श्री दादूवाणी(म.मं.आ.)(४) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
श्री दादूवाणी(म.मं.आ.)(४) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

पारिख का अंग २७ - २८/३२

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*(#श्रीदादूवाणी ~ पारिख का अंग २७ - २८/३२)*
.
*॥ कर्त्ता कसौटी ॥*
*खोटा खरा परखिये, दादू कस-कस लेइ ।*
*साचा है सो राखिये, झूठा रहण न देइ ॥२८॥*
ईश्वर भी निष्कामी सज्जन भक्त की तथा दुर्जन की परीक्षा कर के सज्जन पर कृपा करते हैं दुर्जन पर नहीं, उसको तो प्रत्युत दण्ड देते हैं । अतः सज्जन का ही संग उपादेय है । लिखा है कि-
आनन्दरूपी मृग को दावाग्नि की तरह जलाने वाला शील वृक्ष को उखाडने के लिये उन्मत्त हाथी की तरह ज्ञान दीपक को नष्ट करने के लिये महावायु की तरह दुर्जन का संग माना गया है ।
असत् के संग से गुणवान् भी विषयासक्त हो जाता है । जैसे गायन सुनने में अनुरक्त मृग शिकारी द्वारा मारा जाता है । सत्पुरुषों का संग सब की उन्नति करने वाला है । जैसे कमल के पत्ते पर पडा हुआ पानी मोती की शोभा वाला होता है । अतः दुर्जन के संग को छोड सज्जन का संग ही उपादेय है ।
.
*॥ पारिख अपारिख ॥*
*खोटा खरा कर देवै पारिख, तो कैसे बन आवै ।*
*खरे खोटा का न्याय नबेरे, साहिब के मन भावै ॥२९॥*
कोई परीक्षक यदि असत्य पदार्थ को भी सत्य बतलाता है और सत्य को असत्य कहता है तो वह सच्चा परीक्षक नहीं माना जायगा । किन्तु वह तो दाम्भिक ही है । न प्रभुप्रिय है और न न्यायकारी है । किन्तु जो सत्य को सत्य और असत्य को असत्य बतलाता है परीक्षा कर के वह ही सच्चा परीक्षक है तथा प्रभुप्रिय और न्यायकारी है ।
ऐसे ही आत्मा को सत्य स्वरूप सुख और और प्रिय स्वरूप जानकर उसी में प्रेम करना चाहिये । संसार के असत्य पदार्थों की प्रीति तो सर्वाधिक और अस्थिर है ।
.
*दादू जिन्हें ज्यों कही, तिन्हे त्यों मानी, ज्ञान विचार न कीन्हा ।*
*खोटा खरा जीव परख न जानै, झूठ साच करि लीन्हा ॥३०॥*
स्वार्थपरायण लोगों ने अज्ञानियों को जैसा उपदेश दिया वैसा ही निर्णय किये बिना उसको स्वीकार कर लिया, और स्वयं अज्ञ होने से सत्यासत्य का निर्णय करने में वे असमर्थ है । इसीलिये मिथ्याभूत संसार को सत्य मान कर इसी में डूबे हुए हैं । न ज्ञान प्राप्त करके निवृत्ति को प्राप्त करते हैं ।
.
*॥ कर्त्ता कसौटी ॥*
*जे निधि कहीं न पाइये, सो निधि घर-घर आहि ।*
*दादू महँगे मोल बिन, कोई न लेवे ताहि ॥३१॥*
इस परमात्मा को अज्ञानी विषयों में खोजता हुआ भी हजारों-हजारों वर्ष से भी प्राप्त नहीं कर सकता । वही परमात्मा धन प्राणि मात्र में अव्यक्त रूप से स्थित है परन्तु साधन मूल्य दिये बिना प्राप्त नहीं हो सकता । जिन्होंने साधन किया उन्होंने उसको प्राप्त कर लिया । अतः साधक को साधननिष्ठ होना चाहिये ।
यह पद्य प्रासंगिक है-
प्रसंग कथा यह है कि जब श्री दादूजी महाराज सीकरी नगरी से पधार रहे थे तब इनके साथ में बहुत से महात्मा आ रहे थे और जब दौसा नगर में आये तो भोजन के लिये भिक्षा मांगने को शहर में गये और घर घर पर भिक्षा मांग रहे हैं । लेकिन कहीं भी उनको भिक्षा नहीं मिली । उस समय शिक्षा देने के लिये यह साखी कही थी ।
इसका भाव यह है कि- जैसे यह महात्मा भिक्षा के लिये घर-घर पर जाते हैं । लेकिन शहरी लोगों को इनका ज्ञान न होने से भिक्षा देकर इनका सत्कार और अपना कल्याण प्राप्त नहीं कर रहे हैं ऐसे ही परमात्मा भी प्रति प्राणी के शरीर में रहता है परन्तु ज्ञान न होने से अज्ञानी उसको प्राप्त करके कल्याण नहीं प्राप्त नहीं कर सकता ।
.
*खरी कसौटी कीजिये, वाणी बधती जाइ ।*
*दादू साचा परखिये, महँगे मोल बिकाइ ॥३२॥*
परीक्षकों से परीक्षित रत्न यदि सच्चा रत्न हो तो उसकी कीमत बढ जाती है । वह अमूल्य हो जाता है । ऐसे ही साधक भी परीक्षा में उत्तीर्ण होकर महिमा को प्राप्त होता है । महापुरुष भी उस का समादर करते हैं । परमात्मा भी उस पर प्रसन्न होता है उस की सत्यता को देख कर ।
(क्रमशः)

बुधवार, 18 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - २४/२८

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - २४/२८)
.
*शब्द सरोवर सुभर भर्‍या, हरि जल निर्मल नीर ।*
*दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अखिल शरीर ॥२४॥*
सन्तों के शब्द ही सुन्दर जलाशय है । उसमें निर्मल ब्रह्म ज्ञान रूपी जल भरा हुआ है । कोई साधक ब्रह्मरुपी जल को पीता है तो उसकी दृष्टि में सारे शरीर ही ब्रह्म रूप से भासित होते हैं और अन्त में ब्रह्म में ही लीन हो जाते हैं ।
.
*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥२५॥*
महापुरुषों के शब्द राम रस से पूर्ण भरे हुए होते हैं । साधक जन उन शब्दों को विचार विचार कर सृष्टि के आरम्भ से प्रलय पर्यन्त उसका पान करते हुए मुक्त हो जाते हैं ।
.
॥ गुरुमुख कसौटी ॥
कारज को सीझै नहीं, मीठा बोलै बीर ।
दादू साचे शब्द बिन, कटै न तन की पीर ॥२६॥
ब्रह्मबोधक शब्दों के बिना साधक का देहाध्यासरूप कष्ट दूर नहीं होता । किन्तु महापुरुषों के वैराग्य प्रधान वचनों से ही काम क्रोधादिकों का नाश हो सकता है । यद्यपि महापुरुषों के वचन आपात कटु लगते हैं तथापि वे औषध के समान दोषों को दूर करने में समर्थ होते हैं । अतः उनको औषध के समान पान करना चाहिये । केवल कानों को मीठे लगने वाले मधुर शब्दों से न तो दोष दूर ही होते और न मुक्ति ही मिलती ।
.
*॥ सबद ॥*
*दादू गुण तजि निर्गुण बोलिये, तेता बोल अबोल ।*
*गुण गहि आपा बोलिये, तेता कहिये बोल ॥२७॥*
अहंकार आदि आसुर गुणों से रहित निष्पक्ष ब्रह्म बोधक जो वचन होते हैं वही वचन सद् वचन होते हैं । क्योंकि ऐसे वचनों से किसी की आत्मा को कष्ट नहीं होता । किन्तु जो अहंकार के साथ पक्षपातपूर्ण वचन बोले जाते हैं वे दूसरों के लिये कष्टप्रद होने से व्यंग कहलाते हैं सद् वचन नहीं । सद् वचन तो मौन की तरह सब को सुख देने वाले होते हैं ।
.
*साचा शब्द कबीर का, मीठा लागै मोहि ।*
*दादू सुनतां परम सुख, केता आनन्द होहि ॥२८॥*
महात्मा कबीर के वचन मुझे बहुत ही अच्छे लगते हैं । क्योंकि वे अहंकार रहित तथा निर्गुण ब्रह्म के बोधक हैं । अतः परम सुख को देने वाले हैं । उनका बार बार विचार और श्रवण करने से महान् आनन्द मिलता है ।
.
॥ इति शब्द के अंग का पं. आत्माराम साधु कृत भाषानुवाद समाप्त ॥२२॥ 
(क्रमशः)

मंगलवार, 17 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - २१/२३

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - २१/२३)
.
*दादू भुरकी राम है, शब्द कहैं गुरु ज्ञान ।*
*तिन शब्दों मन मोहिया, उनमन लागा ध्यान ॥२१॥*
राम की भक्ति ही कल्पवृक्ष की तरह सर्वार्थसाधक होने से अद्भुत शक्ति शालिनी है । भक्तिप्रधान शब्दों से मेरा मन मोहित होता हुआ संसार से उदासीन होकर निर्विकल्प समाधि में प्रतिदिन समाहित रहता है ।
.
*शब्दों माहिं राम धन, जे कोई लेइ विचार ।*
*दादू इस संसार में, कबहुं न आवे हार ॥२२॥*
परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी नाम से चार प्रकार की वाणी होती है । जिनमें परा वाणी मूलाधार में स्थित पवन से संस्कार(युक्त) की गई और मूलाधार में ही स्थित रहने वाली स्पन्द(हल चल) से शून्य विन्दुरूपिणी शब्द ब्रह्मस्वरूपा है । पश्यन्ती वाक् नाभि से चलने वाले पवन से अभिव्यक्त होकर केवल मन के द्वारा ही जानी जाती है । ये दोनों वाणी योगियों को निर्विकल्प सविकल्प समाधि में प्रतीत होती है । 
मूलाधार से चलकर ऊपर आने वाले श्वास से अभिव्यक्त तत्तदर्थ की वाचक शब्द स्फोटरूप श्रोत्र से जिसका ग्रहण न हो सके अति सूक्ष्म जप में जिसका बुद्धि से भी ग्रहण न हो सके वह मध्यमा कहलाती है । मूलाधार से चलकर पवन जब मुख में आकर मूर्धा से टकराती है और वापस लौट कर तालुआदि स्थानों के साथ उसका स्पर्श होने से अभिव्यक्त होती है । उसको वैखरी वाणी कहते हैं । यह दूसरे पुरुषों द्वारा भी सुनी जा सकती है । 
लिखा है कि- परा वाणी मूलाधार चक्र में, पश्यन्ती नाभि देश में, मध्यमा हृदय देश में रहती है । वैखरी वाणी कण्ठ प्रदेश में रहती है । वैखरी वाणी से होने वाला नाद श्रवणेन्द्रिय गोचर है । मध्यमा से उत्पन्न नाद स्फोटका अभिव्यंजक है । वैखरी तथा मध्यमा इन दोनों से एक साथ ही नाद उत्पन्न होता है । मध्यमा से होने वाला नाद अर्थ वाचक स्फोटात्मक शब्द का अभिव्यंजक है । वैखरी से उत्पन्न नाद श्रवणेन्द्रियग्राह्य होता हुआ भी वैखरी नाद की तरह निरर्थक है । मध्यमा का नाद सूक्ष्मतर कर्णपुट बंद करके सुनने से सूक्ष्म वायु से अभिव्यक्त होता है । यही शब्द ब्रह्मस्फोट है । यह स्फोटात्मक नाद ब्रह्म रूप होने से नित्य है । 
वाक्यपदीय में श्री हरि लिखते हैं कि- आदि अन्त रहित जो ब्रह्म है ब्रह्म है वह ही शब्द-तत्त्व है । जो अक्षर कहलाता है । यही अर्थभाव से विवर्तित होता है । जिससे सारे जगत् की प्रक्रियायें होती है । जो अन्दर ज्योतिः स्वरूप अविनाशिनी परा वाणी है उसका साक्षात्कार होने पर जन्म मरण का अधिकार समाप्त हो जाता है । 
ऋगवेद में- विद्वान्, ब्राह्मण चार प्रकार की वाणी बतलाते है । जिन में तीन वाणी परा पश्यन्ती मध्यमा तो गुहा में स्थित रहती है । कोई उन का व्यापार नहीं होता । जिसको मनुष्य बोलते हैं यह चौथी वाणी वैखरी वाणी कहलाती है । आदि अकार और अन्त्य हकार के संयोग से अहं बनता है और इकार से लेकर हकार पर्यन्त जो वर्ण हैं वे इसी अहं से ही बनते हैं । यह सारा जगत् ज्ञान स्वरूप परावाणी स्वरूप है । इसी से पश्यन्ती मध्यमा वाणी पैदा होती है । इसी अभिप्राय से श्री महर्षि दादूजी लिखा रहे हैं कि- “शब्दों मांहै रामधन” अर्थात् परा पश्यन्ती मध्यमा इन तीन प्रकार की वाणी में ही रामरुपी धन गुप्त है । कोई साधक इनका विचार करके ब्रह्म साक्षात्कार कर लेता है तो वह निश्चित संसार बन्धन से मुक्त हो जाता है ।
.
*दादू राम रसायन भर धर्‍या, साधुन शब्द मंझार ।*
*कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥२३॥*
सन्तों के शब्दों में रामरसायन भरा पड़ा है । जो सब रोगों को दूर करने वाला है । कोई कोई साधक ही इसकी परीक्षा करके बार बार विचार करके उसके अर्थ को जान कर प्रीतिपूर्वक राम रसायन रस भक्ति का पान करता है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 9 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - १७/२०

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - १७/२०)
.
*दादू काहे कौड़ी खर्चिये, जे पैके सीझै काम ।*
*शब्दों कारज सिध भया, तो श्रम न दीजै राम ॥१७॥*
जो कार्य एक रुपया से ही बन रहा है तो उसके लिये करोड़ रुपये खर्च करना व्यर्थ ही है । इसी प्रकार जब सद्गुरु बोधित ब्रह्म प्रतिपादक शब्दों के विचार से ही ब्रह्म प्राप्त हो जाय तो फिर शरीर को क्लेश देने वाले सकाम कर्म तथा तपश्चर्यादि साधनों की क्या आवश्यकता है ? व्यर्थ ही अपनी आत्मा को कष्ट देना है । जैसे आक के वृक्ष में ही शहद मिल जाय तो फिर पर्वत पर चढ़ने का क्लेश क्यों किया जाय । 
वाक्यपदीय में लिखा है कि- शब्द ब्रह्म के विषय में कहा है कि मोक्ष प्राप्ति के सभी मार्गों में शब्द ब्रह्म का ज्ञान मुख्य साधन है और मोक्ष प्राप्त करने वालों के लिए ये सीधा राजमार्ग है ।
.
*दादू राम हृदय रस भेलि कर, को साधु शब्द सुनाइ ।*
*जानो कर दीपक दिया, भ्रम तिमिर सब जाइ ॥१८॥*
जो महात्मा भक्तिरस में डूबे रहते हैं उन महात्माओं के ब्रह्मबोधक वाक्यों के श्रवणमात्र से भ्रान्ति की निवृत्ति हो जाने से सहज में ही ब्रह्म प्राप्त हो जाता है । उनके शब्दों में अचिन्त्यशक्ति होती है । जैसे जिसके हाथ पर दीपक रखा हो तो उसका अंधकर मिट जाता है । वैसे ही उनके वाक्यों से अनायास ही ब्रह्मज्ञान हो जाता है । क्योंकि वे महात्मा क्षण भर भी ब्रह्मानुभूति को त्याग कर नहीं रहते । 
सर्ववेदान्तसिद्धान्तसार में लिखा है कि- जिनकी आत्मा पवित्र है और मोक्ष को चाहते हैं उनके लिये यह निष्कण्टक मार्ग है कि वे अपने को ब्रह्म में स्थित बनाये रखें । जिससे उन को सर्वत्र सद् ब्रह्म ही का दर्शन होता रहे ।
.
*दादू वाणी प्रेम की, कमल विकासै होहि ।*
*साधु शब्द माता कहैं, तिन शब्दों मोह्या मोहि ॥१९॥*
जैसे जैसे भक्त का हृदय संशयविपर्यय दोषों से रहित होकर निर्मल होता जाता है । तब भक्त के मुख से भगवद् भाव से परिपूर्ण वाणी जो चमत्कारपूर्ण होती है अपने आप ही निकलने लगती है । जिससे सुनकर हर प्राणी मोहित हो जाता है ।
.
*दादू हरि भुरकी वाणी साधु की, सो परियो मेरे शीश ।*
*छूटे माया मोह तैं, प्रेम भजन जगदीश ॥२०॥*
हरि भक्त की चमत्कार दिखाने वाली वाणी मेरे अन्तःकरण में अद्भुत प्रभाव को पैदा करे । जिससे मेरा मन मायिक मोह से मुक्त होकर प्रेम से हरि भजन में लगे ।
(क्रमशः)

रविवार, 8 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - १३/१६

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - १३/१६)
.
*॥ ईश्‍वर समर्थाई ॥*
*दादू एक शब्द सौं ऊनवै, वर्षन लागै आइ ।*
*एक शब्द सौं बीखरै, आप आपको जाइ ॥१३॥*
ईश्वर की आज्ञा रूप शब्द से मेघ आकाश में स्थित होकर वर्षा करने लगता है । तथा ईश्वर के निषेध करने पर आकाश में बादल छिन्न भिन्न हो जाता है । यह कार्यमात्र का उपलक्षण है । अर्थात् ईश्वर के विधि निषेधात्मक शब्दों से सारे जगत् का व्यवहार संपन्न होता है ।
.
*दादू साधु शब्द सौं मिल रहै, मन राखै बिलमाइ ।*
*साधु शब्द बिन क्यों रहै, तब ही बीखर जाइ ॥१४॥*
साधुओं के सद्वचनों द्वारा अपने मन को परमात्मा में विलीन करना चाहिये । अन्यथा यह चंचल मन विषय विकारों में ही विचार के बिना दौड़ता रहेगा ।
.
*दादू शब्द जरै सो मिल रहै, एक रस पूरा ।*
*कायर भाजै जीव ले, पग मांडै शूरा ॥१५॥*
जो साधक, साधुओं के शब्दों को विचार कर धारण करता है, वह एक रस रहने वाले ब्रह्म में लीन हो सकता है । उनके वचनों को जो साधक विचार नहीं करता तो उसका मन विषयों में ही रमण करता रहता है इसलिये साधु संगति करना चाहिये ।
.
*शब्द विचारै करणी करै, राम नाम निज हिरदै धरै ।*
*काया मांहीं शोधै सार, दादू कहै लहै सो पार ॥१६॥*
सद्गुरु से उपदिष्ट ब्रह्मबोधक वाक्यों का बार बार मनन करना तथा तदनुसार आचरण करना, राम नाम का अपने हृदय में ध्यान करना तथा इसी शरीर के मध्य विश्व का जो सारभूत ब्रह्म स्थित है उसका अन्वेषण करना ये सब साधन, जिसके जीवन में आ गये हैं वह साधक संसार को पार करके ब्रह्म पद को प्राप्त कर लेता है । अध्यात्मरामायण में- जो तत्परता से साधु सेवा में अनन्य बुद्धि रखता हुआ मेरे भक्तों का निर्मल और शान्त विचार वाले योगियों का मेरी सेवा में अनुराग रखने वालों का तथा निर्मल ज्ञानियों का सदा ही संग करता है, तो उसको मोक्ष हस्तगत हो जाता है और मैं अहर्निश उस की दृष्टि का विषय बना रहता हूँ । दूसरे किसी भी उपायों से दर्शन नहीं दे सकता ।
(क्रमशः)

शनिवार, 7 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - ११/१२

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - ११/१२)
.
*निरंजन निराकार है, ओंकार आकार ।*
*दादू सब रंग रूप सब, सब विधि सब विस्तार ॥११॥*
ओंकार का चौथा पाद अमात्रिक होने से ब्रह्म रूप निरन्जन निराकार स्वरूप है । त्रिपादात्मक शब्द रूप ओंकार मायामय होने से साकार है । अतः नामरूपात्मक सकल जगत् साकार मायामय ओंकार से ही पैदा हुआ है । 
माण्डूक्य में लिखा है कि- ऊपर लिखे हुए मंत्र में निर्गुण निराकार ब्रह्म का चौथा पाद बतलाया गया है कि जो न देखने में आ सकता है । न वह व्यवहार में लाया जा सकता है, न ग्रहण करने में आ सकता है । न चिन्तन करने में, न बतलाने में आ सकता है, न जिसका कोई लक्षण हो सकता है । जिसमें समस्त प्रपञ्च का अभाव है । एकमात्र परमात्मा की प्रतीति ही जिसमें सार(प्रमाण) है । ऐसा सर्वथा शान्त कल्याणमय अद्वितीय तत्व पूर्णब्रह्म का चौथा पाद माना जाता है । इस प्रकार जिनका चार पादों में विभाग करके वर्णन किया गया है वे ही पूर्ण ब्रह्म परमात्मा है । उन्हीं को जानना चाहिये ।
जो चार पादवाला बतलाया गया है, वह साकार है और यहां पर अक्षर के प्रकरण में अपने नाम से अभिन्न होने के कारण तीन मात्राओं वाला ओंकार है । अ, उ, म, ये तीनों मात्राएँ ही उपर्युक्त तीन पाद है और उनके ये तीनों पाद ही ओंकार की तीन मात्राएँ है । जिस प्रकार ओंकार अपनी तीन मात्राओं से भिन्न नहीं है उसी प्रकार परमात्मा अपने पादों से अलग नहीं है । यहां पर पाद और मात्राओं की जो एकता बतलाई है वह परमात्मा की उपासना के लिये ही की गई है । इसी अभिप्राय से श्री दादूजी महाराज भी लिख रहे हैं कि- निरंजन निराकार है, ओंकार आकार इति । अर्थात् उस मायामय ओंकार स्वरूप ब्रह्म का ही यह स्वरूप रंग वाला संसार है । क्योंकि उसी से पैदा होता है ।
.
*आदि शब्द ओंकार है, बोलै सब घट माँहि ।*
*दादू माया विस्तरी, परम तत्त यहु नांहि ॥१२॥*
प्रलय काल में नियत काल से परिपक्व होने वाले प्राणियों के कर्मों का उपभोग के द्वारा क्षीण होने पर संपूर्ण जगत् को अपने अन्दर लीन करके माया ईश्वर चेतन में लीन हो जाती है । यह आत्यन्तिक लय नहीं है । ऐसा मानने पर फिर सृष्टि पैदा नहीं हो सकेगी, और न सर्वथा अभाव रूप ही लय है, क्योंकि प्रतीयमान मिथ्या वस्तु का, जिसका स्वरूप प्रतिभासमात्र ही है, उसका यदि सर्वथा अभाव मान लिया जाय तो फिर उसका सदा के लिये ही अभाव हो जायगा । अतः इस लय में कार्य की प्रवृत्ति का अभाव होने के कारण सुषुप्ति की तरह जानना चाहिये । क्योंकि ईश्वर में रहने वाला प्रकाश निर्विकल्प होने से उस ईश्वर के प्रकाश से प्रकाशित होती हुई भी माया अभाव की तरह ही प्रलय काल में रहती है ।
जब प्राणियों के कर्म पक जाते हैं, अर्थात् फलोन्मुख होते हैं तब ईश्वर से माया का सृष्टि के निमित्त प्रादुर्भाव होता है । फिर परमात्मा में प्राणियों के कार्यानुसार सृष्टि रचना की इच्छा पैदा हो जाती है । उस माया से ईश्वर की इच्छा से अव्यक्त त्रिगुण बिन्दु रूप पैदा होता है । इसी को शक्तितत्त्व कहते हैं । उस बिन्दु का अचित् अंश बीज कहलाता है । चिद् अचित् दोनों अंश मिले हुए नाद कहलाते हैं । चिदंश को बिन्दु कहते हैं । अचिदंश ही शब्दार्थ उभयरूप संस्कार रूपा अविद्या कहलाती है । इस बिन्दु से नाद पैदा होता है । जो ज्ञान प्रधान विशेष वर्ण आदि से रहित शब्द ब्रह्म कहलाता है । जो सृष्टि के उपयोगी अवस्था विशेष है । यही नाद जगत् का उपादान कारण है । इसी को ‘रव’ ‘रव’ ‘वाणी’ आदि शब्दों से व्यवहृत किया जाता है । 
प्रपञ्चसार में लिखा है कि- इस बिन्दु में कुछ हलचल होने पर अव्यक्त नामक “रव” पैदा होता है । वह ही जन श्रुति(कर्ण) संपन्न होता है तब शब्द ब्रह्म कहलाता है । यह रव सर्वगत होता हुआ भी प्राणियों के मूलाधार में पवन के चलने से संस्कृत हुआ अभिव्यक्त होता है । जाने हुए अर्थ को कहने की पुरुष की इच्छा के प्रयत्न से जो योग है वह ही मूलाधार पवन से इसका संस्कार है । वह ही अभिव्यक्त शब्द ब्रह्म अपने में स्थित रहने के कारण निस्पन्द परा वाक् कहलाती है । 
इसी अभिप्राय से वाक्यपदीय में श्री हरि ने लिखा है कि- आदि अन्त से रहित जो ब्रह्म है, वह ही शब्द तत्त्व है । वह ही अक्षर है । जिसका अर्थ भाव से विवर्त होता है । जिससे सारे जगत की प्रक्रिया चलती है । इसी अभिप्राय से श्रीदादू जी महाराज लिख रहे हैं कि “आदि शब्द ओंकार है ।” इति । अर्थात् यह नाद ही प्राणियों के हृदय में स्थित अनाहत नाद रूप से हंस इस प्रकार से सुनाई देता है । यह ही सृष्टि का आदि कारण है । जीव रूप से प्राणियों में बोलता चलता आदि क्रिया करता है । यह प्रपञ्चसहित नाद मायिक है, वास्तविक ब्रह्मस्वरूप नहीं है । इसीलिये श्रीदादूजी भी लिखा रहे हैं “परम तत्व यहु नाहिं” ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - ६/१०

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - ६/१०)
.
*दादू ओंकार तैं ऊपजै, अरस परस संजोग ।*
*अंकुर बीज द्वै पाप पुण्य, इहि विधि जोग रु भोग ॥६॥*
इस साखी में ओंकार शब्द से लक्षणावृत्ति से वाग्तत्व अर्थ जानना । क्योंकि वाक् तत्व का ही यह सारा संसार परिणाम है । माण्डूक्य उपनिषद् में कहा है कि जो कुछ भूत भव्य संसार दीख रहा है यह सब ओंकार ही है जो त्रिकालातीत है वह भी ओंकार स्वरूप ही है ।
वाक्यपदीय में लिखा है कि-वाच्य वाचक भेद से भिन्न प्रतीत होने वाला यह संसार सूक्ष्म शब्द जो व्यक्त है उसी का यह परिणाम है ऐसा वेदवेत्ता पुरुष कहते हैं । हम स्वयं कल्पना करके नहीं कहते । सृष्टि के आदि में यह विश्व छन्द से(सूक्ष्म वाक् तत्व से) ही पैदा होता है । 
वेद में भी कहा है कि- बुद्धिरूप से स्थित जो सूक्ष्म वाक्तत्व है उसी से संपूर्ण जगत् वाच्य वाचक उभय रूप से प्राण और इन्द्रियों को द्वार बनाकर पैदा हुआ है । मंत्र में इत् शब्द का अवधारण अर्थ है । न केवल मर्त्य अमर्त्य रूप जो भी उभयस्वरूप है उसी रूप से ही पैदा हुआ है अपितु भोक्ता रूप से भी पैदा हुआ है । उसी को मंत्र में- कह रहे हैं कि-“अथेद् वाक् बुभुजे” अर्थात् वाक् तत्व ही भोक्ता है । जो अन्दर ज्ञाता ज्ञेय रूप से स्थित है वह वाक् तत्व ही हैं । जो कुछ मनुष्य नाना प्रकार से शब्दाभिधेय अर्थ तत्त्व को अनेक प्रकार से बोलता है वह भी सब वाक् तत्त्व ही है । वाणी से दूसरा कोई कुछ है ही नहीं । क्योंकि वाक् तत्त्व सबका उपादान कारण होने से और सृष्टि की उत्पत्ति में पाप पुण्य रूप अंकुर सहकारी कारण माने गये हैं । इस प्रकार विचार करने पर भोग्य भोक्तृज्ञेय ज्ञानरूप सकल विश्व वाणी से उत्पन्न होने के कारण वाक् रूप ही है ।
.
*ओंकार तैं ऊपजै, विनशै बहुत विकार ।*
*भाव भक्ति लै थिर रहै, दादू आतम सार ॥७॥*
*पहली किया आप तैं, उत्पत्ति ओंकार ।*
*ओंकार तैं ऊपजै, पंच तत्त्व आकार ॥८॥*
*पंच तत्त्व तैं घट भया, बहु विधि सब विस्तार ।*
*दादू घट तैं ऊपजै, मैं तैं वर्ण विकार ॥९॥*
शब्दतत्त्वात्मक ब्रह्म से प्रथम ब्रह्मस्वरूप त्रिमात्रिक ओंकार की उत्पत्ति होती है । उसके बाद अक्षर समाम्नाय पैदा होते हैं । तदन्तर चारों वेदों को बनाकर सारे जगत की रचना होती है । उसके पश्चात् पञ्चतन्मात्रादि क्रम से पञ्चभूतों की उत्पत्ति होती है । पंचीकृत पञ्चभूतों से नाना सृष्टि का विस्तार हो जाता है और अन्तःकरण में तव मम यह अभिमान तथा कामादि विकार पैदा होते हैं । इस तरह कार्यकारण के अभेदोपचार से सारा विश्व ही ओंकारमय है । 
श्रुति में लिखा है कि- “वाणी ही अर्थ को देखती है वाणी ही अर्थ को बोलती है । वाणी ही अर्थ को फैलाती है । वाणी में ही नाना रूपवान् जगत निहित है । अतः सब विश्व का ओंकार ही कारण है । तथा ओंकार के ब्रह्ममय होने से सब ब्रह्मस्वरूप ही जगत् है । अतः साधक को मिथ्यामय संसार को त्याग कर ब्रह्म का ही ध्यान करना चाहिये । क्योंकि निर्विकल्प चिदात्मा में किसी भी प्रकार के भेद का अवसर ही नहीं आ सकता ।” 
विवेकचूडामणि में- ब्रह्म में जो यह संसार की कल्पना है यह सब असत्य ही है । क्योंकि वह निर्विकार निराकार निर्विशेष है, उसमें भेद भ्रान्ति के अलावा हो ही नहीं सकता और भ्रान्ति से कल्पित भेद तो मिथ्या है ।
.
*एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समर्थ सोइ ।*
*आगै पीछे तो करै, जे बलहीना होइ ॥१०॥*
एक बार श्री दादू जी महाराज से अकबर बादशाह ने पूछा कि हे भगवन् ! आप यह बतलाइये कि पहले नारी बनी या पुरुष बना ! प्रश्न का अभिप्राय है कि पुरुष बिना नारी नहीं हो सकती और नारी बिना पुरुष कहां से आया । अतः सृष्टि का क्रम कैसे चला? उत्तर का आशय यह है की हे राजन् जो परमात्मा सर्वशक्तिसंपन्न है वह एक शब्द से ही उत्पत्ति पालन संहार कर सकता है । अतः तुम्हारा प्रश्न ही सृष्टि कर्ता के विषय में अनुपन्न है । क्योंकि वह सर्व शक्ति संपन्न है । आगे पीछे तो वह करता है जो सर्व समर्थ नहीं हो । इसीलिये लिखा है कि- सृष्टि के विषय में विचार करने वाले लोगों ने इस सृष्टि को परमात्मा की विभूति बतलायी है । कुछ विद्वानों ने अपना मत अभिव्यक्त किया कि यह सृष्टि स्वप्न की तरह मायाकृत होने से मिथ्या है । अर्थात् भ्रान्ति से ही कल्पित है जैसे रस्सी में सर्प की कल्पना भ्रान्तिजन्य है । कुछ लोगों ने प्रभु की इच्छा को ही कारण माना है । कुछ काल से जो निरन्तर काल का विचार करते रहते हैं इस सृष्टि की उत्पत्ति मानी है । कुछ का कहना है कि जीवों के भोग के लिये ही इस सृष्टि की रचना की है । कुछ का कहना है कि यह सृष्टि केवल प्रभु की क्रीड़ा है और कुछ नहीं है । कुछ विद्वानों का मत है कि यह प्रभु का स्वभाव है कि वे एक से अनेक और अनेक से एक बन जाते हैं । अतः भगवान के अलावा सृष्टि कुछ है ही नहीं, भगवान् ही सृष्टि के रूप में दीखते हैं ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 5 नवंबर 2020

शब्द का अंग २२ - १/५

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग २२ - १/५)
.
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
*दादू शब्दैं बँध्या सब रहै, शब्दैं ही सब जाइ ।*
*शब्दैं ही सब ऊपजै, शब्दैं सबै समाइ ॥२॥*
सब ही पदार्थ शब्द से जुड़े हुए हैं । शब्द से ही पैदा होते हैं और उसी में समा जाते हैं । क्योंकि सब ही पदार्थों की प्रकृति शब्द है और ब्रह्म ही शब्द तत्त्व है । ब्रह्म तो शब्दातीत है, उससे विरुद्ध ब्रह्म शब्द तत्त्व कैसे हो सकता है, यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि जितने भी विकार हैं वे अपनी प्रकृति से अन्वित ही प्रतीत होते हैं । अतः ब्रह्म को शब्दतत्त्व कहना अनुचित नहीं है जैसे घट कुण्डलादि जितने भी विकार हैं, वे अपनी प्रकृति मृत्सुवर्ण आदि से अन्वित ही प्रतीत हो रहे हैं । ऐसे ही रुपादि विषय भी शब्दरुपानुगत ही प्रतीत होते हैं । वाक्यपदीय में लिखा है कि-
कोई भी ऐसा अर्थ नहीं जो शब्दानुगत प्रतीत न होता हो । क्योंकि सारे पदार्थ और ज्ञान शब्दानुविद्ध(शब्द से जुड़े हुए) ही प्रतीत होते हैं । अतः सब की प्रकृति शब्दतत्त्वरूप ब्रह्म ही है । भिन्न भिन्न स्वरूप और भिन्न भिन्न इन्द्रिय ग्राह्यरुपादि पदार्थ का अभिन्न रूप तथा अभिन्न इन्द्रिय ग्राह्यत्व कैसे संभव होगा और उनमें शब्द प्रकृतिकत्व भी कैसे बनेगा ? क्योंकि उपादान और उपादेय का सारुप्य ही अभीष्ट है । ऐसी शंका मन में नहीं लानी चाहिये क्योंकि रुपादि पदार्थों में जो भिन्नरूपता दीखती है यह अविद्याजन्य है । क्योंकि श्रुति में कहा है कि- मिट्टी सुवर्ण आदि ही सत्य है बाकी तो नामधेय वाणी का विकार मात्र है । प्रकृति ही सत्य है, कृति नहीं । किंच शब्द से वस्तु का परिच्छेद होता है । जैसे यह घट, यह पट है । अतः प्रकृति विकृति भाव से सब वस्तु शब्दात्मक ही है । यदि घटपटादि अर्थ शब्दस्वरूप नहीं होता तो शब्द से उसकी प्रतीति नहीं होनी चाहिये । किंवा, शब्द से अर्थ प्रतीत होता है । अतः शब्द प्रकृति होने से अर्थ शब्द रूप ही है । यह भी है कि शब्द से विषय विशिष्ट का ही ज्ञान होता है । जैसे मेरे को घट का ज्ञान है । अन्य से अन्य का ज्ञान नहीं हो सकता इससे यह सिद्ध हो गया कि अर्थ और ज्ञान शब्दात्मक है ।
स्थिति, प्रवृत्ति, निवृत्तिरूप व्यापार शब्द से ही होता है । अतः सब व्यवहार और विषय का मूलभूत ब्रह्म शब्दात्मक है । अतः ब्रह्म को शब्द तत्त्व कहने में कोई आपत्ति नहीं है । अतः यह मानना होगा कि शब्द तत्त्व ही रुपादिरूप से विवर्तित हो रहा है ।
वाक्यपदीय में लिखा है कि- जो आदि और विनाश रहित ब्रह्म है वह ही शब्द तत्त्व है और अक्षर है और शब्द तत्त्व ही अर्थभाव से विवर्तित हो रहा है । जिस शब्द से जगत् का व्यवहार होता है । अर्थात् स्थूल ककारादि वर्णाकार से ब्रह्म ही रुपादि ज्ञान के रूप में विवर्तित होता है । इसीलिये उसको अक्षर कहते हैं । जो स्वरूप से अप्रच्युत होता हुआ अर्थरूप से प्रतीत होता है उसको विवर्त कहते हैं । इसी अभिप्राय को लेकर महर्षि श्री दादूजी महाराज लिखा रहे हैं कि “शब्दै बन्ध्या सब रहै” इति ।
.
*दादू शब्दैं ही सचु पाइये, शब्दैं ही संतोंख ।*
*शब्दैं ही सुस्थिर भया, शब्दैं भागा शोक ॥३॥*
शमदमादि साधनसंपन्न साधक “तत्वमसि” आदि महावाक्यजन्य ज्ञान के द्वारा ब्रह्म प्राप्त करता है । वैराग्यादि को बोधन कराने वाले शब्दों के श्रवण से ही मन की स्थिरता से सुख संतोष की प्राप्ति तथा शोक की निवृत्ति करता है ।
लिखा है कि- वैराग्यवान् मनुष्य को ऐसे शब्दों को सुनकर आनन्द आता है । जैसे पृथ्वी ही शय्या है सोने के लिये, भुजलता ही तकिया है, आकाश ही वितान है । चन्द्रमा दीपक, तथा वैराग्यरूपी स्त्री, दिशारूपी कन्याओं के पंखे की अनुभूति हवा से पूर्ण योगी भिक्षुक राजा की तरह सुख से सोता है ।
.
*दादू शब्दैं ही सूक्ष्म भया, शब्दैं सहज समान ।*
*शब्दैं ही निर्गुण मिले, शब्दैं निर्मल ज्ञान ॥४॥*
शब्द अचिन्त्य महिमासंपन्न होता है । शब्द से ही आत्यन्तिक दुःख की निवृत्ति मानी गई है । यह शब्द ही सद्गुरु के मुख से निकल कर साधक के चित्त में जो अज्ञानरूपी अन्धकार है उसको दूर करता है । अतः शब्द परलोक कल्याणकारी है ।
महाभाष्य में लिखा है कि- एक ही शब्द को अच्छी तरह जान कर उसका सम्यक् प्रयोग करने पर स्वर्गलोक में यथेच्छ फल पाता है । एक ही शब्द ब्रह्म को जान लेने से सब कुछ जाना जाता है । जिससे साधक के चित्त में संतोष होता है कि मैंने सब कुछ जान लिया ।
लिखा है कि- ज्ञान न होने से पहले हमने कमलनयनी स्त्रियों के चंचल कटाक्षों से आकर्षित होते हुए अपनी यौवनश्री के द्वारा हृदय को पूजित किया । अर्थात् अपने हृदयगत भावों को पूर्ण किया । लेकिन जब से हृदय में सद् असद् का बोध जागृत हुआ तब से प्रत्याहार द्वारा हृदय को पवित्र किया तथा अब उसमें विशद् भाव जागते रहते हैं । इसी अभिप्राय से श्री दादूजी ने भी लिखा है कि वैराग्यपूर्ण शब्दों को सुनकर अतिसूक्ष्म ब्रह्म तत्त्व को प्राप्त करके समत्व भाव से निर्मल बुद्धि के द्वारा ब्रह्म में सदा रमता रहता है ।
.
*दादू शब्दैं ही मुक्ता भया, शब्दैं समझे प्राण ।*
*शब्दैं ही सूझे सबै, शब्दैं सुरझे जाण ॥५॥*
हे जीव, तू शुद्ध बुद्ध स्वभाव वाला है इत्यादि मुक्तिबोधक शब्दों से साधक मुक्त हो जाता है । शब्दों से सब व्यवहार का ज्ञान होता है और सत्यासत्य निर्णायक वाक्यों से सत्य का निश्चय करके बन्धनों से निवृत्त होकर व्यवहारातीत दशा को प्राप्त हो जाता है ।
लिखा है कि- जिसने अपने भेद को नष्ट कर दिया तथा जिसके पुण्यपाप मायामोह क्षीण हो गये हैं ऐसा साधक संदेहवृत्ति के नष्ट हो जाने से वह शब्दातीत गुणातीत तत्त्व को जानकर ब्रह्म में विचरण करता है । विधि निषेध से भी अतीत हो जाता है ।
(क्रमशः)

बुधवार, 4 नवंबर 2020

समर्थता का अंग २१ - ४२/४४

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - ४२/४४)
.
*देबे की सब भूख है, लेबे की कुछ नांहि ।*
*सांई मेरे सब किया, समझि देख मन मांहि ॥४२॥*
हे साधक ! परमेश्वर का ही यह सब जगत् बनाया हुआ है । अतः अपने मन में विचार कर देख, तुझे मालुम होगा कि वह पूर्ण काम निष्काम नित्यतृप्त तथा इच्छा रहित है ऐसा वेदों में सुना जाता है । अतः वह सदा देता ही है लेता कुछ भी नहीं है । अथवा जो भगवान् के निष्काम भक्त हैं वे भगवान् से भी कुछ लेना नहीं चाहते किन्तु सर्वस्व भगवान् को अपना अर्पण कर देते हैं । लिखा है कि भगवान् को तो अपने मान की भी इच्छा नहीं होती क्योंकि वे तो आत्म लाभ से पूर्ण रहते हैं । केवल करूणावश ही अपने भक्तों द्वारा की हुई परिचर्या को स्वीकार करते हैं । इससे भक्तों को ही लाभ होता है । जिस प्रकार दर्पण में प्रतीत होने वाली शोभा मुख को ही सुशोभित करती है । 
.
*दादू जे साहिब सिरजै नहीं, तो आपै क्यों कर होइ ।*
*जे आप ही ऊपजै, तो मर कर जीवै कोइ ॥४३॥*
यह सृष्टि स्वयं नहीं पैदा होती क्योंकि कारण के बिना कोई भी कार्य पैदा नहीं होता । अतः परमात्मा ही इसका कारण हो सकता है । अन्यथा कोई भी दुःख रूप जन्म मरण की इच्छा नहीं करेगा । लेकिन जन्मना मरना पड़ता है । अतः यह सृष्टि परमेश्वर के ही अधीन है । श्रुति तथा ब्रह्मसूत्र में भी इस जगत् की उत्पत्ति स्थिति भंग परमात्मा से ही बतलाई है । अन्यथा नाम रूप वाला अनेक कर्तृत्व भोक्तृत्व से युक्त प्रति नियत देश काल निमित्त जो क्रिया फल उसके आश्रित मन से भी जिसकी रचना अचिन्त्य है ऐसे जगत् की जन्मस्थिति भंग सर्वज्ञ ईश्वर के बिना हो नहीं सकती । 
.
*॥ कर्तृत्व कर्म ॥* 
*कर्म फिरावैं जीव को, कर्मों को करतार ।*
*करतार को कोई नहीं, दादू फेरनहार ॥४४॥*
यह जीव कर्म के अनुसार अपने कर्म फल भोगने के लिये स्वर्गादि लोकों में जाता है । कर्म का नियन्त्रण करने वाला परमेश्वर है । परमेश्वर तो अकर्ता अभोक्ता है । वह कहीं आता जाता नहीं । अतः इस जगत् का जगत् से भिन्न सर्वतंत्र स्वतंत्र सर्वसमर्थ परमात्मा ही कर्ता है यह सिद्ध हो गया । 
लिखा है कि- यह जीव कर्म से ही पैदा होता है और कर्म से ही मरता है तथा सुख दुःख भय शोक क्षेम यह सब जीव को कर्म से ही मिलते हैं । उच्चलोकों की प्राप्ति तथा वहां से पतन और शत्रु मित्र उदासीन यह सब कर्म से ही होते हैं ।
.
॥ इति समर्थाई के अंग का पं. आत्मारामस्वामिकृतभाषानुवाद समाप्त ॥२१॥
(क्रमशः)

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

समर्थता का अंग २१ - ३७/४१

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - ३७/४१)
.
*पंच ऊपना शब्द तैं, शब्द पंच सौं होइ ।*
*सांई मेरे सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥३७॥*
सूक्ष्मतन्मात्राओं द्वारा क्रमशः पञ्चसूक्ष्म भूतों की उत्पत्ति होती है । उन्हीं पंचीकृत पञ्चभूतों से उत्पन्न शरीर से ध्वन्यात्मक तथा वर्णात्मक शब्द पैदा होता है । इस क्रम से सारा जगत् परब्रह्म परमात्मा से ही उत्पन्न होता है परन्तु उसकी इस जगद् रचना सामर्थ्य को सब लोग नहीं जानते हैं । 
वाक्यपदीय में लिखा है कि- जो अक्षर ब्रह्म उत्पत्ति विनाश रहित है तथा ककारादि वर्ण रूप वैखरी वाणी का निमित्त है । एवं वाह्यार्थ बोधन की भावना से घट पट आदि अर्थ रूपेण विवर्त रूप से भासता है । तथा जगत् की सारी प्रक्रिया और व्यवहार जिससे होता है वह पश्यन्ती मध्यमा रूप शब्द तत्त्व ही ब्रह्म है ।
.
*है तो रती, नहीं तो नांहीं, सब कुछ उत्पति होइ ।*
*हुक्मैं हाजिर सब किया, बूझे बिरला कोइ ॥३८॥*
क्षणभंगुर संसार को जब बनाने की इच्छा होती है तब प्रभु संकल्पमात्र से ही बना देते हैं । संहार की इच्छा से क्षण में ही संहार कर देते हैं । अतः जगत् की उत्पत्ति विनाश यह सब भगवान् के हाथ में है । इस रहस्यमयी सामर्थ्य को विरले ही जानते हैं । 
श्रुति में लिखा है- संकल्प मात्र से जिसने यह सृष्टि बनाई । उसीसे उत्पन्न होते हैं और उसीसे जीते हैं उसी में लीन हो जाते हैं । वह ही ब्रह्म है उसको जानो ।
.
*नहीं तहाँ तैं सब किया, आपै आप उपाइ ।*
*निज तत न्यारा ना किया, दूजा आवै जाइ ॥३९॥*
इस मिथ्या माया के द्वारा परमेश्वर अपनी सत्ता से पञ्चभूतादि क्रम से सारे जगत् को पैदा तथा नष्ट करते हैं । जिन्होंने उस ब्रह्म को जान लिया वे मुक्त हो गये । अन्य तो संसार में जन्मते मरते रहते हैं । 
गीता में- हे अर्जुन संपूर्ण भूत इन परा अपरा प्रकृति से परमात्मा के द्वारा उत्पन्न होते हैं । अतः मैं ही संपूर्ण जगत् का उत्पन्न करने वाला तथा नाश करने वाला हूं । मुझसे दूसरा कोई इस जगत् का परम कारण नहीं है । संपूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझ में गूंथा हुआ है ।
.
*नहीं तहाँ तैं सब किया, फिर नांहीं ह्वै जाइ ।*
*दादू नांहीं होइ रहु, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥४०॥*
हे प्रभो ! स्वयं निर्गुण निर्विकारवान् होते हुए भी सगुण विकारवान् जगत् की रचना करने के कारण आप अद्भुत सामर्थ्यवान् हैं और आपको जानने मात्र से सगुण सवीकार पुरुष भी निर्गुण निर्विकार हो जाता है । यह आपका ज्ञान भी अद्भुत शक्तिशाली है । आलविन्दारस्तोत्र में हे भगवन् आपके अनन्त करोड़ कलाओं के प्रकाश के भी अंश में यह जड़ चेतन रूप विचित्र संसार विभागपूर्वक स्थित है । अण्ड ब्रह्माण्ड स्थित सर्व वस्तु, दश, ऊपर के आवरण, तीन गुण, प्रकृति, पुरुष परमपद और परात्पर ब्रह्म, यह आपकी ही विभूतियां हैं । अतः साधक को चाहिये कि उसके ज्ञान के द्वारा सतत उस ब्रह्म में निमग्न रहे ।
.
*दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ ।*
*लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥४१॥*
यह संसार परमात्मा के खेलने का स्थान है इसमें प्राणियों की उत्पत्ति विनाश रूप खेल प्रतिदिन हो रहा है । अतः इस संसार को विचार दृष्टि से देखें तो न यह कभी पैदा होता है और न यह नष्ट ही होता । जैसे रज्जु में सर्प की प्रतीति मात्र है वह कभी पैदा नहीं हुआ । इसी तरह संसार भी केवल खेल है । और यह परमात्मा प्राणियों से कुछ लेना नहीं चाहता क्योंकि वह निष्काम है । प्रत्युत सदा देता ही रहता है । और देकर बहुत खुश होता है । इसलिये इस संसार को परमात्मा का ही मानना चाहिये । जो अपना मानकर उन पदार्थों में अध्यास करके कहता है कि यह मेरी है । वह मूर्ख है और दुःख पाता है । यदि देना ही है तो प्रभु को अपना मन समर्पण करना चाहिये । 
लिखा है कि- हे प्रभो आपका महल रत्नों से बना हुआ है और गृहिणी श्री लक्ष्मी जी हैं । और यह जगत् आपका है अतः इसमें कोई वस्तु आप को दे नहीं सकते क्योंकि वह तो सब आपकी ही है । किन्तु श्री राधा जी ने आपका मन हरण कर लिया है । अतः आप बेमना हैं । मैं आपको अपना मन दे रहा हूँ कृपया उसको ग्रहण कीजिये । 
(क्रमशः)

सोमवार, 2 नवंबर 2020

समर्थता का अंग २१ - ३२/३६

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - ३२/३६) 
.
*लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापे कोइ ।* 
*दादू निश्‍चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥३२॥* 
ईश्वर सब कुछ कार्य करता है फिर भी किसी के धर्मों से लिप्त नहीं होता । क्योंकि वह असंग हैं । वेद में कहा है कि-असंगों नहि सज्जते ॥ 
और वह गुप्त भी नहीं रह सकता उसका प्रकाश सब जगह पर फैल रहा है । और वह सत्त्वादिगुणों से बंधता भी नही । किन्तु निश्चल एकरस रहता है । अब भी उसी की सत्ता से सब कुछ हो रहा है । 
*बिन गुण व्यापे सब किया, समर्थ आपै आप ।* 
*निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥३३॥* 
सर्वसमर्थ परमात्मा बिना किसी सहायता के सत्त्वादिगुणों के बिना ही निर्गुण निराकार होता हुआ सृष्टि को बना दिया और किसी पाप पुण्य से लिप्त नहीं होता । क्योंकि यह आत्मा असंग है ऐसा श्रुति में कहा है । किन्तु साक्षी की तरह संपूर्ण लोक व्यवहार को अखिन्न बुद्धि वाला होते हुए देखता रहता है । 
*॥ ईश्‍वर समर्थाई ॥* 
*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।* 
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥३४॥* 
वह परमात्मा सर्वसमर्थ है । समता गुण के तो वह सागर ही हैं । उसमें किसी प्रकार की दुविधा नहीं है । न वह शुभ अशुभ कार्यों में आसक्त होता । किन्तु सर्वत्र स्नेह रहित होता हुआ साक्षी की तरह संपूर्ण प्रपञ्च के व्यवहारों को देखता रहता है । 
गीता में कहा है कि- हे अर्जुन मैं सभी प्राणियों समभाव से रहता हूँ, न कोई मेरा द्वेषी और न कोई मेरा मित्र है । 
*पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ ।* 
*हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥३५॥* 
पञ्चभूतों की रचना करके उनके द्वारा कैसे यह स्थूल शरीर बनाया उसमें जीव का प्रवेश कैसे किया । यह उस प्रभु का महान् सामर्थ्य है । उसकी बुद्धि तथा निर्माण कला और गुणों का अन्त ही नहीं है । 
*यंत्र बजाया साज कर, कारीगर करतार ।* 
*पंचों का रस नाद है, दादू बोलणहार ॥३६॥* 
परमेश्वर अद्भुत कारीगर है । जिसने पंच भूतों से स्थूल शरीर बनाकर उसमें यथास्थान पर पंचज्ञानेन्द्रिय पञ्चकर्मेन्द्रिय तथा मनबुद्धि की स्थापना करके उसको सजा दिया और जीव भाव से शरीर में मूर्धा का छेदन करके उसमें प्रविष्ट हो गया और वहां पर स्थित होकर नेत्रों से देखता है घ्राणेन्द्रिय से सूंघता है । कानों से सुनता है, मन से मनन करता, बुद्धि से विचार करता, वाणी से बोलता है, पैरों से चलता, हाथों से काम करता है । इस प्रकार जड़ शरीर में प्रवेश करके उसको चेतन सा बना दिया । 
ऐतरेयोपनिषद् में- उस परमात्मा ने मनुष्य शरीर की सीमा को चीरकर उसके द्वारा शरीर में प्रविष्ट हो गया । यह द्वार विधृति नाम से प्रसिद्ध है । यह आनन्द देने वाला है । अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति का स्थान है ।
(क्रमशः)

रविवार, 1 नवंबर 2020

समर्थता का अंग २१ - २६/३१

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - २६/३१) 
.
*॥ ईश्‍वर समर्थाई ॥*
*ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी ।*
*जेती बाबा तैं कही, इन एक न मानी ॥२६॥*
*दादू परचा माँगें लोग सब, कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ ।*
*समरथ मेरा सांइयाँ, ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥२७॥*
*दादू तन मन लाइ कर, सेवा दृढ़ कर लेइ ।*
*ऐसा समर्थ राम है, जे मांगै सो देइ ॥२८॥*
शाहपुरा ग्राम में एक तिलोक नाम का सेठ रहता था । किसी समय श्री दादू जी महाराज ने उसके घर पर निवास किया था । उस समय उस को बहुत ज्ञान दिया लेकिन उसने एक भी नहीं मानी प्रत्युत उसके मन में चमत्कार देखने की प्रबल इच्छा जागृत हुई, तब श्री दादू जी ने ईश्वर से प्रार्थना करी कि हे प्रभो ! यह जीव अज्ञानी है । समझाने पर भी नहीं समझता । अतः आप तो सर्व समर्थ हैं । इसको चमत्कार दिखलाकर इसकी जो जिज्ञासा है, उसको शान्त कीजिये । उस समय प्रभु की प्रेरणा से श्री दादूजी महाराज ने अपने दो रूप बनाकर उसकी जिज्ञासा को शान्त किया । अतः हे साधक ! उसको सर्व समर्थ समझकर तन मन से उसकी दृढ़ सेवा करो । क्योंकि वह भक्तों की सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला है ।
.
*॥ समर्थ साक्षी भूत ॥*
*समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ ।*
*घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥२९॥*
*रहै नियारा सब करै, काहू लिप्त न होइ ।*
*आदि अंत भानै घड़ै, ऐसा समर्थ सोइ ॥३०॥*
हे परमात्मन् ! आप सर्वव्यापक हैं । सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, पालन सब आप से ही होता है । फिर भी आपको पाप पुण्य नहीं स्पर्श करता । तथा प्रति शरीर में रहते हुए भी सुख दुःख से लिप्त नहीं होते । तथा कर्ता होकर भी अकर्ता बनते हैं । सृष्टि की उत्पत्ति आप किस विधि से करते हैं ? इन सब आशंकाओं का समाधान कीजिये ।
.
*॥ कर्त्ता साक्षीभूत ॥*
*श्रम नहीं सब कुछ करै, यों कल धरी बनाइ ।*
*कौतिकहारा ह्वै रह्या, सब कुछ होता जाइ ॥३१॥*
भगवान् सृष्टि को पैदा करते हैं, लेकिन उन को जरा सा भी परिश्रम नहीं होता । क्योंकि उनके संकल्प मात्र से सृष्टि बन जाती है और उनकी सत्ता मात्र से सब कुछ होता रहता है । वे तो तमाशा देखने वाले दृष्टा मात्र हैं । जब उनको जानने वाला ज्ञानी भी सुख दुःख से लिप्त नहीं होता तो फिर परमात्मा के विषय में क्या कहा जाय यह भी उनका सर्वसामर्थ्य है । 
श्रुति में कहा है कि- वह परमात्मा सब भूतों की आत्मा है । सब कुछ करते हुए भी कभी लिप्त नहीं होते । 
गीता में भी कहा है कि- जिसको कहीं अहंकार नहीं होता जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में लिप्त नहीं होती । वह सारे संसार का हन्ता होने पर भी न मारता है और न पुण्य पाप से युक्त होता ।
(क्रमशः)

शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

समर्थता का अंग २१ - २१/२५

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - २१/२५) 
.
*॥ ईश्‍वर समर्थाई ॥*
*दादू दादू कहत हैं, आपै सब घट मांहि ।*
*अपनी रुचि आपै कहैं, दादू तैं कुछ नांहि ॥२१॥*
किसी समय करोली राज्य में भ्रमण करते हुए श्रीदादूजी महाराज पधार गये । वहां पर बालकों के साथ मिलकर रामराम कीर्तन करवा रहे थे । वहां पर अकस्मात् उस कीर्तन में सभी बालक राम नाम को छोड़कर ईश्वर की प्रेरणा से दादू शब्द अपने आप ही उच्चारित होने लगा । श्री दादूजी के मना करने पर भी बालक नहीं माने तब श्री दादूजी ने जान लिया कि यह ईश्वर की प्रेरणा है । इसमें मेरा कुछ भी वश नहीं चल सकता है । उस समय भक्त और भगवान् की प्रेरणा से दादूराम दादूराम जपने लगे । तभी से “दादू राम” यह एक मंत्र के रूप में जपा जाने लगा । इसी भाव को अगली साखी में भी कह रहे हैं कि-
.
*दादू हम तैं हुआ न होइगा, ना हम करणे जोग ।*
*ज्यों हरि भावै त्यों करै, दादू कहैं सब लोग ॥२२॥*
इस दादू रामनाम को जो बालक जप रहे हैं, इसमें मेरी इच्छा नहीं है कि ये बालक मेरे नाम को रटे । इन बालकों को मैं मना भी नहीं कर सकता क्योंकि यह तो सब ईश्वर की इच्छा से हो रहा है । अतः हे प्रभो ! जैसी आपकी इच्छा है वैसा ही करें । इसमें मेरा कोई वश नहीं है तभी से सभी लोग दादूराम इस मंत्र को जपने लग गये ।
.
*॥ पतिव्रत निहकाम ॥*
*दादू दूजा क्यों कहै, सिर पर साहिब एक ।*
*सो हम कौं क्यों बीसरै, जे जुग जाहिं अनेक ॥२३॥*
मेरा तो स्वामी भगवान् राम ही हैं । अतः मैं तो सदा उसी का चिन्तन करता हूँ न कि किसी देवतान्तर का । अनन्त युगों के व्यतीत होने पर भी भगवान् राम अपने भक्तों को नहीं भूल सकते हैं । उनको जो जिस भावना से भजता है उस को वैसा ही फल देकर अनुग्रहित करते हैं । जिसका नाम विश्वम्भर है, क्या वे अपने भक्तों को भूल सकते हैं ? नहीं ।
.
*॥ समर्थ साक्षीभूत ॥*
*आप अकेला सब करै, औरों के सिर देइ ।*
*दादू शोभा दास को, अपना नाम न लेइ ॥२४॥*
*आप अकेला सब करै, घट में लहरि उठाइ ।*
*दादू सिर दे जीव के, यों न्यारा ह्वै जाइ ॥२५॥*
जीवों के कर्मानुसार भगवान् स्वयं ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, पालन, संहार आदि कार्य करते हैं । किन्तु कर्ता नहीं बनते । क्योंकि वह तो साक्षी हैं । भक्त की शोभा बढ़ाने के लिये शुभ कर्म का निमित भक्त को बनाकर उसकी शोभा बढ़ाते हैं, और अशुभ कर्म का निमित्त अभक्त को बनाकर उसको अपयश का पात्र बना देते हैं । अतः जीव ही कर्ता भोक्ता बनकर सुख दुःख का भोक्ता तथा यश अपयश का पात्र बनता है । 
(क्रमशः)

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

समर्थता का अंग २१ - १७/२०

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - १७/२०) 
.
*दादू डोरी हरि के हाथ है, गल मांही मेरे ।*
*बाजीगर का बांदरा, भावै तहाँ फेरे ॥१७॥*
यह जीव कर्म रूपी रस्सी से बंधा हुआ है । वह रज्जु हरि के हाथ में है । जैसे भगवान् जीव को कर्मानुसार प्रेरणा करते हैं वैसा ही जीव कर्म करता है । जैसे बाजीगर बन्दर के गले में रस्सी डाल कर इधर उधर घूमाता है । वैसे ही बन्दर को चलना पड़ता है । इसी तरह जीव भी कर्मों से भ्रमता रहता है । ईश्वर तो फल देने वाला है ।
भागवत में लिखा है कि- गुणाभिमानी जीव परवश होकर सात्विक राजस तामस कर्म करके तदनुसार कभी प्रकाश बहुत लोकों को कभी दुःखमय आयास प्रधानतम शोक उत्कट मोह वाले लोकों में जन्म लेता है । वहां पर कभी स्त्री कभी पुरुष, कभी नपुंसक, बनकर अन्धा हुआ देव, मनुष्य, पशु, पक्षी योनियों में गुण कर्मानुसार सुख दुःख भोगता है । जैसे कुत्ता घर घर घूमता हुआ कर्मानुसार कर्म फलों को भोगता है । कभी कहीं दण्डाघात होता है तो कभी चावल आदि भोजन मिलता है । इसी तरह वह जीव भी कर्मानुसार ऊपर स्वर्ग में, मृत्युलोक में, अन्तरिक्ष में, ऊंच नीच कर्म फलों को भोगता हुआ सुखी दुःखी होता है ।
.
*ज्यों राखै त्यों रहेंगे, मेरा क्या सारा ।*
*हुक्मी सेवक राम का, बन्दा बेचारा ॥१८॥*
हे प्रभो ! आप की जैसी प्रेरणा होगी वैसा ही मैं आचरण करूँगा । आप के पास मेरा कुछ भी बल नहीं है । मैं तो आपका आज्ञाकारी सेवक हूँ । 
अलवन्दारस्तोत्र में- मैं आपका ही सम्बन्धी, आपका दास, आपका ही परिचारक तथा आपकी ही शरण हूँ । इस तरह आप पर ही मेरा सारा भार है ।
.
*साहिब राखै तो रहे, काया मांही जीव ।*
*हुक्मी बन्दा उठ चले, जब ही बुलावे पीव ॥१९॥*
इस शरीर में मेरा आत्मा आपकी आज्ञा से ही रह रहा है । जब भी आप की आज्ञा होगी तब ही यह आप का दास शरीर को त्याग कर आपके पास आ जायेगा । मैं तो आपकी दासता के बिना जीना भी नहीं चाहता । 
जैसे लिखा है कि- हे नाथ ! आपकी दासता से रहित देह प्राण सुख सब कामनायें अपनी आत्मा तथा अन्य जो कुछ भी है उसे क्षण भर भी नहीं सह सकता चाहे सैंकड़ों प्रकार से नष्ट हो जाय । मेरा यह कथन सत्य है ।
.
*॥ पति पहचान ॥*
*खंड खंड प्रकाश है, जहाँ तहाँ भरपूर ।*
*दादू कर्त्ता कर रह्या, अनहद बाजै तूर ॥२०॥*
परमात्मा का सर्व प्रकाशकत्व सामर्थ्य चराचर जगत् को प्रकाशित करता हुआ सुशोभित हो रहा है । 
श्रुति में कहा है कि- वह स्वयं प्रकाशमान है और उसी के प्रकाश से सारा विश्व प्रकाशित हो रहा है । जिस समय साधक साधना द्वारा समाधिस्थ हो जाता है । उस समय उसको अनाहत नाद सुनाई पड़ता है । उस समय साधक का चित्त परमात्मा में लीन होने से जीव ब्रह्म का अभेद हो जाता है और जीव अनन्त में डूब जाता है ।
श्रुति में कहा है कि- जैसे शुद्ध जल, जल में मिला देने से एक रूप हो जाता है इसी प्रकार हे गौतम ! जिसने उस ब्रह्म को जान लिया उसकी आत्मा ब्रह्मरूप हो जाती है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

समर्थता का अंग २१ - १३/१६

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - १३/१६) 
.
*दादू मार्ग महर का, सुखी सहज सौं जाइ ।*
*भवसागर तैं काढ कर, अपणे लिये बुलाइ ॥१३॥*
जो साधक भगवान् की कृपा प्राप्त करके विश्वासपूर्वक सहज योग के मार्ग से चलते हैं वे इस भवसागर को पार करके भगवान् के सानिध्य में रहते हुए भगवद्रूप हो जाते हैं । 
लिखा है कि- बुद्धिमान् मनुष्य भगवान् की शरण लेकर अनन्त क्लेशमय तथा भयंकर इस संसार सागर को पार कर जाते हैं ।
.
*दादू जे हम चिन्तवैं, सो कछु न होवै आइ ।*
*सोई कर्त्ता सत्य है, कुछ औरै कर जाइ ॥१४॥*
जीव जो जो कर्म करना चाहता है तो उसके वे-वे काम संपन्न नहीं होते जैसा वह चाहता है । अतः ईश्वर ही सच्चा कर्ता है । यदि वह चाहे तो सर्वकार्य जीव के अपने आप ही होते जाते हैं ।
.
*एकौं लेइ बुलाइ कर, एकौं देइ पठाइ ।*
*दादू अद्भुत साहिबी, क्यों ही लखी न जाइ ॥१५॥*
भगवान् पापी पर भी दया करके उसको पवित्र बनाकर अपने पास बुला लेते हैं । जैसे अजामिल पर दया करके अपना सान्निध्य प्रदान कर दिया । कभी कभी भक्तों को संसार के कल्याण के लिये संसार में भेज देते हैं । जैस जय विजय को । अथवा स्वयं ही संसार के कल्याण के लिये अपनी माया से अवतार लेकर आ जाते हैं ।
जैसे गीता में कहा है कि- जब जब धर्म की हानि और अधर्म की अभिवृद्धि होने लगती है तब तब मैं धर्म की रक्षा के लिये अवतार लेता हूँ । अन्यथा निरपेक्ष भगवान् को संसार में आने की क्या आवश्यकता है? केवल कृपा ही कारण है ।
.
*ज्यों राखै त्यों रहेंगे, अपने बल नांही ।*
*सबै तुम्हारे हाथ है, भाज कत जांही ॥१६॥*
हे परमेश्वर ! जैसी आपकी इच्छा होती है, जीव वैसे ही सब व्यवहार करता है । न कि अपनी इच्छा से । क्योंकि प्राणी मात्र आपके अधीन है । आप को छोड़कर भागे तो कहां जाय ? क्योंकि आप सर्वव्यापक हैं ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

समर्थता का अंग २१ - ९/१२

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - ९/१२) 
.
*॥ पोष प्रतिपाल रक्षक ॥
*दादू सोई सही साबित हुआ, जा मस्तक कर देइ ।*
*गरीब निवाजे देखतां, हरि अपना कर लेइ ॥९॥*
जिसके मस्तक पर भगवान् ने अपना वरदहस्त रख दिया वह अवश्य ही मुक्त हो जाता है । इसलिये भगवान् के अपार सामर्थ्य को जानकर उनकी जो भक्ति करता है वह इसी जन्म में भगवान् को प्राप्त कर लेता है । लिखा है कि जो संसार सागर में सुख दुःख आदि वायु से आहत हो रहे हैं पुत्र पुत्री आदि के पालन के भार से आर्त हैं । विषय रूपी विषम जल राशि में बिना नौका के डूब रहे हैं उन मनुष्यों के लिये एकमात्र जहाज रूप भगवान् ही शरण है ।
.
*॥ सूक्ष्म मार्ग ॥*
*दादू सब ही मारग सांइयाँ, आगै एक मुकाम ।*
*सोई सन्मुख कर लिया, जाही सेती काम ॥१०॥*
भक्ति, योग, ध्यान, ज्ञान आदि सभी मार्ग प्रभु प्राप्ति करने वाले हैं । परन्तु साधक को जो मार्ग सुलभ तथा अच्छा लगता है उसी मार्ग से चलकर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है ।
.
*॥ पोष प्रतिपाल रक्षक ॥*
*मीरां मुझ सौं महर कर, सिर पर दीया हाथ ।*
*दादू कलियुग क्या करै, सांई मेरा साथ ॥११॥*
मेरे प्रभु ने मेरी भक्ति भाव से प्रसन्न होकर मेरे मस्तक पर अपना वरद हस्त धारण कर रखा है, और सदा मेरे साथ रहते हुए मेरी रक्षा करते हैं । अतः मुझे कलियुग से तथा उससे पैदा होने वाले दोषों से किंचिद् भी भय नहीं है । लिखा है कि-
हे वरद परमेश्वर ! तृष्णा रूपी जल, काम रूपी आंधी से उठी हुई मोह रूपी तरंगमाला स्त्री रूप भंवर और भाई रूपी ग्राहों से भरे हुए इस संसार रूपी समुद्र में डूबते हुए हम लोगों को अपने चरणारविन्द की भक्ति प्रदान कीजिये, जिससे हम आपको प्राप्त कर सकें ।
.
*॥ ईश्‍वर समर्थाई ॥*
*दादू समर्थ सब विधि सांइयाँ, ताकी मैं बलि जाऊँ ।*
*अंतर एक जु सो बसै, औरां चित्त न लाऊँ ॥१२॥*
मेरा प्रभु हर प्रकार से सर्व समर्थ है । मैं उसी को नमस्कार करता हूँ और वह ही मेरे हृदय में निवास करता है । अतः उसी का स्मरण कर रहा हूँ । अब मेरा मन किसी भी मायिक पदर्थों की तरफ नहीं जाता है । 
विवेकचूडामणि में- हे सद्गुरो ! इस भवसिन्धु को मैं कैसे पार करूंगा ? उसका उपाय क्या है ? मेरी क्या गति होगी ? आप कृपा करके मेरे इस संसार दुःख का नाश करो । तथा इससे मेरी रक्षा कीजिये । इस प्रकार शरण में आये हुए तथा संसार दावानल से संतप्त शिष्य को देखकर दया से द्रवीभूत होकर सहसा मेरे को अभय बना दिया ।
(क्रमशः)


बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

समर्थता का अंग २१ - ५/८

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - ५/८)
.
*दादू कर्त्ता करै तो निमष में, ठाली भरै भंडार ।* 
*भरिया गह ठाली करै, ऐसा सिरजनहार ॥५॥* 
जो प्रभु जिन धनवानों के धन से भरे हुए भण्डार हैं उनको क्षण भर में खाली कर देते हैं और जिनके पास कुछ भी नहीं है, उन निर्धनों को धनवान बना देते हैं । उस भगवान् की महिमा को कौन जान सकता है ? कोई भी नहीं । 
इसी भाव को लेकर आलविन्दारस्तोत्र में लिखा है कि- जिसकी महिमारूप समुद्र के छोटे से छोटे जल कण का भी मान बतलाने को शिव और ब्रह्मा आदि देवता समर्थ नहीं है । उन्हीं की महिमा का स्तवन करने के लिये उद्यत हुए मुझ निर्लज्ज कवि को नमस्कार है । भला मैं उनकी महिमा को क्या जानूं ? 
*दादू धरती को अम्बर करै, अम्बर धरती होइ ।* 
*निशि अँधियारी दिन करै, दिन को रजनी सोइ ॥६॥* 
जिसकी इच्छा से पृथिवी आकाश बन जाता है, तथा आकाश पृथ्वी बन जाती है, दिन रात और रात, दिन बन जाते हैं । उसकी महिमा को कौन जान सकता है ? 
लिखा है कि- मैं असमर्थ होने पर भी अपने परिश्रम और बुद्धि के अनुसार स्तुति करूंगा, क्योंकि सदा स्तुति करने वाले वेद और ब्रह्मा आदि देवता भी श्रम और बुद्धि के अनुसार ही स्तुति करते हैं । (पूरी स्तुति तो उनसे भी नहीं बन सकती) तो फिर उनमें और मेरे में क्या विशेषता हुई ? कुछ भी नहीं, भला महासागर के बीच डूबते हुए परमाणु और कुलाचल में क्या अन्तर है । 
*दादू मृतक काढ मसाण तैं, कहु कौन चलावै ।* 
*अविगत गति नहिं जाणिये, जग आन दिखावै ॥७॥* 
मरे हुए पुरुष को कोई भी जिन्दा करके नहीं चला सकता किन्तु परमात्मा अपनी अलौकिक शक्ति द्वारा मरे हुए को भी जिला सकता है । अतः उसकी गति को कौन जान सकता है ? वह अविगत माना गया है । 
लिखा है कि- आसुरी प्रकृति वाले पुरुष, आपके लोकोत्तर शीलरूप चरित्र परम उत्तम सत्त्वगुण, और सात्विक स्वभाव द्वारा आपको प्रबल शास्त्रों तथा देवसम्बन्धी परमार्थ को जानने वाले विख्यात पाराशरादि महर्षियों के सिद्धान्तों से भी यथावत् नहीं जान सकते । 
दादू गुप्त गुण परगट करै, परगट गुप्त समाइ । 
पलक मांहि भानै घड़ै, ताकी लखी न जाइ ॥८॥ 
जिनके गुण विख्यात हैं, उनको गुप्त कर देते हैं । तथा जिनके गुप्त गुण हैं, उनको कृपामयी दृष्टि से विख्यात गुण वाले बना देते हैं । क्षण मात्र में संसार की उत्पत्ति विनाश कर देते हैं । अतः उनके अपार सामर्थ्य को कौन जान सकता है ? लिखा है कि-जिसमें सारी पृथ्वी परमाणु रूप जल एक छीटें के समान तेज तुच्छ चिनगारी, वायु मन्द निःश्वास मात्र आकाश क्षुद्र सुराक के समान और शिव ब्रह्मा आदि देवता तुच्छ कीड़े के समान दीख पड़ते हैं । ऐसे आपके चरणरेणु के कण की बलिहारी हो ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020

समर्थता का अंग २१ - १/४

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग २१ - १/४)
.
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
*दादू कर्त्ता करै तो निमष मैं, कीड़ी कुंजर होइ ।*
*कुंजर तैं कीड़ी करै, मेट सकै नहिं कोइ ॥२॥*
सृष्टि को बनाने वाला परमात्म सर्वसमर्थ है । वह क्षण मात्र में हस्ती के सदृश बलवान् पुरुष को चींटी के तुल्य दुर्बल बना सकता है । तथा चींटी के तुल्य दुर्बल को महा बलवान् बना देता है । उसकी आज्ञा को मिटाने वाला इस विश्व में कोई नहीं है । 
कोई कवि कहता है कि- उस सर्व नियन्ता अद्भुत कर्म करने वाले भगवान् कृष्ण को नमस्कार हो जो धूलि से धूसरित होने पर भी तेजोमय दीख रहे हैं । द्वारिका के नाथ होकर भी गाय चरा रहे हैं । राजाओं के भी महाराजा होते हुए भी अर्जुन के सारथी बने हुए हैं । भीष्म पितामह को भयंकर दीखते हुए भी प्रह्लाद के लिये आल्हादजनक बने हुए हैं और सोलह हजार एक सौ आठ रानियों द्वारा सेवित होने पर भी जितेन्द्रिय कहलाते हैं । जैसे सूर्य का बिम्ब एक देश में दीखता हुआ सारे विश्व को प्रकाशित करता हुआ सर्वत्र दीखता है वैसे ही भगवान् श्री कृष्ण भी एकदेशी होते हुए भी सर्वगत है । साकार होते हुए भी भगवान् सच्चिदानन्द स्वरूप हैं ।
.
*दादू कर्त्ता करै तो निमष में, राई मेरु समान ।*
*मेरु को राई करै, तो को मेटै फरमान ॥३॥*
ईश्वर क्षण भर में राई को सुमेरुतुल्य तथा सुमेरु को राई के बराबर तुच्छ बना सकते हैं । अतः उनकी आज्ञा को कोई भंग नहीं कर सकता । 
भगवान् की अद्भुत शक्ति का वर्णन करते हुए लिख रहे हैं कि-
भगवान् श्री कृष्ण ने ब्रह्मा जी को अनन्त ब्रह्माण्ड अनन्त ब्रह्मा और बछड़ों सहित गोप तथा अनन्त विष्णुओं का दर्शन कराया । जिस कृष्ण भगवान् के चरणोदक को शंकर त्रिमूर्ति धारण करके अपने शिर पर धारण करते हैं । ऐसे अद्भुत शक्तिशाली अविकृत सच्चिदानन्दमय श्रीकृष्ण शम्भु ब्रह्मा जिनके कृपा पात्र हैं । जिन्होंने ब्रह्मा को त्रिलोकी का स्वामी बनाया जो हमारे कुल देवता हैं उनकी सदा जय हो ।
.
*दादू कर्त्ता करै तो निमष में, जल मांही थल थाप ।*
*थल मांही जलहर करै, ऐसा समर्थ आप ॥४॥*
ईश्वर अपनी माया नाम की अद्भुत शक्ति से जल की जगह स्थल और स्थल की जगह समुद्र बना सकता है । लिखा है कि-
जिसकी इच्छा से समुद्र सूक कर स्थल तथा स्थल समुद्र बन जाता है । धूलि के कण पर्वत तथा सुमेरु पर्वत मिट्टी का कण बन जाता है । व्रज तृण और तृण व्रज सदृश तथा बह्नि शीतल, हिम अग्नि सदृशदाहक बन जाता है । उस अद्भुत लीला करने वाले देव को हमारे नमस्कार हो ।
(क्रमशः)

रविवार, 11 अक्टूबर 2020

पीव पहिचान का अंग २० - ३२/३४

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷
🦚 #श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका 🦚
https://www.facebook.com/DADUVANI
भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
(#श्रीदादूवाणी ~ पीव पहिचान का अंग २० - ३२/३४)
.
*लोहा पारस परस कर, पलटै अपणा अंग ।*
*दादू कंचन ह्वै रहै, अपने सांई संग ॥३२॥*
जैसे लोहा पारसमणि के संयोग से लोह भाव को त्याग कर सुवर्ण हो जाता है । वैसे ही सद्गुरु की कृपा से जीव भी जीव भाव को त्याग कर ब्रह्म रूप हो जाता है ।
.
*दादू जिहिं परसे पलटै प्राणियाँ, सोई निज कर लेह ।*
*लोहा कंचन ह्वै गया, पारस का गुण येह ॥३३॥*
पारसमणि में यह गुण विशेष है कि, उसके संपर्क से लोहा सुवर्ण बन जाता है । ऐसे ही जिस सद्गुरु के उपदेश से शिष्य जीव भाव को त्याग कर ब्रह्म भाव को प्राप्त हो जाय वह ही सद्गुरु कहलाता है ।
.
*॥ परचै जिज्ञासा उपदेश ॥*
*दह दिशि फिरै सो मन है, आवै जाय सो पवन ।*
*राखणहारा प्राण है, देखणहारा ब्रह्म ॥३४॥*
जो संकल्प विकल्प करता हुआ इधर उधर दशों दिशाओं के विषयों में दौड़ता रहता है वह मन, और जो शरीर से बाहर आ जाता है, वायु का विकार स्थूल सूक्ष्म शरीर का रक्षक है वह प्राण आत्मा है, और इन सब को जो साक्षी भाव से देखता है, वह दृष्टा चेतन साक्षी कहलाता है । इस साक्षी का ब्रह्म से अभेद होने के कारण यह ब्रह्म रूप ही है । इस प्रकार साधक अपने को दृष्टा मान कर मुक्त हो जाता है ।
विवेकचूडामणि में कहा है कि- नित्य विभु सर्वगत अत्यन्त सूक्ष्म अन्तः शून्य तथा बहिः शून्य विज्ञानमय आत्मा को निजरूप से जानकर साधक रजोगुण से रहित निष्पाप तथा मृत्यु रहित हो जाता है ।
.
॥ इति पीव पिछाण के अंग का पं. आत्मारामस्वामीकृत भाषानुवाद समाप्त ॥२०॥
(क्रमशः)