#daduji
|| श्री दादूदयालवे नमः ||
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= २५ . सांख्य ज्ञांन को अंग =*
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*देह जड़ देवल मैं आतमा चैतन्य देव,*
*याही कौं समुझि कर यासौं मन लाइये ।*
*देवल कौ बिनसत बार नहिं लागै कछु,*
*देव तौ सदा अभंग देवल मैं पाइये ॥*
*देव की सकति कर देवल की पूजा होइ,*
*भोजन बिबिध भांति भोग हू लगाइये ।*
*देवल तैं न्यारौ देव देवल मैं देखियत,*
*सुन्दर बिराजमांन और कहां जाइये ॥२०॥*
*उत्तम देवता* : इस देहरूप जड मन्दिर में आत्मरूप चेतन देवता विराजमान है - इस का विचार करते हुए इसी में अपना मन लगा ले ।
मन्दिर के नष्ट होने में कुछ भी समय नहीं लगेगा, परन्तु इसमें विराजमान देवता अखण्ड है, अविनाशी है ।
जितनी देवता में शक्ति होगी, उसी के अनुसार देवालय का महत्त्व माना जायेगा । तदनुसार ही इसकी पूजा होगी । अतः विविध खाध्य पदार्थों का इस को भोग लगाना चाहिये ।
इसलिये, *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इस देह रूप मन्दिर में ही उस आत्मरूप देवता के दर्शन होंगे । इस के लिये अन्यत्र कहाँ दौड़ धुप की जाय ॥२०॥
(क्रमशः)

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