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*जनि बाझैं काहू कर्म सौं, दूजै आरंभ जाइ ।*
*दादू एकै मूल गहि, दूजा देइ बहाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*सेवा निष्फल का अंग ८०*
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तुपक१ तीर दश दिशि चलहिं, पड़हि सु पृथ्वी जाय ।
त्यों रज्जब ध्यावहिं धरे३, पूजा अधर२ समाय ॥९॥
बन्दूक१ से गोली और धनुष से बाण दशों दिशाओं में चलाये जाते हैं किन्तु पड़ते पृथ्वी पर हैं, वैसे ही मायिक३ देवी देवादि की उपासना करने पर भी वह पूजा ब्रह्म में ही समाती है, अत: ब्रह्म२ की उपासना करना ही उचित है ।
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रज्जब भाव बिना भगवंत में, चौरासी लख जंत ।
सर्वस१ ले सब से जुदा, अलग सलग२ सु अनन्त ॥१०॥
चौरासी लाख योनियों के जीव भगवान में ही रहते हैं, उनके प्रेम बिना उनका सर्वस्व लेते हैं, और सबसे१ अलग रहते हैं, इस प्रकार वे अनन्त प्रभु सबसे अलग और सब के साथ२ हैं ।
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रज्जब कोई ना करै, धूम व्योम१ के भाव ।
अग्नि तेज आकाश को, सहज आपही जाय ॥११॥
जैसे धुआँ आकाश१ को जाता है, वैसे ही प्रेमपूर्वक भगवान को अपनी सेवा समर्पण न करे तो भी जैसे अग्नि की ज्वाला आकाश को ही जाती है, वैसे ही वह तो भगवान में ही जायेगी किन्तु भगवन में प्रेम न होने से वह निष्फल हो जायगी, कारण फलदाता तो भगवान ही हैं, इस प्रकार जीव की सेवा निष्फल हो जाती है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित सेवा निष्फल का अंग ८० समाप्तः ॥सा. २४३८॥
(क्रमशः)

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