रविवार, 1 मार्च 2015

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卐 सत्यराम सा 卐
यहु मन बहु बकबाद सौं, बाय भूत ह्वै जाइ ।
दादू बहुत न बोलिये, सहजैं रहै समाइ ॥
कोटि यत्न कर कर मुये, यहु मन दह दिशि जाइ ।
राम नाम रोक्या रहै, नाहीं आन उपाइ ॥
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साभार : Ramjibhai Jotaniya ~
जल की मन की एक गति, जो नीचे को ही जाये।
बड़े जतन से राखिये, तब ही ऊँचे को जाये ॥
अर्थात्-पानी का बहाव हमेशा नीचे की तरफ ही होता है, यदि पानी को ऊपर चढ़ाना है तो यन्त्र यानि मोटर रूपी यन्त्र से ऊपर पहुँचाया जा सकता है। यही हालत मन की भी है नीच सोच, आसानी की और अनुचित बातें, वह जल्दी ग्रहण करता है, यदि मन को ऊँची दिशा में ले जाना है तो मन्त्र जाप का यन्त्र है जो ऊँचा से ऊँचा ले जा सकता है। सत्संग रूपी यन्त्र है, अच्छे ग्रन्थों का पठन-पाठन है, अपने आप को ऊँची से ऊँची मंजिल तक पहुँचाने के लिये। सोच लें हम, ये सब हमारे ही हाथ में है, राह मिल रही है, तो देर किस बात की----
तो प्रेम से और ह्रदय से बोलो--
श्रीमनन्नारायाण नारायण
हरि हरि, भज मन नारायण
नारायण हरि हरि-----
या फिर, जो आप गाना चाहो---

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