卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= लै का अँग ७ =**
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दादू पारब्रह्म पैंडा दिया, सहज सुरति लै सार ।
मन का मारग माँहि घर, संगी सिरजनहार ॥१३॥
यह ब्रह्माकार वृत्ति रूप मार्ग गुरुजनों द्वारा परब्रह्म ने ही बताया है और सृष्टिकर्ता ईश्वर का वास्तविक स्वरूप ब्रह्म व्यापक होने से सदा हमारे संग ही रहता है । हमारे शरीर के भीतर अन्त:करण ही उसकी विशेष रूप से अनुभूति का स्थान है । इसलिये यह मार्ग बाहर के पैरों से चलने योग्य न होकर केवल मन से चलने का ही है । अत: वृत्ति को निरन्तर सहज स्वरूप ब्रह्म में ही लगावे रखो । यह ब्रह्माकार वृत्ति - साधन ही सर्व साधनों का सार साधन है ।
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राम कहै जिस ज्ञान सौं, अमृत रस पीवे ।
दादू दूजा छाड़ि सब, लै लागी जीवे ॥१४॥
१४ - १६ में ब्रह्माकार वृत्ति की विशेषता दिखा रहे हैं - जिस ज्ञान के द्वारा साधक निरंजन राम के स्वरूप को समझ कर निरन्तर राम - राम कहते हुये भी ज्ञानामृत - रस का पान करते रहे, वही उत्तम ज्ञान है । अत: अन्य सब वाक्य - विस्तार को त्याग कर साधक निरन्तर अपनी वृत्ति निरंजन राम में लगाकर जीवन धारण करे जीवन पर्यन्त भजन करे ।
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राम रसायन पीवताँ, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ ।
दादू आतम राम सौं, सदा रहे ल्यौ लाइ ॥१५॥
यदि जीवात्मा निरंजन राम में निरन्तर अपनी वृत्ति लगाकर राम - भजन - रसायन पान करता है तो पीते २ ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति द्वारा जीव ब्रह्म रूप ही हो जाता है ।
(क्रमशः)

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