#daduji
सुन्दर काल प्रवीण अति, तूं कछु समुझै नांहि l
तूं जानैं जीवत रहूं, बहु मारै पल माहिं ll5 ll
टीका:---- तेरी मृत्यु, इस विषय में, बहुत चतुर है l तूं उसकी चतुराई को नही समझ पायगा l तूं सोचता हैं कि तूं दीर्घकाल तक जीवत रहे; परन्तु तेरी मृत्यु तुझे इसी क्षण मार देना चाह रही है l
llसत्य राम सा ll
तो सही चतुर तूंजान परवीन अति, परै जनि पिंजरै मोह कूवा l
पाइ उतत्म जन्म लाइ लैचपल मन, गाइ गोविंद गुन जीति जूवा ll
आपु ही आपु अग्यान नलनी बांध्यौ, बिना प्रभु बिमुख कै बार मूवा l
दास सुन्दर कहै परम पद तौ लहै, राम हरि रांम हरि बोल सूवा ll
टीका:--- रे तोते! तूँ वास्तव मे चतुर एंव बुघ्दिमान दिखायी देता है l तूँ जान बूझ कर इस सांसारिक मोहकूप रूप पिंजरे मे न फँस l तूँ उतम जन्म पाकर भी इस मति भरम - जाल में न आ l तुझे तो चाहिये कि तूँ हरिगुण गाता हुआ इस सांसारिक जूए को जीत ले l तूँ स्वयं ही अग्यानरूपी नलिनि से बंघ कर इस जगज्जाल मे फँस कर, पता नही, कितनी बार मरा जीया है l श्री सुन्दरदासजीकहते है कि--- अब तेरा मोक्ष इससे तभी हो सकता है जब तूँ निरन्तर हरिस्मरण ( राम नाम रटन ) मे लग जाय l
ll सुन्दर दास जी का उपदेश चितावनी को अंग ll
* सत्य राम सा *
पाणी अरू पाषाण के, पर्वत पृथ्वी मॉहि l
एक समाये सूर में, इक अवनि सु छाडे नाहि ll
टीका :----- पृथ्वी मे बर्फ और पत्थर दोनो ही प्रकारके पर्वत है, किन्तु बर्फ के पर्वत तो सूर्य मे समा जाते है, अर्थात गलकर किरणो व्दारा उँचे चढ जाते हैं, किन्तु पत्थर के पृथ्वी को नही छोडते, वैसे ही संत जो ब्रहम् मे मिल जाते है किन्तु असंत संसार को नही छोड़ते l.
llसत्य राम सा ll
गोली गोलै तीर के बल लागै कहिं ठांव l
तैसे रज्जब प्राण पिंड संग, हरि हिकमत बलि जांउ ll
टीका:-- गोली, गोला और तीर की चोट उनके बल से से किस स्थान पर लगती है ? उनका बन्दूक, तोप और धनुष से संयोग होता हे तभी लक्ष्य परजाके आधात कते है, वैसे ही अकेले शरीरसे वा जीवात्मा से कुछ नही होता दोंनो का संयोग होता है तभी कार्य होते हैं, भगवान की इस संयोग कला पर हम बलिहारी जाते है l.
llसत्य राम सा ll
तू कछु और बिचारत है नर, तेरो बिचार धर्योई रहैगो ll
कोटि उपाय करै धन कै हित, भाग लख्यौ तितनोई लहैगो ll
भोर कि सांझ धरी पल मांझ सु ,काल अचानक आइ गहैगो ll
राम भज्यौ न कियौ कछु सुकृत , सुन्दर यौ पछाताइ कहैगो ll
*सत्य राम सा *
<<<चिंतन बिन्दु >>>
* सतयुग का राजा सत्य था l धर्म मंत्री था l ध्यान और धारणा दो अंग रक्षकथे l अंहिसा सेनापति था l दया प्रजा थी l
** त्रेतायुग का राजा त्याग था l प्रेम मंत्री था l ग्यान और वैराग्य दो अंगरक्षक थे l उदारता सेनापति था l श्र्ध्दा प्रजा थी l
*** द्वापर युग का राजा दानी था l परमार्थ मंत्री था l श्रध्दाभाव दो अंग रक्षक थे l विश्वास सेनापति था l भक्ति प्रजा थी l
**** कलियुग का राजा स्वार्थ है l लोभ मंत्री है l ममता और अंहकार दो अंग रक्षक है l कोर्ध सेनापति हैं l कामी प्रजा हैं l (सत्य राम सा )

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