卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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साधु शब्द सुख बरषि हैं, शीतल होइ शरीर ।
दादू अंतर आतमा, पीवे हरि जल नीर ॥९७॥
सँत अपने शब्दों द्वारा आनन्द की वर्षा करते हैं जिससे ईर्ष्यादि रूप जलन मिट कर अन्त:करण समता रूप शीतलता को प्राप्त होता है और जैसे तालाब का जल नदी के जल को पान करता है, वैसे ही अन्तर - साक्षी आत्मा रूप नीर ब्रह्म - साक्षात्कार रूप जल को पान करता है=ब्रह्म से अभेद हो जाता है ।
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दादू दत१ दरबार का, को साधू बांटे आइ ।
तहां रामरस पाइये, जहं साधू तहं जाइ ॥९८॥
कोई विरले उत्तम सँत ही आकर सत्संग - सभा में भगवद् प्राप्ति का हेतु उपदेश रूप दान१ वितरण करते हैं । अत: जहां सन्त हो, वहां ही साधक जाय, क्योंकि वहां ही राम - भक्ति - रस का उपदेश प्राप्त होता है ।
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*चौप चर्चा*
दादू श्रोता स्नेही राम का, सो मुझ मिलवहु आणि१ ।
तिस आगे हरिगुण कथूँ, सुनत न करई काणि२॥९९॥
भगवत् - कथा कहने की उत्कंठा दिखा रहे हैं - हे परमेश्वर ! हमें वह श्रोता आकर१ मिले जो आपका स्नेही हो और सत्संग में आकर श्रवण करते समय लोक - लज्जादि२ न करके प्रेम पूर्वक मनन द्वारा धारण करे । हम उसके आगे हरिगुण कथन करेंगे ।
(क्रमशः)

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