#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*मध्य का अँग १६*
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मति मोटी उस साधु की, द्वै पख रहित समान ।
दादू आपा मेट कर, सेवा करे सुजान ॥४॥
जो बुद्धिमान् सन्त द्वैत भाव से उत्पन्न अपने - पराये सम्प्रदाय के पक्ष - विपक्ष से रहित अहँकार को हटाकर सबकी सेवा करते हुये भगवद् भक्ति करता है, उस मध्य मार्ग में स्थित सन्त का ज्ञान महान् है ।
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कछु न कहावे आपको, काहू संग न जाइ ।
दादू निर्पख ह्वै रहे, साहिब सौं ल्यौ लाइ ॥५॥
जो अपने को योगी, ज्ञानी आदि कहलाने का प्रयत्न नहीं करता और किसी के संग लगकर राग - द्वेषादि द्वन्द्वों में नहीं पड़ता, पक्ष - विपक्ष से रहित होकर सदा परब्रह्म में अपनी वृत्ति लगावे रहता है, वही मध्य - मार्ग में स्थित सन्त है ।
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सुख दुख मन माने नहीं, आपा पर सम भाइ ।
सो मन मन कर सेविये, सब पूरण ल्यौ लाइ ॥६॥
जो सुख - दु:ख होने पर भी मन में नहीं मानता, अपने पराये सबको सम भाव से देखता है और सँपूर्ण विश्व में व्यापक ब्रह्म में ही अपने मन की वृत्ति निरँतर लगावे रहता है, वही मध्यमार्ग में स्थित मन वाला सन्त है । उसकी सेवा मन से करनी चाहिए ।
(क्रमशः)

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