卐 सत्यराम सा 卐
कछू न कीजे कामना, सगुण निर्गुण होहि ।
पलट जीव तैं ब्रह्म गति, सब मिलि मानैं मोहि ॥
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साभार ~ Anand Nareliya
पंतजलि कहते हैं, **चित्तवृत्तिनिरोध।**
चित्त की वृत्तियों का निरोध करने से योग हो जाता है, यही उनकी समाधि की परिभाषा है—वृत्तियों का निरोध, वृत्ति का मतलब हुआ... तरंग, लहर....
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अष्टावक्र कहते हैं, वृत्तियों का कैसे निरोध करोगे? आंधी चल रही है, अंधड़ उठा है, तूफान, बवंडर है... तुम छोटी—छोटी ऊर्मियों को शांत कैसे करोगे? एक—एक लहर को शांत करते रहोगे, अनंत काल तक भी न हो पाएगा, आंधी चल ही रही है, वह नई लहरें पैदा कर रही है, अष्टावक्र कहते हैं, लहरों को शांत करने की फिकर छोड़ो, आंधी से ही छुटकारा पा लो। और आंधी तुम ही पैदा कर रहे हो, यह मजा है, आकांक्षा की आंधी, वासना की आंधी, कामना की आंधी, कामना की आंधी चल रही है तो लहरें उठती हैं, अब तुम लहरों को शांत करने में लगे हो, मूल को शांत कर दो, तरंगें अपने से शांत हो जाएंगी। तुम वासना छोड़ दो, यह तो तुमसे औरों ने भी कहा है, वासना छोड़ दो.....
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लेकिन अष्टावक्र का वक्तव्य परिपूर्ण है, और कहते हैं वासना छोड़ दो, वे कहते हैं संसार की वासना छोड़ दो, प्रभु की वासना करो। तो आंधी का नाम बदल देते हैं, सांसारिक आंधी न रही, असांसारिक आंधी हो गई, धन की आंधी न रही, ध्यान की आंधी हो गई; पर आंधी चलेगी... लेबल बदला, नाम बदला, रंग बदला, लेकिन मूल वही का वही रहा, पहले तुम मांगते थे इस संसार में पद मिल जाए अब परमपद मागते हो, मगर मांग जारी है। और तुम भिखमंगे के भिखमंगे हो।
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अष्टावक्र कहते हैं छोड़ ही दो। संसार और मोक्ष, ऐसा भेद मत करो, आकांक्षा आकांक्षा है; किसकी है, इससे भेद नहीं पड़ता, धन मांगते, पद मांगते, ध्यान मांगते, कुछ फर्क नहीं पड़ता मांगते हो, भिखमंगे हो। मांगो मत। मांग ही छोड़ दो। और मांग छोड़ते ही एक अपूर्व घटना घटती है; क्योंकि जो तुम्हारी ऊर्जा मांग में नियोजित थी, हजारों मांगों में उलझी थी वह मुक्त हो जाती है, वही ऊर्जा मुक्त होकर नाचती है। वही नृत्य महोत्सव है, वही नृत्य है परमानंद, सच्चिदानंद...
osho
अष्टावक्र: महागीता (भाग–5) प्रवचन–63

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