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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*माटी मांहि ठौर कर, माटी माटी मांहि ।*
*दादू सम कर राखिये, द्वै पख दुविधा नांहि ॥*
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साभार ~ Dhaval Parmar
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन के घर एक मेहमान आए। मेहमान जो आए, खूब पान खाते थे। और बाहर पान की पीक न फेंककर जहां बैठे थे, वहीं जमीन पर पीक थूक रहे थे। यह देख नसरुद्दीन भीतर गया और नौकर द्वारा एक चांदी का नक्काशीदार पीकदान जहां मेहमान बैठे थे वहां ला कर रखवा दिया।
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मेहमान ने पीकदान दूसरी तरफ सरकाकर फिर जमीन पर थूक दिया। यह देखकर नौकर ने फिर से पीकदान उठाकर पहली वाली जगह पर रख दिया। पर इस बार भी मेहमान ने वह पीकदान हटा कर जमीन पर थूक दिया ! नौकर ने एक बार फिर पीकदान पहले वाली जगह पर रख दिया। लेकिन इस बार भी मेहमान साहब ने उसे फिर से सरकाकर जमीन पर पीक फेंक दी।
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नौकर ने फिर पीकदान पुरानी जगह पर रख दिया। ऐसा बार-बार होता देखकर मेहमान नौकर पर बहुत गुस्सा होकर बोले : अब अगर इस पीकदान को यहां से नहीं हटाओगे और बार-बार इसे यहीं रखोगे तो हम इसी में थूक देंगे ! चांदी का पीकदान ! मेहमान ने सोचा होगा कि चांदी के पीकदान में और थूकना ! वे हटाते रहे और थूकते रहे।
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तुम अगर अपनी जिंदगी को थोड़ा तलाशोगे तो ऐसा ही पाओगे ! वही-वही करते जाते हो। और ऐसा ही नहीं है कि उससे चोट नहीं खाते, पीड़ित नहीं होते। कौन नहीं होगा पीड़ित ! लोभ किसे नहीं दीन कर जाता, दुःखी कर जाता, हीन कर जाता?
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क्रोध किसे नहीं जला जाता, दग्ध कर जाता? किसके हृदय में घाव नहीं छोड़ जाता? अहंकार ने कब किसको शीतलता दी है? रोज वही पीड़ा है, और रोज तुम निर्णय भी करते हो कि अब बहुत हो चुका है। मगर कल फिर होगी सुबह, फिर तुम वही करोगे जो तुम सदा करते रहे हो।
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इस वर्तुल को तोड़ो ! इस वर्तुल से छलांग लगाओ। इस वर्तुल से बाहर आ जाने का नाम धर्म है। इस यांत्रिकता के बाहर आ जाने का नाम जीवन है।
सम्मान दो अपने को ! तुम यंत्र नहीं हो। यंत्र का जीवन झूठा जीवन होता है। ऊपर-ऊपर से लगता है गति है, लेकिन भीतर कोई होश तो होता नहीं। तो जैसे मशीन चलती है, ऐसे ही तुम्हारा जीवन चलता है। तुमने मशीन से भिन्न अपने जीवन को पाया है?
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ज्योति से ज्योति जले💞ओशो

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