मंगलवार, 16 अगस्त 2016

= परिचय का अंग =(४/४-६)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= परिचय का अँग ४ =**

दादू निरँतर पिव पाइया, तीन लोक भरपूर ।
सब सेजों सांई बसे, लोक बतावें दूर ॥ ४ ॥
जो तीन लोकों में परिपूर्ण है, सँपूर्ण प्राणियों की हृदय - शय्या पर स्थित है, उसी परब्रह्म का वैकुण्ठादि लोकों में निवास बताकर, अज्ञानी प्राणी उसे दूर बताते हैं । व्यापक ब्रह्म व्याप्य प्राणियों से दूर कैसे हो सकता है ? वह तो निरन्तर सबको मिला हुआ ही है । अज्ञान के कारण नहीं भासता ।

दादू निरँतर पिव पाइया, जहं आनन्द बारह मास ।
हँस सौं परम हँस खेले, तहं सेवक स्वामी पास ॥ ५ ॥
जिस सहजावस्था में बारह - मास ही आनन्द रहता है, उसी में जाकर हमने प्रियतम ब्रह्म को अखँड रूप से प्राप्त किया है । इस पराभक्ति की अवस्था में ब्रह्म रूप हँस से ज्ञानी सँत रूप परम हँस, अखँडानन्द का अनुभव रूप खेल खेलते हैं, फिर भी यहां सेवक स्वामी से दूर नहीं रहता, अभेद रूप समीपता में ही रहता है । खेलनादि भेद प्रतीति मात्र ही भासते हैं ।

दादू रंग भर खेलूँ पीव सौं, तहं बाजे वेणु रसाल ।
अकल पाट पर बैठा स्वामी, प्रेम पिलावे लाल ॥ ६ ॥
६ - ९ में अपनी पराभक्ति के आनन्द का विशेष परिचय दे रहे हैं - ब्रह्मरन्ध्र में प्राण जाने पर नाद की निएपत्ति नामक चतुर्थावस्था में जहां रसीली वँशी - ध्वनि सुनाई पड़ती है, वहां ही हम चित्त वृत्ति - पिचकारी में परम प्रेम - रँग भरकर परब्रह्म से ब्रह्मानन्द खेल खेलते हैं । हमारे स्वामी परब्रह्म राग द्वेषादि कलाओं से रहित हमारे हृदय - धाम के अष्टदल - कमल - सिंहासन पर विराजते हैं और वे हमारे परमप्रिय प्रभु हमें प्रेम - रस पिलाते हैं अर्थात् हमसे प्रेम करते हैं ।
(क्रमशः)

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