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रविवार, 23 जून 2019

= अबिहड़ का अँग ३७(१०-११) =


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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*अबिहड़ का अँग ३७*
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अबिहड़ अँग बिहड़ै नहीं, अपलट पलट न जाइ ।
दादू अघट एक रस, सब में रह्या समाइ ॥१०॥
व्यापक - स्वरूप ब्रह्म कभी भी किसी से अलग नहीं होता, वह अपरिवर्तन रूप है, बदल कर कहीं भी नहीं जाता । अत: न घटने - बढ़ने वाला एकरस ब्रह्म सब में परिपूर्ण है ।
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*अंत समय की साखी*
जेते गुण व्यापैं जीव को, तेते तैं तजे रे मन ।
साहिब अपणे कारणैं, भलो निबाह्यो प्रण ॥११॥
इति अबिहड़ का अँग समाप्त: ॥ ३७ ॥ सा - २५२७ ॥
हे मन ! जितने भी मायिक गुण अन्त:करण में व्याप्त होते हैं, उन सबको त्याग करके और उन्हें अन्त:करण में पुन: न आने देने का प्रण करके अपने प्रभु - प्राप्ति के लिए उस प्रण का तूने अच्छा निर्वाह किया है । इस साखी के तीन चरण ही ब्रह्मलीन होने के समय उच्चारण किये थे ।
*इति श्री पूज्यचरण स्वामी धनराम के शिष्य स्वामी नारायणदास कृत श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका अबिहड़ का अँग तथा साखी भाग समाप्त: ॥*
(क्रमशः)

शनिवार, 22 जून 2019

= अबिहड़ का अँग ३७(७-९) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 

*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*अबिहड़ का अँग ३७*
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दादू अबिहड़ आप है, साचा सिरजनहार । 
आदि अंत बिहड़े नहीं, बिनसै सब आकार ॥७॥
विनाशी होने से सभी आकारों का वियोग होता है, किन्तु सत्य निराकार सृष्टिकर्ता परमेश्वर का सृष्टि के आदि से अन्त तक कभी भी किसी से वियोग नहीं होता, अत: व्यापक होने से स्वयँ ब्रह्म ही सदा सबके साथ सँयोग वाला है ।
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दादू अबिहड़ आप है, अविचल रह्या समाइ ।
निहचल रमता राम है, जो दीसै सो जाइ ॥८॥
जो नाम रूपात्मक कार्य है, वे सब नष्ट हो जायेंगे, निश्चल तो एक सब में रमने वाला राम ही है और वह अचल होकर सब में परिपूर्ण है । अत: स्वयँ ब्रह्म ही सदा साथ रहने वाला है ।
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दादू अबिहड़ आप है, कबहूं बिहड़ै नाँहिं ।
घटै बधै नहिं एक रस, सब उपज खपै उस माँहिं ॥९॥
स्वयँ ब्रह्म ही सदा सबके साथ रहते हैं, कभी भी किसी से अलग नहीं होते । सदा एक रस रहते हैं, घटते बढ़ते नहीं । अन्य सब मायिक सँसार उन्हीं में जल के बुदबुदे की तरह उत्पन्न होकर लय होता रहता है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 21 जून 2019

= अबिहड़ का अँग ३७(४-६) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*अबिहड़ का अँग ३७*
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संगी सोई कीजिये, सुख दुख का साथी । 
दादू जीवन - मरण का, सो सदा संगाती ॥४॥ 
जो सुख दु:ख में साथ देने वाला हो, जीवन काल और मरने के पश्चात् भी सदा संग रह सकता हो, उसी को अपना साथी बनाओ ।
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दादू संगी सोई कीजिये, जे कबहूं पलट न जाइ ।
आदि अंत बिहड़ै नहीं, तासन यहु मन लाइ ॥५॥
जिसमें बाल - युवादि काल - जन्य परिवर्तन कभी भी नहीं होते और जो सृष्टि के आदि काल से प्रलय पर्यन्त किसी से भी अलग नहीं होता, उसी परमेश्वर को अपना साथी बनाकर, यह मन उसी में लगाओ ।
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दादू अबिहड़ आप है, अमर उपावनहार ।
अविनाशी आपै रहे, बिनसे सब सँसार ॥६॥
६ - १० में नित्य साथ रहने वाले ब्रह्म - तत्व का परिचय दे रहे हैं - सब सँसार नष्ट होता है, सँसार को उत्पन्न करने वाले अविनाशी परमात्मा, साधनादि उपाय बिना, अपने आप ही अमर रहते हैं । अत: सबके साथ नित्य सँयोग स्वयँ ब्रह्म का ही रहता है, अन्य का नहीं ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 20 जून 2019

= अबिहड़ का अँग ३७(१-३) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*अबिहड़ का अँग ३७*
बेली - अँग के अनन्तर जिसका सदा सँयोग रहता है, उस एकरस अद्वैत अविनाशी ब्रह्म - तत्व के विचार “अबिहड़ का अँग” निरूपण करने में प्रवृत्त हुये मँगल कर रहे हैं - 
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दादू नमो नमो निरंजनँ, नमस्कार गुरुदेवत: ।
वन्दनँ सर्व साधवा, प्रणामँ पारँगत: ॥१॥
जिनकी कृपा से साधक अज्ञान से पार हो, ब्रह्म के नित्य सँयोग को समझ कर ब्रह्मरूप ही हो जाता है, उन निरंजन राम, सद्गुरु और सर्व सँतों को हम अनेक प्रणाम करते हैं ।
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दादू संगी सोई कीजिये, जे कलि अजरावर होइ ।
ना वह मरै न बीछुटे, ना दुख व्यापे कोइ ॥२॥
२ - ५ में सदा एकरस रहने वाले परमात्मा को ही अपना साथी बनाने की प्रेरणा कर रहे हैं - जो सँसार में देवताओं से भी अति श्रेष्ठ है, न मरता है, न किसी से बिछुड़ता है और न ही जिसको कोई दु:ख होता है, उसी परमात्मा को अपना साथी बनाओ ।
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दादू संगी सोई कीजिये, जे थिर इहिं सँसार ।
ना वह खिरै१ न हम खपैं२, ऐसा लेहु विचार ॥३॥
जो इस सँसार में सदा सम्यक् स्थिर रहता है, कभी भी अपनी स्थिति से क्षय१ होकरनहीं गिरता और जिसको साथी बनाकर हम भी नष्ट२ नहीं हों, विचार करने पर जो ऐसा सिद्ध हो, उसी को अपना साथी बनाओ ।
(क्रमशः)

मंगलवार, 18 जून 2019

= बेली का अँग ३६(१५-१६) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*बेली का अँग ३६*
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सतगुरु संगति नीपजे, साहिब सींचनहार ।
प्राण वृक्ष पीवै सदा, दादू फले अपार ॥१५॥
सद्गुरु की संगति से जीवात्मा में भक्ति उत्पन्न होती है, फिर यदि परमात्मा अपने अनुग्रह जल से सींचने वाले हों और प्राणी - वृक्ष उस जल को सदा पान करता रहे अर्थात् भगवत् - कृपा का अनुभव करता रहे तो असीम अभेद - ज्ञान रूप फल प्राप्त होता है ।
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दया धर्म का रूँखड़ा१, सत सौं बधता जाइ ।
सँतोष सौं फूलै फलै, दादू अमर फल खाइ ॥१६॥
इति बेली का अँग समाप्त: ॥ ३६ ॥ सा - २५१६ ॥
दया रूप धर्म का वृक्ष१ सत्यपालन द्वारा बढ़ता है, पूर्ण सँतोष से उसके भक्ति रूप फूल और ब्रह्मज्ञान रूप फल आता है । उस फल को जो खाता है अर्थात् अभेद रूप से धारण करता है, वह अमर हो जाता है ।
इति श्रीदादू गिरार्थ प्रकाशिका बेली का अँग समाप्त: ॥३६॥
(क्रमशः)

सोमवार, 17 जून 2019

= बेली का अँग ३६(१३-१४) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*बेली का अँग ३६*
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अमृत बेली बाहिये, अमृत का फल होइ ।
अमृत का फल खाय कर, मुवा न सुणिया कोइ ॥ १३ ॥
अमृत बेलि लगाने से अमृत का ही फल लगेगा और अमृत फल खाकर कोई मर गया हो, ऐसा नहीं सुना जाता । वैसे ही भक्ति द्वारा मोक्ष प्राप्त करके पुन: कोई जन्म - मरणादि में आया हो, ऐसा नहीं सुना जाता ।
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दादू विष की बेलि बाहिये, विष ही का फल होइ ।
विष ही का फल खाय कर, अमर नहीं कलि कोइ ॥ १४ ॥
विष की बेलि बोने से विष का ही फल देगी और विष का फल खाकर इस कलियुग में कोई भी अमर नहीं होता । वैसे ही हृदय में विषय - वासना रखने से चित्त विषयों में ही जायेगा और विषयासक्त कोई भी अमर ब्रह्म को प्राप्त नहीं होता ।
(क्रमशः)

रविवार, 16 जून 2019

= बेली का अँग ३६(१०-१२) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*बेली का अँग ३६* 
दादू अमर बेलि है आतमा, खार समँदाँ माँहिं । 
सूखे खारे नीर सौं, अमर फल लागे नाँहिं ॥१०॥ 
यद्यपि जीवात्मा रूप बेलि अमर है, तो भी सँसार रूप क्षार समुद्र में अनित्यता रूप क्षार से युक्त विषय - जल से भ्रम रूप शुष्कता आ जाती है । "मैं अमर हूं” यह ज्ञान नहीं रहता और सँशय के कारण अमरता का ज्ञान कराने वाला ब्रह्म - ज्ञान रूप फल भी नहीं लगता । 
दादू बहु गुणवन्ती बेलि है, ऊगी कालर माँहिं । 
सींचे खारे नीर सौं, तातैं निपजे नाँहिं ॥११॥ 
जीवात्मा रूप बेलि बहुत - से दैवी गुणों से युक्त है किन्तु कुसंग रूप ऊसर भूमि में उत्पन्न होने और विषय रूप खारे जल से सींचने से इसके भक्ति - ज्ञान रूप फूल - फल नहीं लगते । 
बहु गुणवन्ती बेलि है, मीठी धरती बाहि । 
मीठा पानी सींचिये, दादू अमर फल खाहि ॥१२॥ 
जीवात्मा - बेलि बहुत - से दैवीगुणों से युक्त है, इसे सत्संग रूप मधुर उर्वर भूमि में लगाकर भगवत्प्राप्ति के साधन रूप भक्ति मधुर जल से सींचो और इसके ज्ञान रूप अमर फल को खाकर अमर हो जाओ । 
(क्रमशः)

शनिवार, 15 जून 2019

= बेली का अँग ३६(७-९) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 

*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*बेली का अँग ३६*
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दादू सूखा रूँखड़ा, काहे न हरिया होइ । 
आपै सींचै अमीरस, सुफल फलिया सोइ ॥७॥ 
भक्ति रूप हरियाली से रहित सूखे अन्त:करण रूप वृक्ष को, यदि स्वयँ भगवान् अपने कृपामृत - रस से सींचें तो वह क्यों न हरा होगा ? और जो भक्ति रूप हरियाली को प्राप्त हुआ है, उसने ज्ञानरूप फल भी अवश्य ही दिया है । 
कदे न सूखै रूँखड़ा, जे अमृत सींच्या आप । 
दादू हरिया सो फलै, कछू न व्यापे ताप ॥८॥ 
यदि जीवात्मा स्वयँ ही सचेत होकर राम - नाम चिन्तन रूप अमृत सीँचता रहे तो, अन्त:करण रूप वृक्ष, काम - क्रोधादि रूप आतप से कभी भी नहीं सूख सकेगा । और जो भक्ति रूप हरियाली से युक्त रहेगा, वह अवश्य ज्ञान रूप फल को प्राप्त होगा तथा उसे कोई भी दु:ख न हो सकेगा । 
जे घट रोपे रामजी, सींचै अमी अघाइ । 
दादू लागै अमर फल, कबहूं सूख न जाइ ॥९॥ 
यदि अन्त:करण में रामजी भक्ति बेलि लगा दें और इतना कृपामृत सींचें कि कोई भी आशा न रहे, पूर्ण तृप्ति आ जाय, तब तो अवश्य ही अमरता देने वाला परब्रह्म - प्राप्ति रूप अमर - फल लगेगा ही । फिर तो यह कभी भी पुनर्जन्म रूप शुष्कता को प्राप्त न हो सकेगा ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 14 जून 2019

= बेली का अँग ३६(४-६) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*बेली का अँग ३६*
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दादू बेली आत्मा, सहज फूल फल होइ ।
सहज सहज सतगुरु कहै, बूझे बिरला कोइ ॥४॥
उक्त प्रकार साधन द्वारा जीवात्मा रूप बेलि को अनायास ही भक्ति - फूल और ज्ञान - फल प्राप्त होता है । सद्गुरु इस पद्धति को कहते रहते हैं किन्तु कोई विरला साधक ही शनै:शनै: समझ पाता है ।
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जे साहिब सींचे नहीं, तो बेली कुम्हलाइ ।
दादू सींचे साँइयां, तो बेली बधती जाइ ॥५॥
यदि परमात्मा जीवात्मा - बेली को अपने अनुग्रह - जल से न सींचे तो वह कुम्हला जाती है अर्थात् पतन की ओर जाती है और यदि वे सींचते रहें तो भक्ति - ज्ञानादि द्वारा बढ़ती जाती है ।
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हरि तरुवर तत आत्मा, बेली कर विस्तार ।
दादू लागे अमर फल, कोई साधू सींचनहार ॥६॥
यदि कोई सँत तत्व ज्ञान द्वारा सींचने वाला हो तो परमात्मा रूप श्रेष्ठ वृक्ष के आश्रय से जीवात्मा - बेलि अपना विस्तार कर लेती है और उसके अमरता देने वाला ब्रह्म ज्ञान रूप फल लग जाता है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 13 जून 2019

= बेली का अँग ३६(१-३) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*बेली का अँग ३६*
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साक्षी - भूत अँग के अनन्तर बेली के रूपक से आत्मा का परिचय कराने के लिये, “बेली का अँग” निरूपण करने में प्रवृत्त हुये मँगल कर रहे हैं ~
दादू नमो नमो निरंजनँ नमस्कार गुरुदेवत: ।
वन्दनँ सर्व साधवा, प्रणामँ पारँगत: ॥१॥
जिनकी कृपा से साधक आत्म - ज्ञान द्वारा अज्ञान से पार होकर परब्रह्म को प्राप्त होता है, उन निरंजन राम, सद्गुरु, और सर्व सँतों को हम अनेक प्रणाम करते हैं ।
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दादू अमृत रूपी नाम ले, आतम तत्वहिं पोषे ।
सहजैं सहज समाधि में, धरणी१ जल शोषे ॥२॥
२ - १६ आत्मा का बेलि के रूपक से परिचय करा रहे हैं, परमात्मा का अमृत रूप नाम - चिन्तन करते हुए तत्व - ज्ञान द्वारा अन्त:करण की अज्ञान से रक्षा करे और साधन द्वारा शनै: २ सहज समाधि धारण रूप धरती१, मायिक विषय - जल का शोषण करे अर्थात् वृत्ति निर्विषय करके ब्रह्म में लय करे ।
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पसरे तीनों लोक में, लिपत नहीं धोखे ।
सो फल लागे सहज में, सुन्दर सब लोके ॥३॥
वृत्ति ब्रह्म में लीन होने पर, जैसे बेलि वृक्ष से मिलकर फैल जाती है वैसे ही, जीवात्मा ब्रह्म से अभेद होकर तीनों लोकों में फैल जाता है अर्थात् अपने को व्यापक समझने लगता है, फिर जो सब लोगों में श्रेष्ठ माना जाता है, वही ब्रह्मानन्द रूप फल उसे प्राप्त होता है और वह विषयानन्द के धोखे में आकर विषयों में लिपायमान नहीं होता ।
(क्रमशः)

बुधवार, 12 जून 2019

= साक्षीभूत का अँग ३५(१६-१७) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साक्षीभूत का अँग ३५*
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देवे लेवे सब करे, जिन सिरजे सब लोइ१ ।
दादू बन्दा महल में, शोभा करैं सब कोइ ॥१६॥
जिन परमात्मा ने सब लोगों१ को रचा है, वही परमात्मा सबको अनुकूलता देते हैं, प्रतिकूलता अपहरण करते हैं । सन्त तो समाधि महल में परब्रह्म - परायण रह कर साक्षी रूप से ही रहता है, तो भी लोग अपने सुख का निमित्त उसे ही मानकर उसकी शोभा करते हैं ।
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*कर्ता साक्षी - भूत*
दादू जुवा खेले जाणराइ, ताको लखै न कोइ । 
सब जग बैठा जीत कर, काहू लिप्त न होइ ॥१७॥
इति साक्षीभूत का अँग समाप्त: ॥३५॥सा - २५००॥
कर्त्ता की साक्षीरूपता दिखा रहे हैं, सँपूर्ण ज्ञानियों से श्रेष्ठ सर्वज्ञ परमात्मा सँसार की उत्पत्ति, पालन, प्रलय रूप जुआ का खेल खेल रहा है, किन्तु खेल के साधन रूप सँसारी जीवों में से उसे कोई भी नहीं देख पाता । वह लाभ - हानि के हर्ष - शोकादिक किसी भी गुण से लिप्त नहीं होता और सब जगत् को अपने अधीन करके अपनी महिमा में स्थित है ।
इति श्रीदादू गिरार्थ प्रकाशिका साक्षीभूत का अँग समाप्त: ॥३५॥
(क्रमशः)

मंगलवार, 11 जून 2019

= साक्षीभूत का अँग ३५(१३-१५) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साक्षीभूत का अँग ३५*
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केई सेवक ह्वै रहे, केई साधु संगति माँहिं ।
केई आइ दर्शन करैं, हम तैं होता नाँहिं ॥१३॥
और कितने ही सेवक बन कर रहते हैं, साधु संगति में आते हैं, नियम से प्रतिदिन आकर दर्शन करते हैं । किन्तु ये सब कर्म, स्वयँ को अकर्त्ता समझने वाले साक्षी रूप सँत से नहीं होते । कारण, इन सबका फल - ज्ञान उन्हें प्राप्त है, अत: वे निरन्तर ब्रह्म - चिन्तन में ही रत रहते हैं ।
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ना हम करैं करावैं आरती, ना हम पिवैं पिलावैं नीर ।
करे करावै साँइयां, दादू सकल शरीर ॥१४॥
न तो हम आरती करते हैं और न कराते हैं । न हम चरणोदक पीते हैं और न पिलाते हैं, किन्तु ये सब तो सँपूर्ण शरीरों में आत्म रूप से स्थित परमात्मा ही प्रेरणा द्वारा करते कराते हैं ।
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करै करावै साँइयां, जिन दीया औजूद ।
दादू बन्दा बीच मैं, शोभा को मौजेद ॥१५॥
जिन परमात्मा ने शरीर दिया है, वे ही लोक - कल्याणादि सब कुछ कार्य करते कराते हैं । सँत रूपी दास तो कार्य करवाने के मध्य में साक्षी रूप से शोभा के लिए ही उपस्थित रहता है ।
(क्रमशः)

सोमवार, 10 जून 2019

= साक्षीभूत का अँग ३५(१०-१२) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साक्षीभूत का अँग ३५*
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बुरा भला शिर जीव के, होवे इस ही माँहिं ।
दादू कर्ता कर रह्या, सो शिर दीजै नाँहिं ॥१०॥
जीव के किये हुए बुरे - भले कर्म का फल जीव को ही भोगना पड़ता है, कारण, बुरे - भले कर्म के करने की भावना इस जीव के अन्त:करण में ही होती है, अत: स्वत: सँसार व्यवस्थार्थ ईश्वर ने जो रचना की है, उस का कर्म - फल उसके शिर नहीं पटकना चाहिये ।
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*साधु साक्षीभूत*
कर्ता ह्वै कर कुछ करे, उस माँहि बंधावे ।
दादू उसको पूछिये, उत्तर नहीं आवै ॥११॥
११ - १६ में सन्त की साक्षीरूपता दिखा रहे हैं, जो अपने को कर्त्ता मानकर जो कुछ कर्म करता है, वह उसकी फलाशा से बँध कर, अपने कर्मों फल सुख - दु:ख को भोगता है, अत: इस सुख - दु:ख का कारण पूछने पर वह निरुत्तर हो जाता है । किन्तु जो ज्ञानी सन्त फलाशा से रहित, कर्म का साक्षी रूप होकर कर्म करते हैं वे कर्म का फल चाहते ही नहीं । अत: उन्हें सुख - दु:ख अनुभूति भी नहीं होती ।
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दादू केई उतारैं आरती, केई सेवा कर जाहिं ।
केई आइ पूजा करैं, केई खिलावें खाहिं ॥१२॥
फलाशा से कितने ही लोग भक्ति करने का भाव हृदय में रखकर आरती उतारते हैं, सेवा करते हैं, समय पर आकर पूजा करते हैं, और खिलाने के पश्चात् प्रसाद खाते हैं ।
(क्रमशः)

रविवार, 9 जून 2019

= साक्षीभूत का अँग ३५(७-९) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साक्षीभूत का अँग ३५*
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*स्वकीय मित्र - शत्रुता*
दादू जामन मरणा सान१ कर, यहु पिंड उपाया ।
सांई दीया जीव को, ले जग में आया ॥७॥
७ - १० में अपनी ही बनाई हुई मित्रता तथा शत्रुता का परिचय दे रहे हैं, जन्म - मरण से युक्त१ करके यह शरीर बना कर भगवान् ने जीव को प्रदान किया है । जीव इसे लेकर सँसार में आया है और अपने भेद व्यवहार द्वारा इस ने मित्रता - शत्रुता खड़ी कर ली है ।
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विष अमृत सब पावक पाणी, सतगुरु समझाया ।
मनसा वाचा कर्मणा, सोई फल पाया ॥८॥
सद्गुरु ने जीवों को समझा दिया था, विषयासक्ति विष है, ब्रह्म - ज्ञान अमृत है, आसुरी गुण अग्नि है, दैवी गुण जल है, फिर तो जीव मन, वचन, कर्म से जिसमें संलग्न हुआ, उसे वैसा ही फल मिला अर्थात् विषयासक्ति विष से बारम्बार मृत्यु, ज्ञानामृत से ब्रह्म प्राप्ति रूप अमरता, आसुरी गुण - अग्नि से हृदय दाह और दैवी गुण - जल से हृदय में स्वच्छता, शीतलता रूप फल प्राप्त किया ।
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दादू जानै बूझै जीव सब, गुण औगुण कीजे ।
जान बूझ पावक पड़ै, दई दोष न दीजै ॥९॥
जीव गुण - अवगुणादि सब को जानता है और उनमें संलग्न होने के परिणाम को भी समझता है, किन्तु जान - बूझकर भी अवगुण रूप अग्नि में ही गिरता है, तब दैव को क्या दोष दिया जाय ! यह तो आप ही अपना शत्रु - मित्र बनता है ।
(क्रमशः)

शनिवार, 8 जून 2019

= साक्षीभूत का अँग ३५(४ - ६) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साक्षीभूत का अँग ३५*
.
*कर्त्ता साक्षीभूत*
करता है सो करेगा, दादू साक्षीभूत ।
कौतिकहारा१ ह्वै रह्या, अणकरता अवधूत२॥४॥
४ - ६ में परमात्मा की साक्षी रूपता दिखा रहे हैं, साक्षी रूप परमात्मा ही सत्ता द्वारा सब कुछ करता है और करेगा, किन्तु फिर भी वह खेल१ करने वाले वो खेल देखने वाले के समान अकर्त्ता रह कर कर्म - फलादि सबसे मुक्त२ रहता है ।
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दादू राजस कर उत्पत्ति करै, सात्विक कर प्रतिपाल ।
तामस कर परलै करै, निर्गुण कौतिकहार ॥५॥
साक्षी रूप परमात्मा सत्ता द्वारा राजस शक्ति से उत्पत्ति, सात्विक शक्ति से पालन, तामस शक्ति से प्रलय करते हैं और निर्गुणरूप से खिलाड़ी के वो खेल देखने वाले के समान इस खेल से अलग ही रहते हैं ।
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दादू ब्रह्म जीव हरि आत्मा, खेलैं गोपी कान्ह ।
सकल निरन्तर भर रह्या, साक्षीभूत सुजान ॥६॥
हे सुजान साधक ! वह साक्षी रूप परमात्मा ही ब्रह्म, ईश्वर, जीव और आत्मा रूप से पुकारा जाता है तथा सब चराचर जगत् में निरन्तर परिपूर्ण रूप से रहता है और वही कृष्ण बन कर अपनी भक्त गोपियों की इच्छा पूर्ति के लिए रास खेलता है ।
(क्रमशः)

शुक्रवार, 7 जून 2019

= साक्षीभूत का अँग ३५(१ - ३) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साक्षीभूत का अँग ३५*
.
विनती - अँग के अनन्तर साक्षी स्वरूप का विचार करने के लिये "साक्षी भूत का अँग" निरूपण में प्रवृत्त हुये मँगल कर रहे हैं - 
दादू नमो नमो निरंजनँ, नमस्कार गुरुदेवत : । 
वन्दनँ सर्व साधवा, प्रणामँ पारँगत: ॥१॥ 
जिनकी कृपा से साधक भ्रम से पार हो, साक्षी के स्वरूप को पहचान कर परब्रह्म को प्राप्त होता है, उन निरँजन राम, सद्गुरु और सर्व सँतों को हम अनेक प्रणाम करते हैं । 
*भ्रम विध्वँसन* 
सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरे साखि । 
दादू साबित१ सो सही२, दूजा और न राखि ॥२॥ 
साक्षी सम्बन्धी भ्रम दूर कर रहे हैं - जो सँपूर्ण साँसारिक प्राणियों के शुभाशुभ कर्मों को देखने वाला है तथा आन्तर हृदय में जो साक्षी भरता है अर्थात् चेतन ही सत्य है, ऐसी भावना होती है, वही यथार्थ२ सिद्ध१ होती है । अत: अपने अन्त:करण में अन्य किसी को भी उपास्य रूप से मत रख । 
माँहीं तैं मुझ को कहै, अंतरजामी आप । 
दादू दूजा धँध है, साचा मेरा जाप ॥३॥ 
स्वयँ अन्तर्यामी परमात्मा साक्षी रूप से अन्त:करण में स्थित होकर हमको प्रेरणा करते हैं - "सत्य तो मेरा चिन्तन ही है, अन्य सब आडम्बर है ।"
(क्रमशः)

सोमवार, 3 जून 2019

= विनती का अँग(३४ - ७९) =

#daduji

॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*विनती का अँग ३४*
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*करुणा*
तुमको भावे और कुछ, हम कुछ कीया और ।
मिहर करो तो छूटिये, नहीं तो नाँहीं ठौर ॥७९॥
७८ - ८१ में करुणा दिखा रहे हैं - भगवन् ! आपको तो भक्ति, वैराग्यादि कुछ और प्रिय लगते हैं और हमने पर - पीड़न, विषयासक्ति आदि कुछ अन्य ही कार्य किये हैं । अत: अब आप ही कृपा करें तो, हम जन्मादि सँसार से छूट सकते हैं, नहीं तो हमें परम धाम कभी भी नहीं मिलेगा ।
(क्रमशः)

रविवार, 2 जून 2019

= विनती का अँग(३४ - ७८) =

#daduji


॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*विनती का अँग ३४*
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साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
परकट१ दर्शन देखते, दादू सुखिया देह ॥७८॥
यदि हमारा भगवत् में अनन्य प्रेम होता और भगवान् का भी हम में स्नेह होता तो हम प्रत्यक्ष१ में उनके दर्शन करते हुये ब्रह्मानन्द प्राप्ति रूप खेल खेलते और हमारा जीवात्मा परम सुख को प्राप्त हो जाता ।
(क्रमशः)

शनिवार, 1 जून 2019

= विनती का अँग(३४ - ७७) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*विनती का अँग ३४*
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*क्षण विछोह*
साहिब सौं मिल खेलते, होता प्रेम सनेह ।
दादू प्रेम सनेह बिन, खरी१ दुहेली२ देह३ ॥७७॥
७६ - ७७ में कहते हैं - प्रभु का एक क्षण का वियोग भी हमें दु:खप्रद है - यदि हमारा सच्चा प्रेम होता तो हमारे भगवान् भी हम से स्नेह करते और भगवान् से मिलकर हम दर्शनानन्द रूप खेल खेलते, किन्तु हमारे प्रेम और उनके स्नेह के अभाव से उनके दर्शन न होने के कारण मेरी जीवात्मा३ वास्तव१ में दुखी२ है ।
(क्रमशः)

गुरुवार, 30 मई 2019

= विनती का अँग(३४ - ७६) =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*विनती का अँग ३४*
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तुमहीं तैं तुम को मिले, एक पलक में आइ ।
हम तैं कबहुं न होइगा, कोटि कल्प जे जाइ ॥७६॥
प्रभो ! आपकी कृपा से तो यह जीव एक क्षण में ही सँसार दशा से ऊँचा उठकर आपको मिल सकता है किन्तु हमारे पुरुषार्थ से तो यदि करोड़ों कल्प व्यतीत हो जायं तो भी आपका दर्शन होना कभी संभव नहीं हो सकता । (क्रमशः)