मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

= निष्कामी पतिव्रता का अंग =(८/१६-८)


卐 सत्यराम सा 卐
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= निष्कामी पतिव्रता का अँग ८ =**
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दादू एक सगा सँसार में, जिन हम सिरजे सोइ । 
मनसा, वाचा, कर्मना, और न दूजा कोइ ॥ १६ ॥ 
हम मन, वचन और कर्म से एक होकर कहते हैं - जिसने हमें रचा है वह एकमात्र परमात्मा ही हमारा निजी सँबँधी है और दूसरा कोई भी नहीं है, सर्व स्वार्थी हैं । 
(कुलादि के विषय में अकबर बादशाह ने पूछा, उसी का उत्तर १५ - १६ से दिया था ।) 
**स्मरण नाम निस्सँशय** 
सांई सन्मुख जीवताँ, मरताँ सन्मुख होइ । 
दादू जीवन मरण का, सोच करै जनि कोइ ॥ १७ ॥ 
१७ में सँशय रहित नाम स्मरण निष्ठा दिखा रहे हैं - अपने जीवन काल में भगवत् की आज्ञानुसार रहकर भगवद् भजन करना चाहिए और मृत्यु के समय भी सावधानता से अपनी वृत्ति भगवद्, ध्यान द्वारा भगवत् के सम्मुख ही होवे, ऐसा यत्न करना चाहिए । उक्त प्रकार व्यवहार करने पर, "मैं अधिक जीवित रहूंगा तो अर्थाभाव के कारण दुखी रहूंगा और शीघ्र मर गया तो पीछे वालों का पालन कैसे होगा ?" ऐसी चिन्ता किसी को भी न करनी चाहिए । निस्सँशय होकर भजन करना चाहिए । दृढ़ता रखने से सब ठीक ही होता है ।
**पतिव्रत** 
साहिब मिला तो सब मिले, भेंटैं भेंटा होइ । 
साहिब रहा तो सब रहे, नहीं तो नाँहीं कोइ ॥ १८ ॥ 
१८ - २७ में पतिव्रत दिखा रहे हैं - यदि प्रभु प्राप्त हो जाते हैं तो सभी ऐश्वर्य प्राप्त हो जाते हैं । जीवात्मा की परमात्मा से भेंट होती है तब सभी से भेंट हो जाती है; उसे सब अपने आत्म स्वरूप ही भासते हैं । भगवान् से भक्त का भेद रहा तो सँपूर्ण प्राणियों से भी भेद रहता ही है । इस प्रकार अभेद रूप पतिव्रत नहीं होता; तब अद्वैत भाव भी प्राप्त नहीं होता ।
(क्रमशः)

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