शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

= ज्ञान-झूलनाष्टक(ग्रन्थ २६-४) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*= ज्ञान-झूलनाष्टक(ग्रन्थ २६) =*
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*कोई योग कहै कोई जाग कहै,*
*कोई त्याग बैराग बतावता है ।*
*कोई नांच रटै कोई ध्यान ठटै३,*
*कोई खोजत ही थकि जावता है ॥*
*कोई ओर हि ओर उपाय करै,*
*कोई ज्ञान गिरा४ करि करि गावता है ।*
*वह सुन्दर५ सुन्दर सुन्दर है,*
*कोई सुन्दर होइ सु पावता है ॥४॥*
(३. ठटै=ठठै--ठाठ रचे । आडम्बर करै ।) (४. गिरा=वाणी । केवल नाम रटना वा कथाकीर्तन से ईश्वर प्राप्ति का मत । जाग=यज्ञ । यज्ञ ईश्वर प्राप्ति का कारण वा ईश्वर का नाम “यज्ञो वै विष्णुः” ।) (५. ‘सुन्दर एक तो कवि का नाम । दूसरा तीसरा मिलकर सब सुन्दर पदार्थों में अति सुन्दर, परमोत्कृष्ट रूपवाला । सुन्दर होना=अन्तःकरण निर्मल पवित्र करना ।)
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कोई(योगी) उसकी योग से प्राप्ति मानते हैं, कोई(मीमांसक) उसकी यज्ञ से मानते हैं । कोई(ज्ञानी) सर्व कर्म परित्याग, वैराग्य(भव की उपेक्षा) से उसकी प्राप्यी मानते हैं ।
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कोई(भक्त) उसका नाम(राम) रटना ही उसके पास पहुँचने का रास्ता बताता है कोई उसका ध्यान का आडम्बर करना ही उसकी प्राप्ति का उपाय बताते हैं ।
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कोई स्थित-प्रज्ञ न होने के कारण कभी और कभी कोई मार्ग पकड़ता हुआ थक जाता है, उसे खोज नहीं पाता । कोई उसे पाने के लिये दूसरे-दूसरे उपाय करता है, कोई(ज्ञानी) अपनी ज्ञानमय वाणी से उसकी स्तुति करता है ।
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महात्मा सुन्दरदास कहते हैं - वह तत्व परमोत्कृष्ट रूप वाला है । जो शुद्ध(निर्मल अन्तःकरण) वाला है, मन व् वचन से पवित्र है वही उसे पा सकता है ॥४॥
(क्रमशः)

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