मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

= सुख समाधि(ग्रन्थ ४/२९-३०) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*(ग्रन्थ ४) सुख समाधि*
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*पूरण ब्रह्म अखंड अनावृत,*
*यह निश्चय याही बिसबास । *
*घी सौ घौंटि रह्यौ घट भीतरि,*
*सुख सौं सोवै सुन्दरदास ॥२९॥* 
अब हमें श्रवण-मनन-निदिध्यासन से यह विश्वास हो चुका है कि ब्रह्म ही पूर्ण है, व्यापक है, अनावृत(निर्विकार) है । अतः उसी में तन्मय रहने में ही हम आनन्द मानते हैं ॥२९॥ 
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*देखै सुनै सपर्शय बोलै,*
*सूंघै अनासक्ति अनयास ।*
*घी सौ घौंटि रह्यौ घट भीतरि,*
*सुख सौं सोवै सुन्दरदास ॥३०॥*
अब मेरी(ज्ञानी की) इन्द्रियाँ अपना व्यापार--देखना, सुनना, स्पर्श करना, बोलना, सूँघना--अनासक्तिपूर्वक करती रहती हैं, उनमे लिप्त नहीं होती । क्योंकि अब मैं सुखमय समाधि में लीन रहता हूँ ॥३०॥
(क्रमशः)

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