सोमवार, 17 नवंबर 2014

१३. बिपरीत ज्ञानी को अंग ~ ६

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॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*१३. बिपरीत ज्ञानी को अंग*
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*हंस श्वेत बक श्वेत देखिये समान दोऊ,*
*हंस मोती चुगै बक मछरी कौं खात है ।* 
*पिक अरु काक दोउऊ कैसें करि जाने जांहि,* 
*पिक अंब डार काक करंक हि जात है ॥* 
*सिंधौ अरु फटक पखान सम देखियत,* 
*वह तौ कठौर वह जल मैं समात है ।* 
*सुन्दर कहत ज्ञानी बाहिर भीतर शुद्ध,* 
*ताकौ पटतर और बातनि की बात है ॥६॥* 
॥ इति विपरीत ज्ञानी को अंग ॥१३॥ 
*वास्तविक ज्ञानी की पहचान* : यद्यपि हंस एवं वक(बगुला) दोनों ही समान रूप से श्वेत दिखायी देते हैं, परन्तु उन दोनों के कर्म पूर्णतः विपरीत है । उनमें से एक(हंस) मोती ही खाता है और दूसरा(बगुला) मछली खाकर ही पेट भरता है ।(१) 
इसी तरह कोयल और कौवा - दोनों का समान(काला) वर्ण है, परन्तु उनकी क्रियाओं में भेद है । एक(कोयल) आम्रवृक्ष की शाखा पर बैठती है; परन्तु दूसरा (कौवा) जहाँ कहीं भी बैठने में कोई हिचक नहीं मानता; यहाँ तक वह शव(मुर्दा शरीर) पर भी जा बैठता है ।(२) 
(तीसरा उदाहरण) सैन्धव लवण और स्फटिक(पत्थर) दोनों वर्ण में समान है, परन्तु उन दोनों की प्रकृति में यह भेद है कि एक(नमक) जल में तत्काल समा जाता है, दूसरा(स्फटिक) चिरकाल तक जल में पड़ा रहने पर भी उससे पृथक ही रहता है ।(३) 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इसी तरह ज्ञान बाहर भीतर - उभयथा शुद्ध रहता है; उसकी समानता(पटतर) कोई नहीं कर सकता । अन्य के लिये कुछ ऐसा कहना बात ही की बात(कथामात्र) है, उसमें कुछ सत्यता नहीं ॥६॥ 
॥ विपरीत ज्ञानी का अंग सम्पन्न ॥१३॥ 
(क्रमशः)

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