रविवार, 23 जून 2019

= *उपदेश चेतावनी का अंग ८२(२५/२८)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷

🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*जे जन तेरे रंग रंगे, दूजा रंग नांही ।*
*जन्म सुफल कर लीजिये, दादू उन मांहीं ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*उपदेश चेतावनी का अंग ८२*
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विरचै१ वसुधा२ बंदि३ तैं, मुक्ति मध्य परवेश । 
यहु दीक्षा दुस्तर तिरण, यहु उत्तम उपदेश ॥२५॥ 
पृथ्वी२ के विषयाशक्ति रूप बंदीगृह के कैदीपने३ से विरक्त१ होकर मुक्ति-महल में प्रवेश करें, यही दुस्तर संसार से तिरणे के लिये गुरु-दीक्षा है और यही संत तथा शास्त्रों का उत्तम उपदेश है, इसे धारण करना चाहिये । 
तन धन ल्याया जन्म तैं, मरत गया सो खोय । 
सुकृत माल न मध्य किया, जो आगे को होय ॥२६॥ 
जन्मते समय शरीर रूप धन लाया था, सो मरते समय खो दिया, अपनी आयु के बीच के समय में पुण्य कर्म रूप माल संग्रह नहीं किया, जो आगे के लिये सुखद होता, ऐसे प्राणी का नर जन्म सफल नहीं माना जाता । 
प्राण१ पाणि२ पूंजी सु पिंड, मूल सु मिनखा देय । 
रज्जब सौदा राम सौं, इहिं अवसर करि लेह ॥२७॥ 
हे प्राणी१ ! शरीर रूप धन तेरे हाथ२ लगा है, मनुष्य देह मूल धन है, इस मनुष्य देह के समय में ही राम से अपने को उनके समर्पण करना और उनका दर्शन लेना रूप व्यापार कर ले, अन्य शरीरों में यह संभव नहीं है । 
आदम१ देह अलभ्य२ धन, पाई पूरण भाग । 
तो रज्जब भगवंत भज, हरि सुमिरण लौ लाग ॥२८॥
पूर्ण भाग से ही दुर्लभ२ मनुष्य१ देह रुप धन प्राप्त हुआ है, तब हरि स्मरण में ही अपनी वृत्ति लगाकर भगवान का भजन कर । 
(क्रमशः)

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