卐 सत्यराम सा 卐
*सब देखणहारा जगत का, अंतर पूरै साखि ।*
*दादू साबित सो सही, दूजा और न राखि ॥*
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साभार ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi
### नैतिकता #####
महाभारत का युद्ध चल रहा था । कौरवों और पाण्डवों के बीच भयंकर मार-काट चल रही थी । कर्ण और अर्जुन के बीच भयंकर बाण वर्षा हो रही थी । अवसर पाकर एक भयंकर सर्प कर्ण के तूणीर में धुस गया । कर्ण ने बाण निकाला तो स्पर्श कुछ अनोखा लगा । उसने सर्प को देखा और आश्चर्य से पुछा - "तुम यहां क्यों आ गए ?"
सर्प ने कहा - "अर्जुन ने एक बार खाण्डव वन में आग लगा दी थी । उसमें मेरी माता जल गई । तभी से मेरे मन में प्रतिशोध जल रहा है और इस ताक में था कि अवसर मिले तो मैं अर्जुन के प्राण हर लूं । आप मुझे तीर के स्थान पर चला दें । मैं जाते ही अर्जुन डस लूंगा । आपका शत्रु मर जायेगा और मेरा प्रतिशोध शान्त हो जायेगा ।"
कर्ण ने कहा - "नहीं, अनैतिक उपाय से सफलता पाने का मेरा तनिक भी विचार नहीं है । सर्पदेव ! आप वापस लौट जायं ।"
प्रस्तुति - प्रमोद मिश्र
#### संस्कार सुवास ***संकलन - योगी रमणनाथ
सम्भर झील जयपुर ।

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