रविवार, 19 नवंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/७०-७२)

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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*जग जन विपरीत*
दादू सब जग दीसे एकला, सेवक स्वामी दोइ । 
जगत दूहागी राम बिन, साधु सुहागी सोइ ॥७०॥ 
७१ - ७३ में सँसारी जन और भक्त जन की विपरीतता दिखा रहे हैं - सब जगत् के प्राणी भगवान् की भक्ति न करने के कारण भगवत् साक्षात्कार बिना अकेले ही दिखाई देते हैं । सेवा करने के कारण सेवक और स्वामी दोनों साथ रहते हैं । राम - भजन बिना जगत् के प्राणी दुर्भाग्य - युक्त हैं और जन्म - मरण के प्रवाह में बहे जाते हैं । जो भक्ति करने वाला सन्त है, वह भगवान् की समीपता के कारण सौभाग्य - सँपन्न है ।
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दादू साधू जन सुखिया भये, दुनिया को बहु द्वन्द्व ।
दूनी दुखी हम देखताँ, साधुन सदा अनन्द ॥७१॥
सन्त - जन निर्द्वन्द्व होने से सुखी हुये हैं, साँसारिक प्राणियों के काम - क्रोधादिक बहुत द्वन्द्व लगे हुये हैं । अत: हम देखते हैं कि सँसारी प्राणी दु:खी हैं और निर्द्वन्द्व होने से सन्तों को आनन्द रहता है ।
दादू देखत हम सुखी, सांई के संग लाग ।
यों सो सुखिया होयगा, जाके पूरे भाग ॥७२॥
देखो, सबके देखते हुये हम भक्ति - ज्ञानादि द्वारा परमात्मा के संग लगकर आनँद में हैं तथा जिसका भाग्य महान् होगा, वह भी भक्ति ज्ञानादि द्वारा परमात्मा के संग लग कर हमारे समान आनन्द प्राप्त करेगा ।
(क्रमशः)

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