सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

= विन्दु (२)९३ =

॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** 
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विन्दु ९३ =**
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पश्चात् राजा नारायणसिंह यह जिज्ञासा लेकर कि - मुझे क्या कर्तव्य है ? दादूजी के सामने बैठे ही रहे । तब दादूजी महाराज उनके मन की भावना जान गये और उनकेअधिकार के अनुसार उनको उपदेश देने के लिये यह पद बोले - 
"सद्गुरु चरणा मस्तक धरणा, 
राम नाम कहि दुस्तर तिरणा ॥ टेक ॥ 
अठ सिधि नव निधि सहजै पावे, 
अमर अभय पद सुख में आवे ॥ १ ॥ 
भक्ति मुक्ति बैकुण्ठों जाय, 
अमर लोक फल लेवे आय ॥ २ ॥ 
परम पदारथ मंगलाचार, 
साहिब के सब भरे भंडार ॥ ३ ॥ 
नूर तेज है ज्योति अपार, 
दादू राता सिरजनहार ॥ ४ ॥ 
गुरु और हरि नाम की महिमा बताते हुये कर्तव्य कर्म का उपदेश दे रहे हैं - सद्गुरु के चरणों में शिर रखकर राम नाम कहने से प्राणी दुस्तर संसार से पार हो जाता है । अनायास ही अष्ट सिद्धि, नव निधि और अमर अभय पद को प्राप्त कर लेता है । सब प्रकार के दुःखों से मुक्त होकर सुख स्थित होता है, भक्ति - मुक्ति प्राप्त होती है । इच्छा होने पर वैकुण्ठ तथा अमर लोक में जाकर वहां कर्म का फल सुख भी प्राप्त करता है । परब्रह्म रूप परम पदार्थ प्राप्त होता है । अन्य भी सब प्रकार से मंगल का ही व्यवहार होता है । कारण, प्रभु के तो सभी वस्तुओं के भंडार भरे हैं, फिर उनके भक्त को क्या नहीं मिलेगा ? अर्थात् सब कुछ ही मिल जाता है । जो तेज स्वरूप हैं, जिनकी स्वरूप ज्योति अपार है, उन्हीं सृष्टिकर्ता प्रभु स्वरूप सद्गुरु के चरणों में हम मस्तक रखकर तथा नाम चिन्तन करके ही अनुरक्त हुये हैं । 
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उक्त पद के उपदेश द्वारा दादूजी महाराज ने नारायणा नरेश नारायणसिंह को सब कुछ थोड़े ही शब्दों में बता दिया था और राजा ने भी अधिकारी होने के कारण थोड़े में ही अपना कर्तव्य तथा और सब कुछ समझ लिया था ।
(क्रमशः)

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