रविवार, 19 फ़रवरी 2017

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卐 सत्यराम सा 卐
दादू जैसे श्रवणा दोइ हैं, ऐसे होंहि अपार ।
राम कथा रस पीजिये, दादू बारंबार ॥ 
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साभार ~ Rajnish Gupta

(((((((( स्तंभतीर्थ का महत्व ))))))))
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हमारे देश का नाम भारत वर्ष जिन भरत के नाम पर पड़ा उनके बेटे थे राजर्षि शतश्रृंग. शतश्रृंग के आठ बेटे और एक बेटी हुई. बेटी को कुमारी कहकर बुलाया गया. उसका शरीर तो बहुत सुंदर था पर उसका मुख बकरी के मुख जैसा था.
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राजा ने कुछ त्रिकालदर्शी ऋषियों से इस संदर्भ में पूछा. ऋषियों ने बताया कि वह पिछले जन्म में बकरी थी. बकरी के शरीर में वह स्तम्भ तीर्थ नामक स्थान पर एक झाड़ी में उलझ कर मर गई थी.
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जब वह मरी तो मुख को छोड़कर शेष देह खम्भार्क की खाड़ी में गिर गया था. उस पवित्र तीर्थ के प्रताप से वह दिव्य देह वाली कुमारी बन गई लेकिन गिरते समय उसका मुख वहीं झाडियों-लताओं में उलझा रह गया. इसीलिए उसका मुंह बकरी का ही रह गया.
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राजर्षि ने ऐसा प्रबंध करा दिया कि कभी भी राजकुमारी के सामने कोई दर्पण न आए. कुमारी शीशे या जल में अपनी छाया न देख सके. पर जब किशोर उम्र में गई तो एक दिन उसने दर्पण में अपना मुख देख ही लिया.
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अपना बकरी जैसा मुख देखते ही उसे अपने पिछले जन्म की याद हो आई. उसने अपने माता-पिता को अपने पिछले जन्म के बारे में सब कुछ बता दिया और कहा कि मुझे अपना चेहरा ठीक करने के लिये खम्भार्क-क्षेत्र जाना होगा.
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माता पिता की अनुमति लेकर कुमारी वहां पहुंची और उसने अपने पिछले जन्म के सिर को लताओं में से ढूंढ़ निकाला और उसका खम्भार्क तीर्थ में दाह संस्कार किया. हड्डियों और राख को खम्भार्क तीर्थ के पवित्र जल में डाल दिया.
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यह सब करने के तुरंत बाद उसका मुख मानव सरीखा हो गया और चंद्रमा के समान चमक उठा. इस चमत्कार का तीनों लोकों में प्रचार हो गया. सारी बात सुनकर देवता, गंधर्व और राजा लोग विवाह के लिए उसके पिता के पास आने लगे.
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जो लोग राजकुमारी का उपहास करते थे वे अब उससे विवाह को लालायित रहने लगे. राजकुमारी को आभास था कि ये सब उसके सौंदर्य पर मुग्ध है, हृदय से कोई लगाव नहीं. उसने विवाह से साफ मना कर दिया और कठिन तप में लग गई.
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उसने एक साल तक की कठोर तपस्या के बाद भगवान शंकर प्रकट हुए और वर देने को कहा. कुमारी ने कहा- यदि आप प्रसन्न हैं तो इस तीर्थ में आपका वास हो. भगवान शंकर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली.
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वहां के शिव ‘बर्करेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हुए. यह बात सब जगह फैल गई तो नागों का राजा स्वस्तिक पाताल लोक से कुमारी को देखने स्तम्भ तीर्थ आया.
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स्वास्तिक भगवान् शंकर के स्थान के करीब जहां धरती फोड़ कर बाहर निकला था, वहां उसके आने से बने कूप को उसके नाम पर स्वस्तिक कुआं रख दिया गया, इसमें हमेशा गंगा जल भरा रहता है.
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भगवान शंकर से वर पाने में सफल हो कुमारी अपने माता-पिता के पास सिंहलद्वीप लौट आई. राजा शतश्रृंग अपनी कन्या की बातों को सुनकर चकित रह गए. शतश्रृंग ने देश को नौ भागों में बांट दिया.
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आठ बेटों को एक एक और एक भाग कुमारी को दिया. उसको जो हिस्सा दिया उसको कुमारिका खंड कहा गया जिसमें पारियात्र पहाड़ भी था. यह पर्वत आर्यावर्त की दक्षिणी सीमा पर था जिसे आजकल हिंदुकुश कहते हैं.
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गुप्तक्षेत्र में कुमारेश्वर का पूजन करती हुई कठिन तपस्या करने लगी. शिव जी तप से प्रसन्न हो वहां प्रकट हुए. उनकी आज्ञा से कुमारी ने तब महाकाल को अपने पति के रूप में चुना और उनके साथ रुद्रलोक चली गई. मंदिर कुमारेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गया.
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कुमारी रुद्रलोक पहुंची तो पार्वती जी ने उसे गले लगाया और चित्रलेखा नाम से अपनी सखी बना लिया. 
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कहते हैं कुमारी द्वारा बसाये कुमारिका कंड स्थित स्तंभतीर्थ या खंभात की खाड़ी में दाह संस्कार करना और भस्मावशेष को इसके जल में डालना प्रयाग से भी अधिक उत्तम है.
( स्रोत: स्कंद पुराण )
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
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