गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

= निष्कामी पतिव्रता का अंग =(८/२२-४)



卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =**
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दादू नारायण नैनाँ बसे, मनहीं मोहन राइ ।
हिरदा माँहीं हरि बसे, आतम एक समाइ ॥ २२ ॥
नर शरीर ही जिनकी प्राप्ति का साधन है, ऐसे नारायण भगवान् हमारे नेत्रों में बसते हैं । मोहन करने वाले मायादि के भी मोहक और शासक मोहनराय भगवान् हमारे मन में हैं । हृदय में हरि बसते हैं और आत्मा में भी एक ब्रह्म ही समाये हुये हैं तथा अन्य इन्द्रियादि सभी प्रभु - परायण होकर भगवत् पतिव्रत में ही रत हैं ।
दादू तन मन मेरा पीव सौं, एक सेज सुख सोइ । 
गहिला लोग न जाणही, पच - पच आपा खोइ ॥ २३ ॥ 
तन सँत - सेवा द्वारा और मन चिन्तन द्वारा परमात्मा से ही लगाकर हम हृदयस्थ अद्वैत भावना रूप शय्या पर ब्रह्म के साक्षात्कार जन्य सुख में निमग्न रहते हुये समाधिस्थ हैं, किन्तु अज्ञानी लोग इस रहस्यमय तत्व को न जानने के कारण, साँसारिक विषयों के लिए परिश्रम कर - करके आत्म - स्वरूप के आनन्द को खो रहे हैं ।
दादू एक हमारे उर बसे, दूजा मेल्या दूर । 
दूजा देखत जाइगा, एक रह्या भरपूर ॥ २४ ॥ 
हमारे हृदय में एकमात्र निरंजन राम का ही पतिव्रत बसता है; माया और माया के कार्य रूप द्वैत को तो हमने ज्ञान द्वारा हृदय से दूर कर दिया है । कारण, माया और मायिक प्रपँच रूप द्वैत तो देखते - देखते ही नष्ट हो जाएगा । एक परब्रह्म ही सृष्टि के आदि काल से अब तक दूध में घृत के समान विश्व में भरा हुआ है और आगे भी भरा ही रहेगा । अत: वह अविनाशी ही उपास्य है ।
.(क्रमशः)

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