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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
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(८)
*सबकै आहि अन्न मैं प्रांन ।*
*बात बनाइ कहौ कोऊ केती, नाचि कूदि कैं तूटन तांन ॥टेक॥*
सभी प्राणियों के प्राण भोजन(= खाद्य पदार्थ) में स्थित हैं । भले ही कोई तथाकथित पण्डित जनसभाओं में नाचता कूदता हुआ इस विषय में कुछ भी कहता रहे ॥टेक॥
*पंडित गुनी सूर कवि दाता, जो कोउ और कहावत जांन ।*
*जठरा अग्नि प्रगट होइ जबही, तबही बिसर जाइ सब ज्ञांन ॥१॥*
हमने पण्डित, गुणी जन, विद्वान्, दानी या अन्य जो कोई भी समझदार(ज्ञानी) हैं - ये सभी उदर(पेट) की अग्नि प्रज्वलित होने पर(भूख लगने पर) अपना तथाकथित ज्ञान भूल जाते देखे हैं ॥१॥
*मीर मलिक उमराव छत्रपति, औरउ कहियत राजा रांन ।*
*जद्यपि सकल संपदा घर मैं, तद्यपि मुष देषियत कुमिलांन ॥२॥*
भले ही वे किसी राजसभा के सदस्य हों, राजा हों, राणा हों । कहने का तात्पर्य है कि भले ही कोई कितना ही विशाल सम्पति का स्वामी हो; उसका मुख भी, भूख लगने पर, मुरझाया ही दीखता है ॥२॥
*आसन मार रहे बन मांहीं, तेऊ उठत होत मध्यांन ।*
*सुन्दर ऐसी क्षुधा पापिनी रहै, नंहीं काहू कौ मांन ॥३॥*
तथा जो वन में एक(स्थायी) आसन लगा कर समाधिस्थ रहते हैं वे भी, भूख लगने पर मध्याह्व होने पर; भोजन की ओर दौड़ते हैं । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह क्षुधा(भूख) ऐसी पापिन है कि यह किसी का सम्मान नहीं करती । इसके आगे सभी को झुकना पड़ता है ॥३॥
(क्रमशः)

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