卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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दादू राम मिलन के कारणैं, जे तूँ खरा उदास ।
साधू संगति शोध ले, राम उन्हों के पास ॥११२॥
हे साधक ! यदि तू राम के साक्षात्कारार्थ सच्चा आतुर है तो सन्तों की संगति द्वारा राम की खोज कर । कारण, राम विशेष रूप से सन्तों के पास ही रहते हैं ।
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*पुरुष प्रकाशी(सँत महिमा)*
ब्रह्मा, शँकर, शेष, मुनि, नारद, ध्रुव, शुकदेव ।
सकल साधु दादू सही, जे लागें हरि सेव ॥११३॥
११३ - ११४ में ज्ञान - प्रकाश युक्त सँतों की महिमा कह रहे हैं - ब्रह्मा, शँकर, शेष, वशिष्ठादि मुनि, नारदादि देवर्षि, ध्रुवादि राजर्षि, शुकदेवादि विरक्त, जो भी भगवद् भक्ति में लगे हुये ज्ञानी सन्त हैं, वे सब ही सच्चे सँत हैं और उनकी महिमा सँसार में प्रकट है ।
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साधु कमल हरि बासना, सत भ्रमर संग आइ ।
दादू परिमल ले चले, मिले राम को जाइ ॥११४॥
सँसार - सरोवर में ज्ञानी सन्त कमल रूप हैं । ब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान ही उनमें सुगँध है । साधक सन्त - भ्रमर उनके सत्संग में आकर, ब्रह्म का मूलतत्व - ज्ञान रूप परागण लेकर, देहाध्यासादि रहित आगे चल पड़ते हैं और निर्विकल्प अवस्था में जाकर अभेद रूप से राम में मिल जाते हैं ।
(क्रमशः)

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