卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =**
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यहु व्रत सुन्दरि ले रहे, तो सदा सुहागिनि होइ ।
दादू भावै पीव को, ता सम और न कोइ ॥३१॥
यह उक्त प्रकार पतिव्रत यदि साधक - सुन्दरी धारण किये रहे तो सदा के लिए सुहागिनी हो जाती है । कारण वह परब्रह्म - पति को प्रिय लगती है, इससे ब्रह्म के साथ अभेद होकर रहती है । उसके समान भाग्यशालिनी अन्य कोई भी नहीं कही जा सकती ।
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**मन हरि भावन**
साहिब जी का भावता, कोइ करे कलि माँहि ।
मनसा वाचा कर्मना, दादू घट घट नाँहि ॥३२॥
३२ में कहते हैं - हरि को प्रिय लगे ऐसा कार्य मन से कोई विरला व्यक्ति ही करता है - इस कलियुग में भगवान् को प्रिय लगने वाला निष्काम भाव से पतिव्रत रूप कार्य मन, वचन और कर्म से कोई विरला भक्त ही कर पाता है । यह प्रत्येक शरीर से नहीं होता । कारण, श्रेष्ठ भक्त को छोड़कर अन्य सभी शरीरधारी इन्द्रियों को प्रिय लगने वाले कार्यों में ही संलग्न रहते हैं ।
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**पतिव्रता निष्काम**
आज्ञा माँहीं बैसे ऊठे, आज्ञा आये जाइ ।
आज्ञा माँहीँ लेवे देवे, आज्ञा पहरे खाइ ॥३३॥
३३ - ३५ में पतिव्रता की निष्कामता दिखा रहे हैं - जीवात्मा - पतिव्रता अपने स्वामी परब्रह्म की आज्ञानुसार ही बैठती - उठती है, आती - जाती है, लेती - देती है, पहनती - खाती है ।
(क्रमशः)

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