शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

= सुन्दर पदावली(१६.राग सोरठ - ६/१) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १६. राग सोरठ =*
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(६/१) 
*ऐसौ योग युगति जब होई ।* 
*तब काल न ब्यापै कोई ॥(टेक)॥* 
*धरि आसन पद्म रहंता, सब काया कर्म दहंता ।* 
*तजि निद्रा षंडि अहारा, करि आपुहि आप बिचारा ॥१॥* 
*गहि बिंद गगन दिशि जाता, भषि पवन पियाला माता ।* 
*सुनि अनहद सींगी बाजै, धुनि मांहि निरंजन गाजै ॥२॥* 
ऐसा योग किसी अपूर्व युक्ति के प्राप्त होने पर ही सिद्ध हो सकता है । इसकी सिद्धि होने पर साधक को मृत्यु का कोई भय नहीं रहता ॥टेक॥ 
योगी को पद्मासन में स्थित होकर, साधना द्वारा कायिक कर्मों को विनष्ट कर, निद्रा का परित्याग कर, सम आहार ग्रहण करते हुए, आत्मचिन्तन करना चाहिये ॥१॥ 
योगी आकाश में जाते हुए ब्रह्मबिन्दु को निगृहीत करे, पवन का भक्षण करे, तब उसके कानों को अनहद नाद सुनायी देने लगता है । उसी ध्वनि के अन्तर्गत निरन्जन की स्थिति है ॥२॥
(क्रमशः)

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