शनिवार, 6 सितंबर 2014

= विं. त. १९/२० =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“विंशति तरंग” १९/२०)*
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*दौसा में चोखा बूसर के सुन्दरदास जी*
दौसहिं ग्राम जु चोखहिं बूसर, 
तां सुत सुन्दर नाम कहाई ।
वे जननी सुत आय गुरु ढिंग, 
पाद - सरोज विलोकि लुभाई ।
सुन्दर के सिर हाथ धर्यो गुरु, 
कानहि में निजमंत्र सुनाई ।
बालपने उपदेश दिये तिन, 
मातपिता घर तात रहाई ॥१९॥ 
दौसा ग्राम के बूसर गौत्रीय महाजन चोखाराम जी के घर जग्गाजी ने जन्म लिया । संतों के भक्त माता - पिता जब बालक को लेकर गुरुदेव श्री दादूजी के दर्शनार्थ आये, तब उस बालक के रूप को देखकर श्री दादूजी बोले - अरे सुन्दर ! आ गये । तब से उसका नाम सुन्दर ही रख दिया गया । गुरुदेव ने सुन्दर के शिर पर हाथ धरा, और गोद में लेकर कान में गुरुमंत्र सुना दिया । इस रहस्य को कोई नहीं समझ पाया । बालपने में ही उपदेश प्राप्त किया हुआ सुन्दर अपने माता - पिता के घर पलने लगा ॥१९॥ 
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*संत संन्यासी उदालक श्रीदादूजी से मिले*
संत संन्यासि उदालक के मन, 
दादु गुरु सत संगहिं आनी ।
श्रीमुख तें उपदेश सुने पुनि, 
ग्राम बिलूण प्रसिद्ध सुमानी ।
टोडर सारंग मेरु मुरारि जु, 
चेतन खाकिरु चतुर सुजानी ।
केवलदास सुजान भये सुध, 
गंगहुदास पदाम्बुज ठानी ॥२०॥ 
एक सन्यासी संत उदालक के मन में श्री दादूजी के दर्शन एवं सत्संग की भावना जागी । वे दौसा आये, गुरुदेव का उपदेश सुना, फिर लालसोट के पास बिलूणा ग्राम में रहकर भजन किया । परमसिद्ध विख्यात संत हुये । दौसा ग्राम में ही टोडर, सारंग, सुमेर, मुरारि, चेतन, खाकीराम, चतुरदास, सुजानदास, केवलदास, गंगादास आदि अनेक भक्त सेवक शिष्य बने ॥२०॥ 
(क्रमशः)

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