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बुधवार, 5 दिसंबर 2018

= २०० =


🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*कछु न कहावै आपको, काहू संग न जाइ ।*
*दादू निरपख ह्वै रहै, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥*
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साभार ~ Mudit Mishra

गुरजिएफ एक बहुत अदभुत फकीर हुआ। उसकी दादी मरणशथ्या पर पड़ी थी। और गुरजिएफ ने अपनी दादी से पूछा कि तेरे जीवन के अनुभव और निष्कर्षों से अगर कोई बात मुझे देने योग्य हो और मेरी कोई पात्रता हो, तो मुझे दे दे। बड़ी अजीब बात उसकी की दादी ने दी।
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उसकी की दादी ने कहा, एक बात का अगर तू खयाल रख सके जीवन भर, कि जैसा दूसरे करते हों वैसा कभी मत करना। कोई भी काम, जैसा दूसरे करते हों वैसा कभी मत करना, सदा कोशिश करना कुछ अन्यथा करने की। गुरजिएफ ने तो इसके ऊपर बाद में एक पूरा का पूरा फलसफा, एक पूरा दर्शन खड़ा किया। और उसने एक नियम बनाया, दि ली ऑफ अदरवाइज; हमेशा और ढंग से करना। 
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गुरजिएफ ने इसकी चेष्टा की, और एक अनूठा आदमी पैदा हुआ। क्योंकि जैसा दूसरे करते हों वैसा मत करना, बड़े परिणाम हुए इसके। पहला परिणाम तो यह हुआ कि जैसा दूसरे करते हैं अगर आप वैसा ही करें, तो ही आपके अहंकार को पुष्टि मिलती है। तो आपके अहंकार को पुष्टि देने वाला कोई भी नहीं मिलेगा। लोग आप पर हंसेंगे।
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गुरजिएफ ने कहा है कि मेरी दादी ने मुझसे कहा कि मैं मरने के करीब हूं मुझे पता भी नहीं चलेगा कि तूने मेरी बात मानी कि नहीं मानी ! तो मरने के पहले मुझे तू उदाहरण एक करके दिखा दे। पास ही पड़ा था एक सेव, उसकी बूढ़ी दादी ने उसे दिया और कहा, इसे खाकर बता ! लेकिन याद रख, जैसा दूसरे करते हैं, वैसा मत करना।
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बड़ी मुश्किल में पड़ गया होगा वह बच्चा, क्या करे? लेकिन बच्चे इन्वेंटिव होते हैं, काफी आविष्कारक होते हैं। अगर मां—बाप उनके आविष्कार की बिलकुल हत्या न कर दें तो इस दुनिया में बहुत आविष्कारक लोग हों। लेकिन आविष्कार खतरा मालूम पड़ता है, क्योंकि नया कुछ उपद्रव लाता है।
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गुरजिएफ ने पहले कान से लगा कर उस सेव को सुना, आँख के पास लाकर देखा, चूमा, हाथ से स्पर्श किया आँख बंद करके; उस सेव को लेकर नाचा, उछला, कूदा, दौड़ा; फिर उस सेव को खाया। उसकी दादी ने कहा, मैं आश्वस्त हूं !
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फिर गुरजिएफ ने कहा, यह मेरी जिंदगी का नियम हो गया कि कुछ भी काम करो, दूसरे जैसा न करना; कुछ न कुछ अपने जैसा करना। लोग उस पर हंसते थे। लोग कहते, पागल है ! लोग कहते, यह किस तरह का आदमी है ! यह क्या कर रहा है ?' सेव को कान से सुन रहा है !
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गुरजिएफ ने कहा कि मुझे पता भी नहीं था, लेकिन इसका एक परिणाम हुआ कि मुझे दूसरों की चिंता न रही। दूसरे क्या कहते हैं, दूसरों का क्या मंतव्य है, दूसरे मेरे संबंध में क्या धारणा बनाते हैं, यह बात ही छूट गई; मैं अकेला ही हो गया; मैं निपट अकेला हो गया इस पूरी पृथ्वी पर। 
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और गुरजिएफ ने लिखा है, इस कारण मुझे वह मुसीबत कभी नहीं झेलनी पडी जो सभी को झेलनी पड़ती है। एक झूठा केंद्र मेरा निर्मित ही नहीं हुआ। और मुझे अहंकार मिटाने के लिए कभी कोई चेष्टा नहीं करनी पड़ी। वह बना ही नहीं।

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अध्यात्म उपनिषद ...ओशो(प्रवचन--05)
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= १९९ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*सत्संग नित प्रति कीजिये,*
*मति होय नर्मल सार रे,*
*रुचि प्राण पति सौं उपजे,*
*अति लहहिं सुख अपार रे ।*
*मुख नाम हरि हरि उच्चरे,*
*श्रुति सुणत गुण गोविन्द रे,*
*रट ररंकार अखंड धुनि,*
*तहं प्रकट पूरण चन्द्र रे ।*
*सतगुरु बिना नहीं पाइए,*
*ये अगम उलटो खेल रे,*
*कहे दास "सुंदर" देखतां,*
*होय जीव ब्रह्म ही मेल रे ॥*
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साभार ~ Gyan Aur Bhakti

सत्संग, सन्त-सन्निधि और शास्त्र-विचार का फलादेश है- अन्त:करण निर्मलता, अभयता एवं लक्षपूर्ति की तत्परता...!
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मनुष्य के जीवन में सत्संग का विशेष महत्व है। सत्संग एक प्रकार का औषधालय है, जो आत्मा का उपचार करता है। जिस प्रकार एक रोगी व्यक्ति शारीरिक उपचार के लिए चिकित्सक के पास जाता है, उसके परामर्श के अनुसार नियमित दवा का सेवन कर रोग से छुटकारा पता है। ठीक उसी तरह सद्गुरु के परामर्श से जो व्यक्ति नियमित सत्संग करता है, उसकी आत्मा की मलीनता का धीरे-धीरे नाश हो जाता है।
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इस भौतिकतावादी सांसारिक वातावरण में रहते हुए मनुष्य की मनोदशा तथा बौद्धिक स्थिति मलीन हो जाती है। इसके शुद्धिकरण के लिए पूर्ण सद्गुरू की शरण ग्रहण कर मनुष्य सत्संग को नियमित कर आत्मिक शुद्धता को प्राप्त करता है।
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नियमित सत्संग करने से मानव के कुविचारों और कुसंस्कारों का नाश होता है तथा उसके मन बुद्धि में सुविचारों तथा अच्छे संस्कारों का संचार होता है। विचार की शुद्धता के परिणाम स्वरूप मनुष्य की वाणी पवित्र होती है तथा आचरण व्यवहार संतों, सत्पुरुषों के समान पवित्र हो जाता है..।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

= १९८ =


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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*हार जीत सौं हरि रस जाई,*
*समझि देख मेरे मन भाई !*
*मूल न छाड़ी दादू बौरे,*
*जनि भूलै तूँ बकबे औरे ॥* 
(श्री दादूवाणी ~ पद. २७९)
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साभार ~ Gyan Aur Bhakti

जैसे ही अन्त:करण में शुभ-संकल्पता, सकारात्मकता और विधेयक भाव संपन्नता उदित होती है; उसी समय हमें संपूर्ण सृष्टि में सौन्दर्य, माधुर्य और अपनत्व अनुभूत होने लगेगा। अतः जीवन को आध्यात्मिक बनायें...! 
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सकारात्मक सोच ही है जो बदल सकती है आपकी दुनिया और जीने का अंदाज़ भी। जो दे आपको जीने के लिए आशा की किरण और दिलाए सफलता प्राप्त करने का अचूक विश्वास। नकारात्मकता को दूर करने के लिए नित नूतन विचारों को पढ़ें, उनका प्रयोग करें। 
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हम महापुरुषों की, वैज्ञानिकों की, विचारकों की आत्मकथाएं पढ़ सकते हैं। उनकी गौरव गाथाएं पढ़ें जिससे आप नैतिक रूप से मजबूत हो सकें। उनकी आत्म कथाओं से पता लगेगा कि उन्होंने चुनौतियां किस रूप में स्वीकारी, कठिनाइयों को किस तरह से सरल किया। सकारात्मकता का मतलब है - आप बहुत आशावादी हैं। आशावादिता का अर्थ यह है कि आप में निराशा नहीं है। 
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सकारात्मकता तीन चीजें साथ लेकर चलती हैं। पहली - नव सृजन यानी नूतनता या अभिनवता। आपको हर चीज नई करनी है। दूसरी चीज है - पुरातन। इससे आपको सीखना है। पुरातन यानी भूतकाल आपका शिक्षक बने और भविष्य के प्रति आप आशावादिता रखें। अब तीसरी चीज है - वर्तमान। वर्तमान में यदि कहीं कठिनाई, दुविधा है या कोई चुनौती अनुभव कर रहे हैं तो इसका अर्थ है कि वो चुनौती आपकी सक्षमता को जगाने के लिए है। आप और अधिक योग्य बनें, श्रमवान बनें अथवा अपने सामर्थ्य को जगाएं। 
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जिनमें हम देखते हैं कि सकारात्मकता खो गई है तो इसका अर्थ यह हुआ कि वे वर्तमान की प्रति सजग नहीं हैं और भविष्य के प्रति आशावादी नहीं हैं। आशावादिता एक चीज साथ लेकर चलती है जिसका नाम है - आत्मविश्वास। सकारात्मक व्यक्ति वही है जो अपने आत्मविश्वास को संभालकर रखता है। और, आत्मविश्वासी व्यक्ति ही सफलता की ओर बढ़ता है। आत्मविश्वास सफलता की कुंजी है। इसलिए सफलता वहां है जहां स्वयं के प्रति विश्वास है और इसका मूल है - सकारात्मकता...।

= १९७ =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू मन ही मांहैं ऊपजै, मन ही मांहि समाइ ।*
*मन ही मांहैं राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥*

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साभार ~ Dhaval Parmar
एक सूफी कहानी तुमसे कहूं। एक आदमी जंगल गया। शिकारी था। किसी झाड़ के नीचे बैठा था थका—मांदा, पास ही एक खोपड़ी पड़ी थी किसी आदमी की। ऐसे ही, कभी—कभी हो जाता है न, तुम भी अपने स्नानगृह में अपने से बात करने लगते हो कि आईने के सामने खड़े होकर मुंह बिचकाने लगते हो। आदमी का बचपन कहीं जाता तो नहीं। खोपड़ी पास पड़ी थी, ऐसे ही बैठे, कुछ काम तो था नहीं, उसने कहा : हलो ! क्या कर रहे हैं? मजाक में ही कहा था। अपने से ही मजाक कर रहा था। खाली पड़ा था, कुछ खास काम भी नहीं था, आशा भी नहीं थी कि खोपड़ी बोलेगी।
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खोपड़ी बोली कि हलो ! घबड़ा गया एकदम ! अब कुछ पूछना जरूरी था, क्योंकि जब खोपड़ी बोली अब कुछ न पूछें तो भी भद्दा लगेगा। तो पूछा उसने कि आपकी यह गति कैसे हुई? तो उस खोपड़ी ने कहा : बकवास करने से। भागा शहर की तरफ घबड़ाहट में। भरोसा तो नहीं आता था, मगर बिल्कुल कान से सुना था, आंख से देखा था। सोचा जाकर राजा को कह दूं। कुछ पुरस्कार भी मिलेगा, ऐसी खोपड़ी अनूठी है ! राजमहल में होनी चाहिए।
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राजा को जाकर कहा कि ऐसी खोपड़ी देखी है। राजा ने कहा : फिजूल की बकवास मत कर ! उसने कहा : नहीं, बकवास नहीं कर रहा हूं। अपनी आंख से देखकर आ रहा हूं। भागा चला आया हूं आपको खबर देने। सम्राट् ने पहले तो टालने की कोशिश की, लेकिन वह शिकारी जाहिर था, प्रसिद्ध शिकारी था। सम्राट् उसे जानता भी था, झूठ बोलेगा भी नहीं। लेकर अपने दरबारियों को पहुंचा।
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शिकारी आगे—आगे प्रसन्नता से...उसने जाकर उस खोपड़ी से कहा : हलो ! खोपड़ी कुछ भी न बोली। अरे, उसने कहा : हलो ! खोपड़ी बिल्कुल न बोली। हिलाया खोपड़ी को, कहा : हलो ! मगर खोपड़ी एकदम सन्नाटे में हो गयी। थोड़ा घबड़ाया। राजा ने कहा : मुझे पहले ही पता था। अपने दरबारियों से कहा : उतारो इसकी गर्दन। उसकी गर्दन कटवा दी। जब राजा लौट गया गर्दन कटवा कर तो वह खोपड़ी बोली : हलो! आपकी यह गति कैसे हुई? उसने कहा : बकवास करने से।
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सावधान रहना ! जो तुमने न जाना हो, मत कहना। जो तुम्हारा अपना अनुभव न हो, उसे मत कहना। कहने का बहुत मन होता है। कहने की बड़ी आतुरता होती है। कहने का बड़ा मजा है, रस है। अहंकार को बड़ी तृप्ति मिलती है। अहंकार को ज्ञान दिखाने से ज्यादा और किसी बात में तृप्ति नहीं मिलती है। और जिसको ज्ञानी होना हो, जिसे सच में ही ज्ञान पाना हो, उसे इस भ्रांत वासना से बचना चाहिए। ऐसा मत करना। जो तुमने न जाना हो उसे मत कहना। इस दुनिया में लोग अगर उन बातों को कहना बंद कर दें जो उन्होंने नहीं जानी हैं तो बड़ी शांति हो जाए।

ज्योत से ज्योत जले👣 ओशो

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

= १९६ =

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*कर्मै कर्म काटै नहीं, कर्मै कर्म न जाइ ।*
*कर्मै कर्म छूटै नहीं, कर्मै कर्म बँधाइ ॥* 
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साभार ~ Gems of Osho

कर्म से कर्म नहीं कटता, अकर्म से कर्म कटता है. यह जो अनंत अनंत कर्म इकट्ठे कर लिए जाते हैं, इस समाधि के द्वारा नष्ट हो जाते हैं।
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यह थोड़ा समझने जैसा है। क्योंकि अनेक लोग सोचते हैं कि अगर कर्म बुरे इकट्ठे हो गए हैं तो अच्छे कर्म करके उनको नष्ट कर दें, वे गलती में हैं। बुरे कर्मों को अच्छे कर्म करके नष्ट नहीं किया जा सकता। बुरे कर्म बने रहेंगे और अच्छे कर्म और इकट्ठे हो जाएंगे, बस इतना ही होगा। वे काटते नहीं हैं एक दूसरे को। काटने का कोई उपाय नहीं है। 
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एक आदमी ने चोरी की, फिर वह पछताया और साधु हो गया। तो साधु होने से वह चोरी का कर्म और उसके जो संस्कार उसके भीतर पड़े थे, वे कटते नहीं हैं। कटने का कोई उपाय नहीं है। साधु होने का अलग कर्म बनता है, अलग रेखा बनती है। चोर की रेखा पर से साधु की रेखा गुजरती ही नहीं है। चोर से साधु का क्या लेना देना !

आप चोर थे, आपने एक तरह की रेखाएं खींची थीं, आप साधु हुए, ये रेखाएं उसी स्थान पर नहीं खिंचती हैं जहां चोर की रेखाएं खिंची थीं। क्योंकि साधु होना मन के दूसरे कोने से होता है, चोर होना मन के दूसरे कोने से होता है। तो होता क्या है, आपके चोर होने की रेखा पर साधु होने की रेखाएं और आच्छादित हो जाती हैं, कुछ कटता नहीं। तो चोर के ऊपर साधु सवार हो जाता है, बस। उसका मतलब? चोर साधु, ऐसा आदमी पैदा होता है। साधुता चोरी को नहीं काट सकती। चोर तो बना ही रहता है भीतर। इम्पोजीशन हो जाता है। एक और सवारी उसके ऊपर हो गई।
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तो चोर भी ठीक था एक लिहाज से और साधु भी ठीक था एक लिहाज से, यह जो चोर और साधु की खिचड़ी निर्मित होती है, यह भारी उपद्रव है। यह एक सतत आंतरिक कलह है। क्योंकि वह चोर अपनी कोशिश जारी रखता है, और यह साधु अपनी कोशिश जारी रखता है। और हम इस तरह न मालूम कितने कितने रूप अपने भीतर इकट्ठे कर लेते हैं, जो एक—दूसरे को काटते नहीं, जो पृथक ही निर्मित होते हैं।
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इसलिए यह सूत्र कहता है कि समाधि के द्वारा वे सब कट जाते हैं।
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कर्म से कर्म नहीं कटता, अकर्म से कर्म कटता है। इसको ठीक से समझ लें। कर्म से कर्म नहीं कटता, कर्म से कर्म और भी सघन हो जाता है, अकर्म से कर्म कटता है। और अकर्म समाधि में उपलब्ध होता है, जब कि कर्ता रह ही नहीं जाता। जब हम उस चेतना की स्थिति में पहुंचते हैं जहां सिर्फ होना ही है, जहां करना बिलकुल नहीं है, जहा करने की कोई लहर भी नहीं उठी है कभी; जहा मात्र होना, अस्तित्व ही रहा है सदा, जहां बीइंग है, डुइंग नहीं उस होने के क्षण में अचानक हमें पता चलता है कि कर्म जो हमने किए थे, वे हमने किए ही नहीं थे। कुछ कर्म थे जो शरीर ने किए थे शरीर जाने। कुछ कर्म थे जो मन ने किए थे मन जाने। और हमने कोई कर्म किए ही नहीं थे।
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इस बोध के साथ ही समस्त कर्मों का जाल कट जाता है। आत्मभाव समस्त कर्मों का कट जाना है। आत्मभाव के खो जाने से ही वहम होता है कि मैंने किया।
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अध्यात्म उपनिषद ~ ओशो

= १९५ =

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*साहिब साधु दयालु हैं, हम ही अपराधी ।*
*दादू जीव अभागिया, अविद्या साधी ॥* 
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साभार ~ गजेन्द्र कौरव
*"मुल्ला नसरुद्दीन शराब घर में"* 
मुल्ला नसरुद्दीन रोज शराब घर जाता, लेकिन पीने के पहले एक क्रियाकांड करता था। आखिर शराब घर के मालिक का कुतूहल न रुका। रोज अपने खीसे से एक मेंढक निकाल कर अपने टेबल पर रख लेता। शराब पीता, पीता रहता, फिर मेंढक को उठाकर खीसे में रखकर चला जाता। ऐसा रोज होता। स्वभावतः शराबगृह के मालिक ने एक दिन कहा कि नसरुद्दीन, इसका राज हमें भी समझाओ। यह मेंढक का रोज निकालना, फिर खीसे में रखना, इसका मतलब क्या है? 
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नसरुद्दीन ने कहा, मेंढक को निकाल कर रखता हूं फिर मैं पीना शुरू करता हूं। जब एक मेंढक की जगह मुझे दो दिखाई पड़ने लगते हैं, तब मैं समझ लेता हूं अब कुछ करना जरूरी है। तो उस मालिक ने पूछा फिर क्या करते हो? उसने कहा, फिर दोनों को उठा कर खीसे में रख लेता हूं और घर चला जाता हूं।
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जितनी तुम्हारी मूर्च्छा होगी उतनी चीजें जैसी हैं वैसी दिखाई नहीं पड़ेंगी। और इस आदमी को यह भी पता है कि मेंढक एक है। लेकिन वह भी कह रहा है कि फिर दोनों को उठा कर खीसे में रख लेता हूं। क्योंकि जब दो दिखाई पड़ते हैं, तो क्या किया जा सकता है? आत्मविश्वास खो जाता है, भरोसा टूट जाता है। तुमने अपने साथ जो भी किया है जन्मों-जन्मों में, उसका एक परिणाम बड़े से बड़ा जो हुआ है, जो सबसे ज्यादा आत्मघाती है, वह यह है कि तुम्हारी अपने पर श्रद्धा खो गई है। हर घड़ी तुम झूठ, बेईमानी का सहारा ले रहे हो।
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मुल्ला नसरुद्दीन के घर चोरी हुई। और दूसरे दिन चोर पकड़ भी लिया गया। तो वह गया पुलिस थाने, थानेदार की आज्ञा लेकर भीतर गया। चोर के पैर पकड़ कर बैठ गया। चोर तो बहुत हड़बड़ाया। उसने कहा, ‘क्या बात है?’ नसरुद्दीन ने कहा, ‘भैया, एक तरकीब मुझे भी बता दे। किस भांति तू घर में घुसा? बड़ा गजब का आदमी है। इसी तरह मैं भी घुस जाऊं और पत्नी को पता न चले। बस, यह राज बता दे।’
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तुम जीवन में अगर कुछ भी सीख रहे हो तो बस, धोखा ! तुम्हारी सारी कुशलता, चालाकी, होशियारी, दूसरे को धोखा देने पर निर्मित है। लेकिन ध्यान रखना, जब तुम दूसरे को इतना धोखा दोगे, तो तुम्हारी अपने पर श्रद्धा खो जायेगी। और धोखा देने से जो मिलता है वह ना-कुछ है। और खुद की श्रद्धा खो जाने से जो खो जाता है, वह बहुत कुछ है। तुम बड़े सस्ते में अपने को बेचे डाल रहे हो। बेच ही डाला है।
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इसलिए अगर मैं तुमसे कहूं कि तुम परमात्मा हो, तुम कहोगे, होगी सिद्धांत की बात, शास्त्रों में लिखी है, मगर जंचती नहीं है। जंचती नहीं है, इसलिए नहीं कि तुम परमात्मा नहीं हो; बल्कि इसलिए, कि इस परमात्मा होने और इस परमात्मा के छिपाने में इतना समय हो गया है। और तुम इतने काम कर चुके हो और उनका जाल तुम अपने चारों तरफ खड़ा कर चुके हो। वही तुम्हारा कर्मजाल है।
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इसलिए गुरु को तुम्हारा कर्मजाल तोड़ने के लिए भी नये कर्मजाल खड़े करने पड़ते हैं। जैसे एक कांटा लगा हो तो दूसरे कांटे को खोजना पड़ता है–कांटे से कांटा निकालने के लिए। दूसरे कांटे का कोई भी मूल्य नहीं है। दूसरा कांटा उतना ही कांटा है जितना पहला कांटा ! पहले को निकाल कर दूसरे को उस घाव में मत रख लेना कि इसने बड़ी कृपा की; कि इसने एक कांटे से छुटकारा दिला दिया। बहुत लोग वही कर रहे हैं। कांटे से कांटा निकल जाये, दोनों फेंक देना। बस, बेकांटा हो जाना ही समाधिस्थ हो जाना है।
(ओशो)

शनिवार, 1 दिसंबर 2018

= १९४ =

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*चंद सूर पावक पवन, पाणी का मत सार ।*
*धरती अंबर रात दिन, तरुवर फलैं अपार ॥* 
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साभार ~ Gyan Aur Bhakti

मनुष्य-जीवन ईश्वरीय उपहार है। अतः अपने वास्तविक स्वरूप का बोध और जीवन के प्रयोजन की पूर्ति ही जीवन का लक्ष्य हो; यही परम पुरुषार्थ है...! श्रीमद्भावतगीता को अध्यात्म दीप कहा गया है, इसकी फलश्रुति ही अध्यात्म है। अध्यात्म का अर्थ है - स्वभाव की और लौटना। "स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते"... । हमारी संस्कृति की जड़ें ही अध्यात्म है। अध्यात्म का अर्थ है - अपने स्वभाव में लौटना। अध्यात्म अपने स्वभाव में लौटने की यात्रा का नाम है। जहां शांति, आनन्द और स्थाई समाधान है। 
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अध्यात्म भीतर की उर्जा को, स्वयं की आग को जगाता है। यह बताता है कि कैसे विषम और प्रतिकूल परिस्थितियों में बड़ा बना जाएं? स्वयं का बाहरी विकास विज्ञान है और भीतरी विकास अध्यात्म है। अध्यात्म की प्रेरणा भी पूरी वसुधा को एक परिवार मान कर चलने की है। बहिर्जगत में विज्ञान ने दुनिया को एक सूत्र में आबद्ध करने का आधार प्रस्तुत किया है तो अंतर्जगत में वही प्रयोजन अध्यात्म पूरा करता है। अध्यात्म के बिना विज्ञान अधूरा है। 
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जीवन की स्वाभाविक मांग अध्यात्म है। जब उसकी पूर्ति होने लगती है, तब सहसा प्रसन्नता, आनंद, उल्लास, जीवन में धन्यता, उत्सव-धर्मिता, स्थायित्व, प्रसन्नता आदि अनुभूत होने लगती हैं। जिसके आने पर भ्रम-भय नहीं रहता, शोक नहीं रहता, फिर द्वंद भी कहाँ रहता है। हानि-लाभ, जन्म-मरण, यश-अपयश इन द्वंदों से ऊपर उठना ही अध्यात्म है। जो चेतना को प्रसादिक बना दे, वही तो अध्यात्म है। अध्यात्म स्वभाव का नाम है। जो हमें स्वभाव की ओर, अपने अस्तित्व की ओर, अपनी सत्ता की ओर ले आए, उसे अध्यात्म कहते हैं। 
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महापुरुषों के उपदेश ठीक तरह से सुनना आ जाए तो जीवन की शंकायें स्वमेव ही समाप्त हो जाएंगी। आत्म-तत्त्व के दर्शन, जागरण और समुन्नयन के लिए चार सोपान अति आवश्यक हैं - आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास। जीवन को सही दिशा में ले जाने का प्रयास तो हम सभी करते हैं, लेकिन यदि हम महापुरुषों के बताए दिशा-निर्देशों के अनुरूप चलें तो सम्भव है, हमारा जीवन सार्थक बन जाए। 
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आध्यात्मिक चिन्तन के अंतर्गत व्यक्ति को एकमात्र अतीन्द्रिय स्वरूप अनुसंधान के उद्देश्य को प्राप्त करने का संदेश दिया गया है। जिससे प्रत्येक मनुष्य अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता, संतुष्टि तथा शांति को प्राप्त करते हुए श्रेष्ठ जीवन जीने की कला सीख जाए। मनुष्य के भ्रम, भय, संदेह, तर्क-वितर्क और समस्याओं को अध्यात्म के द्वारा ही दूर किया जा सकता है। अध्यात्म भारतीय संस्कृति के प्राण हैं और भारतीय संस्कृति तो समूची वसुधा के प्राण हैं।

= १९३ =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू जे जे चित बसै, सोई सोई आवै चीति ।*
*बाहर भीतर देखिये, जाही सेती प्रीति ॥* 
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साभार ~ Soni Manoj

जो जहां भी है । समर्पित है सत्य को । ये फूल और यह धूप, लहलहाते खेत, नदी का कूल क्या प्रार्थनाएं नहीं हैं । यह व्यक्तित्व निवेदित ऊर्ध्व के प्रति क्या नहीं है ? गौर से देखना फूल को वृक्ष पर - वृक्ष की प्रार्थना है । यह वृक्ष का ढंग है प्रार्थना करने का । आदमी ही थोड़े प्रार्थना करता है । तुम तभी मानोगे जब वृक्ष जाएगा मंदिर में और गंगाजल चढ़ाएगा ? तभी तुम मानोगे ? जब वृक्ष पानी भर कर लाएगा और शंकर जी पर चढ़ाएगा, तभी तुम मानोगे ? और वृक्ष रोज अपने फूल झराता रहा शंकर पर, अपने पत्ते गिराता रहा, अपने प्राणों से पूजा करता रहा, इसे तुम स्वीकार न करोगे ? जो जहां है .... ।
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जो जहां भी है समर्पित है सत्य को । ये फूल और ये धूप, लहलहाते खेत, नदी का कूल क्या प्रार्थनाएं नहीं हैं ? प्रार्थनाएं अलग-अलग होंगी, अलग-अलग ढंग हैं वैविध्य है जगत में । और सुंदर है जगत - वैविध्य के कारण ।
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तो जब मुसलमान मस्जिद में झुके तो तुम यह मत सोचना कि गलत है । और मंदिर में जब हिंदू घंटियां बजाए तो तुम नाराज मत होना । और चर्च में जब ईसाई गुनगुनाए या बौद्ध अपने पूजागृह में बैठ कर ध्यान करे, तो तुम जानना : जो जहां है, वहीं समर्पित है सत्य को । और धूप और फूल भी प्रार्थना कर रहे हैं । सारा जगत प्रार्थना-मग्न है । झरने अपना गीत गुनगुना रहे हैं । स्त्रियां स्त्रियों के ढंग से जाएंगी, पुरुष पुरुष के ढंग से जाएंगे । और एक बार तुम्हें यह समझ में आ जाए कि मेरा ढंग मुझे खोज लेना है तो तुम दूसरी बात छोड़ दोगे, तुम दूसरों को घसीटने की आदत छोड़ दोगे ।
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दुनिया में बड़ा अहित हुआ है । पत्नी जिस मंदिर में जाती है, पति को भी ले जाती है । बाप जिस मंदिर में जाता है, बेटे को भी ले जाता है, इससे दुनिया में इतना अधर्म है । क्योंकि लोगों को स्वभाव के अनुकूल सुविधा नहीं है । मैंने वर्षों घूम कर देश में देखा । किसी को पाया जैन घर में पैदा हुआ है, वह उसका दुर्भाग्य हो गया । उसके पास हृदय था भक्ति का, लेकिन जैन घर में भक्ति के लिए कोई उपाय नहीं । वहां तो ध्यान की ही गूंज, एकमात्र गूंज है । किसी को मैंने देखा कि भक्ति के पंथ में पैदा हो गया है, वल्लभ संप्रदाय में पैदा हो गया है; लेकिन उसका कोई रस भक्ति में नहीं है ।
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ध्यान से सुगंध उठती , लेकिन ध्यान से दुश्मनी है पैदाइश के कारण । कहीं पैदाइश से कोई धर्म होता है ? स्वभाव से धर्म होता है । स्वभाव यानी धर्म । पैदाइश तो सांयोगिक घटना है । तुम किस घर मैं पैदा हुए, इससे थोड़े ही धर्म तय होता है ! दुनिया अगर सच में धार्मिक होना चाहती हो, तो हमें बच्चों को धर्म में जबर्दस्ती प्रवेश करवाने की पुरानी प्रवृत्ति छोड़ देनी चाहिए ।
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हमें बच्चों को, सारे द्वार खुले छोड़ देने चाहिए । उन्हें कभी मस्जिद भी जाने दो, कभी मंदिर भी, कभी गुरुद्वारा भी । उन्हें खोजने दो । सिर्फ उन्हें तुम एक रस दे दो कि खोजना है परमात्मा को, बस इतना काफी है । फिर तुम कैसे खोजो - कुरान से तुम्हें धुन मिलेगी कि गीता से - तुम्हारी मर्जी । पहुंच जाना परमात्मा के घर । कुरान की आयत दोहराते पहुंचोगे कि गीता के मंत्र पाठ करते, कुछ लेना-देना नहीं । तुम पहुंच जाना, अटक मत जाना कहीं ।
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शुभ होगा वह दिन, जिस दिन एक ही घर में कई धर्मों के लोग होंगे - पत्नी मस्जिद जाती, पति गुरुद्वारा जाता, बेटा चर्च में । और जब तक ऐसा न हो जाए, तब तक दुनिया में धर्म नहीं हो सकता, असंभव है । क्योंकि धर्म का पैदाइश से कोई भी संबंध नहीं है । तो तुम अपनी खोज करो । मेरे पास जो लोग हैं, यही मेरी देशना है उन्हें । इसलिए मैं सब पर बोल रहा हूं । तुम कभी-कभी चौंकते हो । 
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मेरे पास लोग आते हैं । वे कहते हैं, आप एक ही धारा पर बोलें, तो हम निश्चिन्त हो कर लग जाएं काम में । कभी आप भक्ति पर बोलते हैं, कभी आप ज्ञान पर बोलते हैं । कभी आप कहते हैं, डूब जाओ; कभी कहते हैं, साक्षी हो जाओ; कभी अष्टावक्र, कभी नारद -
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हम बड़ी बिबूचन में पड़ जाते हैं । तुम बिबूचन में मेरे बोलने के कारण नहीं पड़ रहे हो क्योंकि तुम अभी तक यह नहीं पहचान पाए कि रस क्या है ? तुम्हें अपना रस समझ में आ जाए इसलिए बोल रहा हूं । ये सारे शास्त्र तुम्हारे सामने खोल रहा हूं कि तुम्हें अपना रस पहचान में आ जाए । इसलिए बोल रहा हूं इतने पर, क्योंकि मेरी मान्यता है कि दुनिया में जितने मार्ग हैं, उतने ही तरह के लोग हैं ।

💮 ओशो 💮
अष्टावक्र महागीता
भाग ३ प्रवचन ६ से संकलन ।
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