रविवार, 4 अक्टूबर 2015


💐💐 ‪#‎daduji‬ 💐💐
॥ श्री दादूदयालवे नम:॥
३५७. त्रिताल ~
काया माँही खेल पसारा, काया माँही प्राण अधारा ।
काया माँही अठारह भारा, काया माँही उपावनहारा ॥ १ ॥ 
काया माँही सब वन राइ, काया माँही रहे घर छाइ ।
काया माँही कंदलि वास, काया माँही है कैलास ॥ २ ॥ 
काया माँही तरुवर छाया, काया माँही पंखी माया ।
काया माँही आदि अनंत, काया माँही है भगवन्त ॥ ३ ॥
काया माँही त्रिभुवन राइ, काया माँही रहे समाइ ।
काया माँही चौदह भुवन, काया माँही आवागवन ॥ ४ ॥ 
काया माँही सब ब्रह्मंड, काया माँही हैं नव खण्ड ।
काया माँही स्वर्ग पयाल, काया माँही आप दयाल ॥ ५ ॥ 
काया माँही लोक सब, दादू दिये दिखाइ ।
मनसा वाचा कर्मणा, गुरु बिन लख्या न जाइ ॥ ६ ॥ 
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव, इसमें जो ब्रह्माण्ड में है, वह काया में भी है, यह दिखाते हुए पिंड ब्रह्माण्ड की एकता बता रहे हैं कि -
काया माँही खेल पसारा ~ पृथ्वी पर अनेक लीलायें हैं, वैसे काया में अनेक तरंगें तासीर हैं । भूमिका के राजा, प्रजा, स्थानीय शरीर का राजा मन है और प्रजा प्रकृति जगत् में, धनवंत और कंगाल हैं । यहाँ श्‍वासो - श्‍वास ब्रह्म में लय लगाये रहे, सोई धनवान है और राम भजन के बिना जो श्‍वास ले, सोई कंगाल है । परन्तु जिसके हृदय में परमेश्‍वर का भाव है, सो उत्तम है और जिसका हृदय मलीन है, सोई अधम है । जिसका मन निर्मल, नि:शंक, निर्भय, उदार, अपने आत्मरूप से सन्तुष्ट है, सोई राजा है । जिसका अन्तःकरण तरह - तरह की कामनाओं से, राग - द्वेष से, भय शोक से, ईर्षा घृणा से गंदा रहता है, सोई अधम जीव है ।
काया माँही प्राण आधारा ~ प्राणाधार परमेश्‍वर जो सबका प्रतिपालन करता है, सो काया ही में है । सोई अपना आत्मा है । जीव का जीना - मरना अपने ही आधीन है । जो अपने को दृढ़ निश्‍चय से अमर मानता है सो अमर है और जो अपने को शरीर रूप मानता है, सो मृत्यु पाता है । जो अपने आत्मा में दृढ़ निश्‍चय से सत्य मार्ग में विचरता है, उसका प्रतिपालन अंतर्यामी आप करता है ।
“दादू हौं बलिहारी सुरति की, सब की करै संभाल ।” 
“दादू राजिक रिजक लीये खड़ा, देवे हाथों हाथ ।”
“दादू साँई सबन को, सेवक ह्वै सुख देइ ।”
काया माँही अठारह भारा, काया माँही उपावनहारा ~ अठारह, जैसे अष्टादश पुराण, स्मृति, महाभारत के पर्व, भगवद्गीता के १८ अध्याय और जगत प्रपँच, जैसे ब्रह्माण्ड में हैं, तैसे केश, लोम आदि काया में हैं । इन सबका रचने वाला एक आत्मा ही है । जैसे मायोपहित समष्टि रूप ईश्‍वर ने सब ब्रह्माण्ड रचा है, तैसे ही व्यष्टि रूप कायोपहित जीव, अपने कर्मानुसार अपने भोग - निमित्त प्रपँच रचकर हर्ष - शोक मानता है ।
“सिरजनहार तैं सब होइ । 
उत्पत्ति परलै करै आपै, दूसर नाँही कोइ ।”
काया माँही सब वनराइ ~ काया को वन विचार कर संत न्यारे हुए एवं वनराय श्रीराम जी, तिनको सब शरीरों में देख कर समता धारण की है । जैसे शरीर में सिरकेश, चिबुक - केश, बगल केशादि सब वन - पंक्ति है ।
“दादू जिन प्राणी कर जाणिया, घर वन एक समान ।” 
“सब जग माँही एकला, देह निरंतर बास ।”
“कबीर हरि का भाँवता, दूरहि तैं दीसंत । 
तन खीना मन उनमना, जग रूठा फिरन्त ॥
“ऐसे गृह में क्यूँ न रहै, मनसा वाचा राम कहै ।”
काया माँही रहे घर छाइ ~ घर हृदय, जिसमें संत राम - नाम लेते हुए स्थिर हो रहे हैं ।
“दादू जे मुख मांहै बोलता, श्रवणहुं सुणता आइ ।” 
“दादू चुम्बक देखि करि, लोहा लागै आइ ॥
काया माँही कंदली वास ~ आत्म - कँवल में वास, सोई पर्वत की कंदरा का वास है । जैसे ब्रह्मांड की गुफा में साधक निवास करते हैं, वैसे ही काया की भ्रमर, कन्दरा में साधक का चित्त निवास करता है ।
दादू राम नाम में पैसि करि, राम नाम ल्यौ लाइ ।
काया माँही है कैलास ~ दशवां द्वार माना है । शरीर में शून्य चक्र ही कैलास है ।
काया माँही तरुवर छाया, काया माँही पंखी माया ~ काया में ब्रह्म तरवर है, उसकी छाया रूप सुख है, इस वृक्ष पर माया में मोहित जीव पक्षी है ।
काया माँही आदि अनन्त, काया माँही है भगवंत ~ आदि ओंकार, अनन्त पसारा, भगवंत परमेश्‍वर, जिसका कभी भंग नहीं, जो सदा अभंग है, सोई कूटस्थ अपना आत्मा है ।
ऐसा तत्त अनूपम भाई, मरै न जीवै काल न खाई ।
काया माँही त्रिभुवन राइ ~ स्वर्ग, मृत्यु, पाताल । ‘राय’ - राम जी सो भक्तों के हृदय में विराजते हैं ।
अठ सिधि नौ निधि नांउं मंझारि । 
कहै कबीर भज चरन मुरारि ॥ 
काया माँही रहे समाइ ~ शरीर के भीतर, अन्तर्मुख वृत्ति करके ब्रह्म में लीन हो रहे ।
रे मन जाइ जहाँ तोहि भावै, अब न तोरे कोई अंकुश लावै ।
जहँ जहँ जाइ तहँ तहँ रामा, हरि पद चीन्ह किया विश्रामा ।
तन रीझत तब देखियत, सोई प्रगट्यो ग्यान ।
लीन निरन्तर बपु बिसराया । 
कहै कबीर सुख सागर पाया ॥ 
चौदह भुवन ज्ञान
काया माँही चौदह भवन ~ भक्ति अंग में पँच ज्ञान इन्द्रियें, पँच कर्म इन्द्रियें, चतुष्टय अंतःकरण यह १४ भवन कहलाते हैं और लोक प्रख्यात हैं । तिनके स्थान काया में अष्टांग योगानुसार कहते हैं ~
लोक ~~~~~~ निवासी ~~~~~~~~~~ काया स्थान 
१ भू: ~~~~~~ मनुष्य, पशु ~~~~~~~~ नाभि 
२ भुव: ~~~~~ भूत, पक्षी ~~~~~~~~~ उर(हृदय) 
३ स्व: ~~~~~ देवता ~~~~~~~~~~~~ उदर 
४ मह: ~~~~~ ॠषि ~~~~~~~~~~~~ छाती 
५ जन ~~~~~ सकामी भक्त ~~~~~~ कंठ 
६ तप: ~~~~~ सूर, सती, सन्यासी ~~ नासिका 
७ सत्य ~~~~ ज्ञानी, सन्यासी ~~~~~ दशम द्वार 
८ अतल ~~~~ महादेव ~~~~~~~~~~ कुक्षि
९ वितल ~~~~ बाणासुर ~~~~~~~~~ कमर
१० सुतल ~~~ मय नामा० ~~~~~~~ जंघा
११ तलातल ~~ बलि ~~~~~~~~~~~ जानु(घुटने)
१२ महातल ~~ वासुकि नाग ~~~~~~ पिंडली
१३ रसातल ~~ शेष ~~~~~~~~~~~~ गिरियां(टखने)
१४ पाताल ~~~ कद्रू के पुत्र ~~~~~~~ पगतली
[{(१) भू : - मनुष्य - पशु, स्थान - नाभि ।(२) भूव - भूत - पक्षी, स्थान - उर ।(३) स्व - देवता, स्थान - हृदय ।(४) मह: - ऋषि, स्थान - छाती ।(५) जन - भक्त सकामी, स्थान - कंठ ।(६) तप - सूर, सती, सन्यासी, स्थान - नासिका ।(७) सत्य - ज्ञानी सन्यासी, स्थान - दशवां द्वार ।(८) अतल - महादेव, स्थान कोख ।(९) वितल - बाणासुर, स्थान - कमर ।(१०) सुतल - मयनामा, स्थान - जंघा ।(११) रसातल - शेष, स्थान - घुटने ।(१२) तलातल - बलि, स्थान - पिंडली ।(१३) महातल - वासुकि नाग, स्थान - टखने(गिरियां) ।(१४) पाताल - कद्रू के पुत्र, स्थान - पगतली ।}]
काया माँही आवागवन ~ मन मनोरथ जो जीव के उपजते हैं, सोई आवागमन हैं ।
“अनेक रूप दिन के करै, यहु मन आवै जाइ ।”
काया माँही सब ब्रह्मंड ~ सुमेर में २१ स्वर्ग कहे हैं । उनके नाम ~ आसुरी, भूत, यम, किन्नर, ब्रह्म - राक्षस, राक्षस, काल, चित्रगुप्त, योगिनी, गन्धर्व, अर्यमा, महा स्वर्ग, तप स्वर्ग, जन स्वर्ग, सत्य स्वर्ग, देवी स्वर्ग, सुर नर लोक, देव स्वर्ग, पयाली स्वर्ग, विश्‍व कर्मों, खंड स्वर्ग । यहाँ शरीर में पीठ मध्य २१ गाँठें हैं, सोई स्वर्ग कहे हैं । विे पुराण में २१ स्वर्गों के नाम इस भांति से दिये हैं - आनन्द, प्रमोद, सौख्य, निर्मल, त्रिविष्टप, नाक - पृष्ठ, निवृत्ति, पौष्टिक, सौभाग्य, अप्सरस, निरहंकार, शांतिक, अमल, पुण्याय, मंगल, श्‍वेत, मन्मथ, उपसोहन, शान्ति, निर्वेद, अभेद ।
काया माँही है नव खंड ~ जैसे पृथ्वी के नव खंड कहे हैं, तैसे काया में नव द्वार हैं । अष्टांग योग में ९ चक्र इस प्रकार से दिये हैं ।
अष्टांग योग चक्र
चक्र  नाम === पंखड़ी = अक्षर = देवता ====== स्थान
१ मूलाधार === ४ ==== ४ === गणेश ====== गुदा
२ स्वाधिष्ठान =६ ==== ६ ==== ब्रह्मा ===== लिंग
३ निरंजन === ८ ==== ८ ==== मन ======= उदर
४ मणिपूर === १० === १० === पवन ====== नाभि
५ उद्यद ==== १२ === १२ === सूर्य ======= हृदय
६ विशुद्ध ==== १६ === १६ === चन्द्रमा ===== कंठ
७ बतीसा ==== ३२ === ३२ === विष्णु ====== तालु
८ आज्ञा ===== २ ==== २ === महादेव ===== मस्तक
९ ब्रह्मरंध्र === १००० = १००० = दसों दिशा === दशवां द्वार

“काया माँही स्वर्ग पयाल, काया माँही आप दयाल ।”
जंबू द्वीप के नव खंडों के नाम ये हैं - १. इलावृत्त, २. रम्यक, ३. हिरण्यमय, ४. कुरु, ५. हरि वर्ष, ६. किं पुरुष, ७. भारतवर्ष, ८. केतुमाल, ९. भद्राश्‍व वर्ष ।
काया माँही लोक सब, दादू दिये दिखाय । 
मनसा वाचा कर्मना, गुरु बिन लख्या न जाइ ॥ 
स्वर्ग - मर्त्य - पाताल, इन तीनों ही के अन्तर्गत १४ भुवन, २१ ब्रह्माण्ड हैं । काया मैं स्वर्ग लोक दशवें द्वार स्थल है । मृत लोक, उदर - स्थान, एवं - पाताल लोक, पगथली है । किन्तु हम मन - वचन - कर्म से कहते हैं कि सतगुरु कृपा बिना यह बाह्य ब्रह्मांड शरीर में नहीं देखा जा सकता

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