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*होइ अनन्य भजै भगवंत ही,*
*और कछू उर में नहीं राखै ।*
*देवि रु देव जहाँ लग हैं,*
*डरके तिनसूं कहि दीन न भाखै ।*
*योग हु यज्ञ व्रतादि क्रिया,*
*तिनकूं तो नहीं स्वपने अभिलाखै ।*
*सुन्दर अमृत पान कियो तब,*
*तो कहु कौन हलाहल चाखै ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*अज्ञान कसौटी का अंग ७९*
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वायु बंधहि बे गुनहिं, उलटि करै विकटंग१ ।
गुनहगार छूटे फिरै, यूं लागे यम डंग२ ॥२९॥
बिना दोष ही वायु को बांधते हैं तब वह उलटकर अंग१ को विकट करता है अर्थात रोगी बना देता है । दोषी मन इन्द्रिय खुले विषयों में भ्रमण करते हैं इस प्रकार करने से यम की चोट२ ही लगती है ।
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रज्जब अविगत नाथ को, मिले न वायू बंध ।
आँटा पड़ै तो मीच ह्वै, कै कुष्टी ह्वै अंध ॥३०॥
केवल वायु को बाँधने से जगन्नाथ परमात्मा से नहीं मिल सकता है और वायु का आँटा पड़ जाय तो अर्थात विधि में गड़बड़ हो जाय तो मृत्यु हो जाती है, कोढी हो जाता है, अंधा हो जाता है ।
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पौन१ साध प्राणी उड़हिं, तो पंखी पर२ पेख ।
वायू बंध विहंग३ का, व्योम४ न मिल्या अलेख५ ॥३१॥
वायु१ साधने से प्राणी उड़ने लगता है, तो देखो पक्षी पंखों२ से ही उड़ जाता है, वायु बांधने से पक्षी३ को आकाश४ नहीं मिलता और मनुष्य को परमात्मा५ नहीं मिलता, पक्षी पंखों से आकाश में जाता है, नर भजन-विचार से प्रभु को प्राप्त करता है ।
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करी पवन की साधना, नट भांडहुं भरपूर ।
रज्जब रीते राम बिन, वस्तु रही सो दूर ॥३२॥
नट और भांडों ने भी वायु रोकने की साधना पूर्ण रूप से की है किन्तु वे राम-राम से चिन्तन बिना खाली ही रहे, उनसे वह ब्रह्म रूप वस्तु दूर ही रही ।
(क्रमशः)

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