधना, तपस्या तथा भक्ति के नाम से जाने जाते हैं ॐ में विलीन होना ही मोक्ष है, कल्याण है, मंगल है, आवागमन से मुक्ति है ! ॐ

= १८९ =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
दादू कोई काहू जीव की, करै आत्माघात |
साच कहूँ संशय नहीं, सो प्राणी दोज़ख जात ||४||
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! कोई भी मनुष्य किसी भी जीव की जो हिंसा करेगा अर्थात् मारेगा, वह मनुष्य अवश्य नरक की त्रास भोगेगा | हम सत्य कहते हैं, इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है ||४||
If anyone takes the life of any other creature, That person goes to hell; I tell you the truth, there is no doubt about it, says Dadu.
शुक्रशोणितसंभूतं ये नरा भुंजते फलम् |
नरकात् नातिवर्तन्ते यात चन्द्रदिवाकरौ ||
असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः |
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ||
(आत्मा की हत्या करने वाले मनुष्य मरणोपरान्त अंधकारपूर्ण भयंकर आसुरी लोकों में अत्यन्त कष्ट भोगते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है |) - महाभारत
मद पीवै मूरति हतै, रसन स्वाद कर खांय |
जगन्नाथ ते अवसि कर, दोजग ही को जाय ||
.
ब्रह्मऋषि दादूदयाल महाराज के उपर्युक्त अहिंसा उपदेश को सुनकर, सांभर शहर में काजी मुल्लाओं ने अपने धर्म की महानता का वर्णन करते हुए कहा कि हमारे यहाँ तो कुर्बानी करते हैं और मांस खाते हैं | तब महाराज ने कहा ~
दादू नाहर सिंह सियाल सब, केते मुसलमान |
मांस खाइ मोमिन भये, बड़े मियां का ज्ञान ||५||
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! जैसे पशुओं में नाहर, सिंह, गीदड़, वे सब मांस खाने वाले जानवर हैं | ऐसे ही हे काजियों ! हे मुल्लाओं ! कितने ही मुसलमान मांस खाते हैं, जीव - हिंसा करते हैं और फिर अपने को मोमिन कहलाते हैं, परन्तु यह ज्ञान तो बड़े मियां मोहम्मद साहब का नहीं है | वे तो प्राणी मात्र से प्यार करते थे || ५ ||
पश्‍चात भवन्ति जात्यन्धाः काणाः कुब्जाश्र्य पंगवः |
दरिद्रा अंगहीनश्र्य पुरुषाः प्राणि - हिंसका ||
(प्राणियों की हिंसा करने वाले अन्धे, काणे, कूबड़े, दरिद्र और विकलांग पैदा होते हैं |)
.
दादू मांस अहारी जे नरा, ते नर सिंह सियाल |
बक १, मंजार २, सुनहाँ ३, सही, एता प्रत्यक्ष काल ||६||
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! यह हम सत्य कहते हैं कि जो प्राणी मांस आहार करने वाले हैं, वे इस मनुष्य शरीर में ही सिंह, श्याल, बगुला१, मार्जार२(बिलाव), कुत्ता३ रूप हैं और ऐसा समझो कि मानो काल ही जीवों का नाश करने के लिये यह शरीर धर कर प्रकट हो रहा है ||६||
जैसे आतम आपनी, कांटा तैं कसकात |
‘जगन’ जीव में जोइये, ना कर काहू घात ||
(श्री दादू वाणी~साँच का अंग)

शुक्रवार, 29 मई 2015

= १८८ =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
दादू बिन रसना जहँ बोलिये, तहँ अंतरयामी आप ।
बिन श्रवणहुँ सांई सुनै, जे कुछ कीजे जाप ॥
ज्ञान लहर जहाँ थैं उठै, वाणी का परकास ।
अनुभव जहाँ थैं उपजे, शब्दैं किया निवास ॥
=================
Ramjibhai Jotaniya ~ अलौकिक शक्तियां ईश्वर का संकेत है अंतरात्मा की आवाज
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दैनिक जीवन में अक्सर देखते हैं कि दरवाजे की घंटी बजते ही मन में ख्याल आता है कि इस समय दरवाजे पर अमुक व्यक्ति ही होगा और दरवादा खोलने पर जिसका ख्याल आया था वही व्यक्ति होता है। इस प्रकार कभी-कभी अपने किसी मित्र से मिलने के लिए उसके घर पर जा रहे होते हैं कि अचानक दिमाग में विचार कौंधता है कि इस समय दोस्त के यहां जाना व्यर्थ होगा। वह नहीं मिलेगा।
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परंतु नहीं मानते और चल पड़ते हैं तथा वाकई में दोस्त नहीं मिलता हैं। ऐसा भी होता है कि किसी रिश्तेदार या अभिन्न मित्र का ख्याल बार-बार आता है और यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि ऐसा क्यों हो रहा है ? तभी उस दोस्त या रिश्तेदार के साथ कोई हादसा होने की खबर मिलती है। क्या यह सब संयोग है ? नहीं, यह संयोग नहीं है।
.
आम भाषा में इसे अंतरात्मा की आवाज कहा जाता है। अनुभवियों का मानना है कि यह आवाज सभी के लिए कार्य करती है। सवाल सिर्फ इसको समझने और पहचानने का है तथा इसपर अटूट विश्वास करने पर ही और अभ्यास से इसे समझा तथा पहचाना जा सकता है। यह आंतरिक शक्ति अच्छाई और बुराई का भी ज्ञान कराती है।
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उदाहरण के लिए रास्ते में एक सौ का नोट पड़ा मिलता है, तो उसे तुरंत रख लेते हैं, परंतु आंतरिक शक्ति बताती है कि यह ठीक नहीं है। परंतु उस पर ध्यान नहीं देते हैं। बात वहीं विश्वास की है। यदि इसपर विश्वास करेंगे, तो अंतरात्मा की आवाज भी उतनी ही विकसित होगी और उसका अनुसरण कर बहुत लाभ ले सकते हैं।
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ध्यान रहे, अंतरात्मा की आवाज ईश्वरप्रदत्त संकेत है जिसमें आत्मा माध्यम है। इसको पूर्णतया जागृत करने के लिए विश्वास के अतिरिक्त, मस्तिष्क में जब भी किसी भी प्रकार का विचार आये, तो गंभीरता से यह जानने का प्रयत्न करें कि यह विचर अचानक जागृत करने में आसानी होगी। जैसे अमुक कार्य करने जा रहे हैं, तो ख्याल आता है कि इसे अभी न करें।
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चार दिन बाद कीजिए और देखेंगे की वह कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हो जाता है। यदि ईश्वर में विश्वास रखते हैं यानी आस्तिक है, तो यह तय है कि अंतरात्मा की आवाज शीघ्र जागृत हो जाएगी। ज्यों-ज्यों विश्वास बढ़ेगा, त्यों -त्यों अंतरात्मा की आवाज जागृत होगी। आज विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक इसे छठी इंद्रिय और सुपर चेतना के नाम से भी पुकारते हैं।
.............हर-हर महादेव

= १८७ =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
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दादू राम मिलन के कारणे, जे तूँ खरा उदास ।
साधु संगति शोध ले, राम उन्हीं के पास ॥
ब्रह्मा शंकर सेष मुनि, नारद ध्रुव शुकदेव ।
सकल साधु दादू सही, जे लागे हरि सेव ॥
साधु कंवल हरि वासना, संत भ्रमर संग आइ ।
दादू परिमल ले चले, मिले राम को जाइ ॥
=====================
साभार ~ Ramjibhai Jotaniya ~
प्रेम का दीप शाश्वत जगमगाता है, हृदय के कोटर में बाहर कितना ही अन्धकार फैला हो निराशा का विषम परिस्थितियों में प्रेम निःशब्द छुपा रहता है, हृदय के "भाव-संसार" में किसी अनकही कविता की उद्विग्न पंक्तियों की भांति, सच्चा प्रेम समेटे रहता है, अपनी सम्पूर्ण मोहकता व सृजनात्मकता भीतर ही खिलने को बेताब किसी फूल की कोमल कली की तरह, प्रेम को जरुरत नहीं होती प्रस्फुटन की प्रतीक्षा के पूर्ण होने की, वह संतुष्ट रहता है, कमल के पुष्पों की भांति ह्रदय में खिलकर भी, सच्चा प्रेमी वही होता है, जो अपने सारे विषाद को भीतर ही भीतर पचाकर नीलकंठ की भाँति इस संसार में सबके लिए एक कतरा मुस्कान बाँटता है !

गुरुवार, 28 मई 2015

= १८६ =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
.
*मार्कंडेय की शिव भक्ति*
पुत्र प्राप्ति की कामना से मृकंडु ऋषि ने घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र होने का वरदान दिया। किंतु उसकी आयु मात्र सोलह वर्ष निर्धारित कर दी। शिव की कृपा से प्राप्त पुत्र का नाम मार्कंडेय रखा गया। |
.
वह बड़ा ही मेधावी था और सोलह वर्ष के पहले ही वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। कम आयु की बात से माता बहुत चिंतित रहती थी। उदास माता से जब अल्पायु की बात मार्कंडेय को ज्ञात हुई तब वह शिव की भक्ति और स्तोत्र पाठ में संलग्न हो गया।
.
आयु पूरी होने पर उसका प्राण हरण करने के लिए जब यमराज पहुंचे तब उसने यमराज को अपनी शिव पूजा की समाप्ति तक रुकने के लिए कहा। क्रोधित यमराज जब उसे मारने दौड़े तब उसने यमराज से अनुरोध किया कि कृपया मेरी पूजा बाधा न डालें, इसे पूरा हो जाने दें। मैं स्वत: आपके साथ जाने के लिए तैयार हो जाऊंगा।
.
उसकी धृष्टता देख यमराज क्रोधित हो उस पर काल पाश फेंकने के लिए तत्पर हो गए। लेकिन बिना देर किए भोले शंकर अपने भक्त के बचाव में प्रकट हो गये। मृत्यु के स्वामी भोले शंकर को मार्कंडेय के बचाव में खड़े देख यमराज रुक गये। मार्कंडेय भोले शंकर के चरणों में समर्पित हो गये। मार्कंडेय को अमरत्व का वरदान देते हुए यमराज को भी उन्होंने चेतावनी दी कि जो मेरी भक्मेंति लगा हो उसे प्रताड़ित करने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है।
=============
रोम रोम लै लाइ धुनि, ऐसे सदा अखंड ।
दादू अविनाशी मिले, तो जम को दीजे दंड ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! जब यह मन भक्ति - परायण होकर ब्रह्म में लीन होता है और फिर रोम - रोम से ब्रह्म - ध्वनि होने लगे, उस अवस्था में यह जीव यम रूप काल से निर्भय हो जाता है ॥
अष्ट चक्र पवना फिरै, छह सहस्र इक्कीस ।
जोग अमर जम को गिलै, दादू बिसवा बीस ॥
छह सहस्र इक्कीस का, अजपा जाप विचार ।
यों दादू निज नांव ले, काल पुरुष को मार ॥
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दादू जरा काल जामण मरण, जहाँ जहाँ जीव जाइ ।
भक्ति परायण लीन मन, ताको काल न खाइ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासु ! जर्जर अवस्था, काल, जन्मना - मरना, यह जीव कर्मानुसार जहाँ भी जाता है, ये सब इसके साथ ही रहते हैं । परन्तु जब निष्काम परमेश्वर की भक्ति में मन लीन होता है, उसको फिर काल नहीं खाता । वह फिर काल से मुक्त हो जाता है ॥

= १८५ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
साध कहैं उपदेश विरहणी !
तन भूले तब पाइये, 
निकट भया परदेश, विरहणी ॥टेक॥
तुम ही माहैं ते बसैं, 
तहाँ रहे कर वास ।
तहँ ढ़ूँढ़े पीव पाइये, 
जीवन जीव के पास, विरहणी ॥१॥
परम देश तहँ जाइये, 
आतम लीन उपाइ ।
एक अंग ऐसे रहै, 
ज्यों जल जलहि समाइ, विरहणी ॥२॥
सदा संगाती आपणा, 
कबहूँ दूर न जाइ ।
प्राण सनेही पाइये, 
तन मन लेहु लगाइ, विरहणी ॥३॥
जागै जगपति देखिये, 
प्रकट मिल है आइ ।
दादू सन्मुख ह्वै रहै, 
आनन्द अंग न माइ, विरहणी ॥४॥
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साभार ~ Ramjibhai Jotaniya
Prakriti Rai ~
प्रातः का यह आस-पंछी सांझ होते खो न जाये,
किलकता जीवन कहीं फिर रैन- शैया सो न जाये,
घेर लेती जब निराशा हृदय व्याकुल ठाँव माँगे है,
मन का एक कोना शांत मधुवन- छाँव मांगे है"
सरल मन की देहरी पर आए पाहुन, लिए सजल सपने,
प्रीति सुंदर रूप धरती, सभी दुश्मन - दोस्त अपने,
भ्रमित है मन, झूठे जग में सहज पथ के गाँव माँगे है'
नयनो ने कई मौसम- रंग देखे घटा सावन,धूप-छाया,
कड़ी दुपहर, कृष्ण-रातें, दुख-घनेरे, भोग, माया'
क्लांत है जीवन-पथिक यह, राह तरुवर-छाँव मांगे है" ! ॐ

बुधवार, 27 मई 2015

= १८४ =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
एक कहूँ तो दोइ हैं, दोइ कहूँ तो एक ।
यों दादू हैरान है, ज्यों है त्यों ही देख ॥
देख दीवाने ह्वै गए, दादू खरे सयान ।
वार पार कोई ना लहै, दादू है हैरान ॥
दादू करणहार जे कुछ किया, सोई हौं कर जाण ।
जे तूं चतुर सयाना जानराइ, तो याही परमाण ॥
दादू जिन मोहनि बाजी रची, सो तुम्ह पूछो जाइ ।
अनेक एक तैं क्यों किये, साहिब कहि समझाइ ॥
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साभार ~ Ramjibhai Jotaniya ~

आप सभी मेरे प्रिय आत्मीय मित्रों से मेरा हार्दिक निवेदन है की मेरे प्रश्न का उत्तर दे कर हमें संतुष्ट करें, दो शब्द में आपका सटीक उत्तर चाहिए ! परन्तु मित्रों आप सभी अपनी अभिव्यक्ति दें अवश्य ~:
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तुम हो अम्बर, मैं दिगंबर, भेद कैसा नाथ ?
मोक्ष हो तुम मुक्ति हूँ मैं ऐसा अपना साथ !
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है कौन सा वो तत्व जो सारे भुवन में व्याप्त है ?
ब्रह्माण्ड पूरा भी नहीं जिसके लिये पर्याप्त है ?
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है कौन सी वह शक्ति, मित्रों है कौन सा वह भेद ?
बस ध्यान ही जिसका मिटाता आपका सब खेद ?
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बिछुड़े हुओं का हृदय कैसे एक रहता है, अहो !
ये कौन से आधार के बल कष्ट सहते हैं, कहो ?
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क्या हेतु, जो मकरंद पर हैं भ्रमर मोहित हो रहे ?
क्यों भूल अपने को सभी सुधि-बुधि अपनी खो रहे ?
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आकाश में, जल में, हवा में, विपिन में क्या बाग में,
घर में, हृदय में, गाँव में, तरु में तथैव तड़ाग में,
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है कौन सी यह शक्ति जो है एक सी रहती सदा,
जो है जुदा करके मिलाती, मिलाकर करती है जुदा ?
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यह देखिए, अरविन्द से शिशुवृंद कैसे सो रहे,
है नेत्र माता के इन्हें लख तृप्त कैसे हो रहे,
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क्यों खेलना, सोना, रुदन करना विहँसना आदि सब,
देता अपरिमित हर्ष उसको देखती वह इन्हें जब ?
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यह वायु चलती वेग से, ये देखिए तरुवर झुके,
हैं आज अपनी पत्तियों में हर्ष से जाते लुके,
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क्यों शोर करती है नदी, हो भीत पारावर से,
वह जा रही उस ओर क्यों ? एकान्त सारी धार से ?
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चैतन्य को जड़ कर दिया, जड़ को किया चैतन्य है,
बस प्रेम की अद्भुत, अलौकिक उस प्रभा को धन्य है,
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क्यों, कौन सा है वह नियम, जिससे कि चालित है मही ?
वह तो वही है, जो सदा ही दीखता है सब कहीं। ॐ

= १८३ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
आज्ञा अपरंपार की, बसि अंबर भरतार ।
हरे पटंबर पहरि करि, धरती करै सिंगार ॥ 
वसुधा सब फूलै फलै, पृथ्वी अनंत अपार ।
गगन गर्ज जल थल भरै, दादू जै जै कार ॥ 
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साभार ~ Ramjibhai Jotaniya 
~ Prakriti Rai
हरित पल्लवित नववृक्षों के दृश्य मनोहर,
होते मुझको विश्व बीच हैं जैसे सुखकर, 
सुखकर वैसे अन्य दृश्य होते न कभी हैं, 
उनके आगे तुच्छ लगते मुझे सभी हैं, 
छोटे- छोटे झरने जो बहते सुखदाई, 
जिनकी अद्भुत शोभा सुखमय होती भाई, 
पथरीले पर्वत विशाल वृक्षों से सज्जित, 
बड़े-बड़े बागों को जो करते हैं लज्जित, 
लता विटप की ओट जहाँ गाते हैं द्विजगण 
शुक, मैना हारील जहाँ करते हैं विचरण, 
ऐसे सुंदर दृश्य देख सुख होता जैसा 
और वस्तुओं से मुझे न कभी होता सुख वैसा, 
छोटे-छोटे ताल पद्म से पूरित सुंदर, 
बड़े- बड़े मैदान दूब छाई श्यामलतर ! 
भाँति-भाँति की लता वल्लरी हैं जो सारी 
ये सब मुझको सदा हृदय से लगती न्यारी, 
इन्हें देखकर मन मेरा प्रसन्न होता है,
सांसारिक दुःख ताप तभी छिन में खोता है,
पर्वत के नीचे अथवा सरिता के तट पर
होती हूँ मैं सुखी बहुत स्वच्छंद विचरकर,
नदी तथा समुद्र, बन बाग घनेरे, 
जग में नाना दृश्य प्रकृति ने चहुँ दिशि घेरे, 
तरुओं पर बैठे ये द्विजगण चहक रहे हैं, 
खिले फूल सानंद हास मुख महक रहे हैं, 
वन में त्रिविध बयार सुगंधित फैल रही है,
कुसुम व्याज से अहा चित्रमय हुई मही है, 
इन दृश्यों को देख हृदय मेरा भर जाता 
बारबार अवलोकन कर लगे इनसे है चिरनाता, 
देखूँ नित नव विविध प्राकृतिक दृश्य गुणाकर, 
यही विनय मैं करती तुझसे हे करुणाकर ! ॐ

मंगलवार, 26 मई 2015

= १८२ =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
दादू पाणी धोवैं बावरे, मन का मैल न जाइ ।
मन निर्मल तब होइगा, जब हरि के गुण गाइ ॥ 
दादू काले थैं धोला भया, दिल दरिया में धोइ ।
मालिक सेती मिलि रह्या, सहजैं निर्मल होइ ॥ 
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साभार ~ चतुर्दिक अभ्युदय ~ 
बौद्ध ग्रन्थ सुत्तपिटक में संकलित थेरी गाथा में उन्ना नामक एक दासी जो अपने स्वामी के लिए प्रतिदिन सुबह नदी का पानी लेने जाती थी और एक ब्राह्मण जो प्रतिदिन नदी के जल में स्नान करने आता था, उन्ना की बातचीत से ये भलीभांति स्पष्ट हो जाता है कि बौद्ध धर्म में व्यर्थ के आडम्बरों एवं कर्मकांडों का कोई स्थान नही था... 
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ब्राह्मण के यह कहने पर कि वो बुराई को रोकने और अच्छाई को करने के लिए प्रतिदिन नदी में स्नान करने आता है क्योंकि नदी में पवित्र जल में स्नान करने से प्रत्येक बुरे कर्म से छुटकारा मिल जाता है... 
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उन्ना उससे कहती है कि उसे किसी ने यह कहकर मूर्ख बनाया है.. नदी में स्नान करने से कोई अपने पापों अथवा बुरे कामों से मुक्त नही हो जाता.. यदि ऐसा होता तो पानी में रहने वाले सारे मेढक, कछुए, मगर्मच्छा और सांप सभी स्वर्ग पहुँच चुके होते.. 
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इससे अच्छा तो यही है कि मनुष्य ऐसे काम(बुरे काम) ही न करे कि जिनके डर से उसे इतनी ठण्ड में नदी के जल में स्नान करने की आवश्यकता पड़े... उन्ना के इस कथन से महात्मा बुद्ध के इस उपदेश "अपनी मुक्ति अपने हाथ" का परिचय मिलता है...
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यदि मनुष्य बुरे कर्म करेगा ही नहीं तो उसे बुराई से मुक्त होने का उपाय भी नहीं ढूंढना पडेगा...

= १८१ =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
दादू जिन पहुँचाया प्राण को, उदर उर्ध्व मुख खीर ।
जठर अग्नि में राखिया, कोमल काया शरीर ॥ 
दादू समर्थ संगी संग रहै, विकट घाट घट भीर ।
सो सांई सूं गहगही, जनि भूलै मन बीर ॥ 
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साभार : Bhakti Se Anand ~ बुद्धि और श्रद्धा 

मेरी धारणा में तो बुद्धिवाद की अपेक्षा श्रद्धा बहुत ही ऊँची और उपादेय वस्तु है, परन्तु उसकी कसौटी यही है की इश्वर या सत्य का श्रद्धालु कभी पाप का आचरण नहीं कर सकता l बुद्धिवादियों में भी यह भाव रहना आवश्यक है की वे अपने लिए अपनी बुद्धि से काम लेने का जितना अधिकार समझते हैं उतना ही दूसरों के लिए भी माने, चाहे वे निम्न श्रेणी के लोग माने जाते हों या कम विद्या-प्राप्त हों l इसमें कोई संदेह नहीं की आँख मूंदकर तो किसी की बात नहीं माननी चाहिए, तथापि कुछ ऐसी बातें भी जगत में होती हैं, जो हमारी समझ में नहीं आती, पर सत्य होती हैं और जिस पर हमारा भरोसा होता है, उसके विश्वास पर हमें उनको स्वीकार भी करना पड़ता है और स्वीकार करना भी चाहिए l