शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

= सुन्दर पदावली(१२. राग बिलावल(कायाबेली ग्रंथ ८) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
(८) 
*सबकै आहि अन्न मैं प्रांन ।* 
*बात बनाइ कहौ कोऊ केती, नाचि कूदि कैं तूटन तांन ॥टेक॥* 
सभी प्राणियों के प्राण भोजन(= खाद्य पदार्थ) में स्थित हैं । भले ही कोई तथाकथित पण्डित जनसभाओं में नाचता कूदता हुआ इस विषय में कुछ भी कहता रहे ॥टेक॥ 
*पंडित गुनी सूर कवि दाता, जो कोउ और कहावत जांन ।* 
*जठरा अग्नि प्रगट होइ जबही, तबही बिसर जाइ सब ज्ञांन ॥१॥* 
हमने पण्डित, गुणी जन, विद्वान्, दानी या अन्य जो कोई भी समझदार(ज्ञानी) हैं - ये सभी उदर(पेट) की अग्नि प्रज्वलित होने पर(भूख लगने पर) अपना तथाकथित ज्ञान भूल जाते देखे हैं ॥१॥ 
*मीर मलिक उमराव छत्रपति, औरउ कहियत राजा रांन ।* 
*जद्यपि सकल संपदा घर मैं, तद्यपि मुष देषियत कुमिलांन ॥२॥* 
भले ही वे किसी राजसभा के सदस्य हों, राजा हों, राणा हों । कहने का तात्पर्य है कि भले ही कोई कितना ही विशाल सम्पति का स्वामी हो; उसका मुख भी, भूख लगने पर, मुरझाया ही दीखता है ॥२॥ 
*आसन मार रहे बन मांहीं, तेऊ उठत होत मध्यांन ।* 
*सुन्दर ऐसी क्षुधा पापिनी रहै, नंहीं काहू कौ मांन ॥३॥* 
तथा जो वन में एक(स्थायी) आसन लगा कर समाधिस्थ रहते हैं वे भी, भूख लगने पर मध्याह्व होने पर; भोजन की ओर दौड़ते हैं । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह क्षुधा(भूख) ऐसी पापिन है कि यह किसी का सम्मान नहीं करती । इसके आगे सभी को झुकना पड़ता है ॥३॥
(क्रमशः)

= १९२ =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*माया रूपी राम को, सब कोई ध्यावै ।*
*अलख आदि अनादि है, सो दादू गावै ॥* 
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साभार ~ Murlikant Mandawewala

*भगवान पर सवाल*
एक दस साल का बच्चा पहली बार अपने पिता के साथ घूमने निकला । रास्ते में एक मंदिर मिला तो पिता जी ने कहा बेटा हाथ जोड़कर प्रणाम करो । बेटे ने पूछा किसको प्रणाम करूँ पापा ? पापा : बेटा भगवान को प्रणाम करो । बेटा : लेकिन पापा भगवान है कहाँ ? पापा : बेटा वो मंदिर में हैं ? 
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बेटा : पापा, मंदिर तो बंद है उसमे मोटा सा ताला लगा हुआ है । भगवान को किसने मंदिर में बंद कर दिया ? पापा : बेटा ये भगवान को मंदिर में बंद नहीं किया बल्कि मंदिर की सुरक्षा के लिए ताला लगाया हुआ है । बेटा : मंदिर में तो खुद भगवान रहते हैं, उनको किससे सुरक्षा की जरुरत है ? पापा : बेटा मंदिर में बहुत कीमती कीमती मूर्तियाँ रखी होती हैं और वो मूर्तियाँ कीमती गहने पहने होती है । चोर और तस्कर हमेशा उनको चोरी करने की फ़िराक में रहते हैं इसीलिए उनसे बचाने के लिए मंदिर को बंद किया जाता है । 
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बेटा : लेकिन पापा वो तो खुद भगवान है । सब कुछ करने वाला है फिर कोई साधारण चोर उनको कैसे चुरा सकता है ? जब भगवान खुद को ही चोरी होने से नहीं बचा सकता है तो फिर मुझको या किसी और को क्या दे सकता है ? ऐसे भगवान को प्रणाम करने से क्या फायदा ? पापा : बेटा ये बात तुम्हारे समझ में नहीं आएँगी । वैसे भी कोई जानवर जैसे कुत्ते बिल्ली आदि आकर गंदगी ना करें इसीलिए भी ताला लगाया जाता है । 
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बेटा : पापा जब सभी जीव उसी की संतान हैं, तो उनको पता होना चाहिए कि यहाँ पर गंदगी नही करनी चाहिए । अगर वो ऐसा करते हैं तो ये झूठ है कि सभी प्राणी उसी के बनाये हुए है । अगर फिर भी उनको पता नही है तो भगवान को खुद उनको बताना चाहिए कि ऐसा नहीं करो या फिर उनको रोकना चाहिए लेकिन भगवान ऐसा भी नही कर सकता तो सीधा सा मतलब है भगवान ही नहीं है । पापा : बेटा अभी ये बातें तुम्हारी समझ में नहीं आएँगी और भगवान पर सवाल नही करते चुपचाप जैसे सुनते आये हो उसको ही सच मानो । बेटा : तो पापा हमको अपने दिमाग का इस्तेमाल करना बंद कर देना चाहिए और जानवरों जैसी जिन्दगी व्यतीत करनी चाहिए ।
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अब पापा के गुस्से की हदें पार हो गयी । उसने बेटे के जोर का तमाचा मारते हुए कहा चुप कर भगवान पर सवाल उठाता है मेरा बाप बनने की कोशिश करता है नालायक । 
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क्या यही कारण है…….. प्रश्न न पूछने का…….. क्या आप के पास है …उस बच्चे को जवाब देने लायक कोई उत्तर…..? नहीं.....

= १९१ =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*जिसकी सुरति जहाँ रहै, तिसका तहँ विश्राम ।*
*भावै माया मोह में, भावै आतम राम ॥*
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साभार ~ *।ॐसनातन धर्म एक ही धर्म*(wtsap)

एक अति प्राचीन कथा है। घने वन में एक तपस्वी साधनारत था--आंख बंद किए सतत प्रभु-स्मरण में लीन। स्वर्ग को पाने की उसकी आकांक्षा थी; न भूख की चिंता थी, न प्यास की चिंता थी। एक दीन-दरिद्र युवती लकड़ियां बीनने आती थी वन में। वही दया खाकर कुछ फल तोड़ लाती, पत्तों के दोने बना कर सरोवर से जल भर लाती, और तपस्वी के पास छोड़ जाती। उसी सहारे तपस्वी जीता था। फिर धीरे-धीरे उसकी तपश्चर्या और भी सघन हो गई--फल बिना खाए ही पड़े रहने लगे; जल दोनों में पड़ा-पड़ा ही गंदा हो जाता--न उसे याद रही भूख की और न प्यास की। लकड़ियां बीनने वाली युवती बड़ी दुखी और उदास होती, पर कोई उपाय भी न था।
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इंद्रासन डोला; इंद्र चिंतित हुआ; तपस्या भंग करनी जरूरी है; सीमा के बाहर जा रहा है यह व्यक्ति--क्या स्वर्ग के सिंहासन पर कब्जा करने का इरादा है? लेकिन कठिनाई ज्यादा न थी, क्योंकि इंद्र मनुष्य के मन को जानता है। स्वर्ग से जैसे एक श्वास उतरी--सूखी, दीन-दरिद्र, काली-कलूटी वह युवती अचानक अप्रतिम सौंदर्य से भर गई; जैसे एक किरण उतरी स्वर्ग से और उसकी साधारण सी देह स्वर्णमंडित हो गई। पानी भर रही थी सरोवर से तपस्वी के लिए, अपने ही प्रतिबिंब को देखा, भरोसा न कर पाई--साधारण स्त्री न रही, अप्सरा हो गई; खुद के ही बिंब को देख कर मोहित हो गई ! तपस्वी की सेवा उसने करनी जारी रखी।
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फिर एक दिन तपस्वी ने आंख खोलीं। इस वनस्थली से जाने का समय आ गया--तपश्चर्या को और गहन करना है, पर्वत-शिखरों की यात्रा पर जाना है। उसने युवती से कहा कि मैं अब जाऊंगा, यहां मेरा कार्य पूरा हुआ। अब और भी कठिन मार्ग चुनना है, स्वर्ग को जीत कर ही रहना है। युवती रोने लगी। उसकी आंख से आंसू गिरने लगे। उसने कहा, मैंने कौन सा दुष्कर्म किया कि मुझे अपनी सेवा से वंचित करते हो? और तो कुछ मैंने कभी मांगा नहीं !
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तपस्वी ने सोचा, उस युवती के चेहरे की तरफ देखा। ऐसा सौंदर्य कभी देखा नहीं था। स्वप्न में भी ऐसा सौंदर्य कभी देखा नहीं था। युवती पहचानी भी लगती थी और अपरिचित भी लगती थी। रूप-रेखा तो वही थी, लेकिन कुछ महिमा उतर आई थी। अंग-प्रत्यंग वही थे, लेकिन कोई स्वर्ण-आभा से घिर गए थे। जैसे कोई गीत की कड़ी, भूली-बिसरी, फिर किसी संगीतज्ञ ने बांसुरी में भर कर बजाई हो। तपस्वी बैठ गया। उसने पुनः आंख बंद कर लीं। वह रुक गया।
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उस रात युवती सो न सकी--विजय का उल्लास भी था और साधु को पतित करने का पश्चात्ताप भी। आनंदित थी कि जीत गई और दुखी थी कि किसी को भ्रष्ट किया, किसी के मार्ग में बाधा बन गई, और कोई जो ऊर्ध्वगमन के लिए निकला था,उसकी यात्रा को भ्रष्ट कर दिया। रात भर सो न सकी--रोई भी, हंसी भी। सुबह निर्णय लिया, आकर तपस्वी के चरणों में झुकी और कहा, मुझे जाना पड़ेगा, मेरा परिवार दूसरे गांव जा रहा है। तपस्वी ने आशीर्वाद दिया कि जाओ, जहां भी रहो, खुश रहो, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। युवती चली गई। 
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वर्ष बीते, तपस्या पूरी हुई। इंद्र उतरा, तपस्वी के चरणों में झुका और कहा, स्वर्ग के द्वार स्वागत के लिए खुले हैं। तपस्वी ने आंखें खोलीं और कहा, स्वर्ग की अब मुझे कोई जरूरत नहीं ! इंद्र तो भरोसा भी न कर पाया कि कोई मनुष्य और कहेगा कि स्वर्ग की मुझे अब कोई जरूरत नहीं। इंद्र ने सोचा, तब क्या मोक्ष की आकांक्षा इस तपस्वी को पैदा हुई है। पूछा, क्या मोक्ष चाहिए? तपस्वी ने कहा, नहीं, मोक्ष का भी मैं क्या करूंगा।
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तब तो इंद्र चरणों में सिर रखने को ही था कि यह तो आत्यंतिक बात हो गई, तपश्चर्या का अंतिम चरण हो गया, जहां मोक्ष की आकांक्षा भी खो जाती है। पर झुकने के पहले उसने पूछा, मोक्ष के पार तो कुछ भी नहीं है, फिर तुम क्या चाहते हो? उस तपस्वी ने कहा, कुछ भी नहीं, वह लकड़ियां बीनने वाली युवती कहां है, वही चाहिए।
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हंसना मत; आदमी की ऐसी कमजोरी है। सोचना, हंसना मत; क्योंकि पृथ्वी का ऐसा प्रबल आकर्षण है। कहानी को कहानी समझ कर टाल मत देना, मनुष्य के मन की पूरी व्यथा है। और ऐसा मत सोचना कि ऐसा विकल्प उस तपस्वी के सामने ही था कि युवती थी, स्वर्ग था, दोनों के बीच चुनना था।
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तुम्हारे सामने भी विकल्प वही है; सभी के सामने विकल्प वही है--या तो उन सुखों को चुनो जो क्षणभंगुर हैं, या उसे चुनो जो शाश्वत है; या तो शाश्वत को गंवा दो क्षणभंगुर के लिए, या क्षणभंगुर को समर्पित कर दो शाश्वत के लिए।
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और अधिकतम लोग वही चुनेंगे, जो तपस्वी ने चुना। ऐसा मत सोचना कि तुमने कुछ अन्यथा किया है। चाहे इंद्र तुम्हारे सामने खड़ा हुआ हो या न खड़ा हुआ हो; चाहे किसी ने स्पष्ट स्वर्ग और पृथ्वी के विकल्प सामने रखे हों, न रखे हों--विकल्प वहां हैं। और जो एक को चुनता है, वह अनिवार्यतः दूसरे को गंवा देता है। 
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जिसकी आंखें पृथ्वी के नशे से भर जाती हैं, वह स्वर्ग के जागरण से वंचित रह जाता है। और जिसके हाथ पृथ्वी की धूल से भर जाते हैं, स्वर्ग का स्वर्ण बरसे भी तो कहां बरसे, हाथों में जगह नहीं होती! हाथ खाली चाहिए तो ही स्वर्ग उतर सकता है; आत्मा खाली चाहिए तो ही परमात्मा विराजमान हो सकता है।
ओशो - भजगोविंदम मुढ़मते(आदि शंक्राचार्य) प्रवचन-5
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