🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= पीर- मुरीद अष्टक(ग्रन्थ २४) =*
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*तब कहै पीर मुरीद सौं तूं,*
*हिरस रा बुगुजार ।*
*यह बन्दगी तब होइगी,*
*इस नफ्स कौं गहि मार ॥*
*भी दुई दिल तैं दूर करिये,*
*और कछू न चाह ।*
*यह राह तेरी तुझी भीतर,*
*चल्या तूं हीं जाइ ॥३॥*
गुरुदेव ने मुझसे कहा कि यदि तूं अपनी सांसारिक वासना(= हिर्स, तृष्णा) का पुर्णतः त्याग(बुगजार) कर दे तो तू इस भक्तिमार्ग पर सरलता से चल सकेगा । अहंकार(= नपस) का परित्याग ही भगवत्प्राप्ति का एकमात्र उपाय है ।
तूं यदि अपने दिल से सुख-दुःख, जय-पराजय, लाभ-अलाभ आदि सांसारिक द्वन्द्वों को निकाल दे, इनके प्रति जरा भी ममता या इच्छा न रखे तो तूं अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । लक्ष्य की प्राप्ति का यही रास्ता है । वह रास्ता बाहर कहीं नहीं मिलेगा, इस पर तू स्वयं चाहेगा तो चल पायगा, दूसरा कोई इसमें तेरी क्या मदद करेगा या कर पायगा ! यह तो तुझे स्वयं ही करना पड़ेगा ॥३॥
(क्रमशः)

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