गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

= साधु का अँग =(१५/११५-७)


#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*साधु का अँग १५*
*साधु सज्जन*
दादू सहजैं मेला होइगा, हम तुम हरि के दास ।
अंतरगति तो मिल रहे, पुन: प्रकट परकास ॥११५॥
सभी सन्त एकात्मभाव से मिले ही रहते हैं, यह कहते हैं - हम और तुम हरि के भक्त हैं, अत: अन्त में तो हरि के स्वरूप में अपना एकता रूप मिलन सहज ही होने वाला है और अब भी बुद्धि की विचार रूप गति एक होने से वो साक्षी रूप से भीतर से तो मिल ही रहे हैं, फिर कभी प्रकट रूप से शरीरों द्वारा मिल कर भी अपने हृदय के भावों को प्रकाशित करेंगे ।
प्रसंग कथा - सन्त प्रवर दादूजी महाराज आंधी ग्राम में आये हुये हैं, यह जान कर दौसाकी टहलड़ी पहाड़ी पर साधना कर रहे उनके शिष्य जगजीवन जी ने गुरुजी के दर्शन की इच्छा की, तब उनके सँतोषार्थ दादूजी ने यह साखी लिख भेजी थी ।
*साधु महिमा*
दादू मम शिर मोटे भाग, साधों का दर्शन किया ।
कहा करे जम काल, राम रसायन भर पिया ॥११६॥
सन्त - महिमा कह रहे हैं - आज बड़े भाग्य से ही हमने सन्तों का दर्शन किया है । जिनने सँतों के सत्संग में राम - भक्ति - रसायन रुचि भर पान किया है, उनका नरक के अधिदेव यम और काल क्या कर सकते हैं ? यही साखी नारायणा ग्राम में प्राचीन सँतों के दर्शन करके कही थी । प्रसंग कथा दृ - सु - सि - त - ११ - २६३ में देखो ।
*साधु सामर्थ्य*
दादू एता अविगत आप तैं, साधों का अधिकार । 
चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि संवार ॥११७॥
११७ - १२१ में सन्तों की सामर्थ्य बता रहे हैं - मन - वाणी के अविषय परमात्मा ने अपने आप प्रसन्नता से ही सँसार के सँतों को इतना अधिकार दे रक्खा है कि वे चौरासी लाख योनियों के जीवों के बिगड़े हुये तन - मन को पुन: सुधार देते हैं । 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें