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*दादू आप चिणावै देहुरा, तिसका करहि जतन ।*
*प्रत्यक्ष परमेश्वर किया, सो भानै जीव रतन ॥*
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साभार ~ @Punjabhai Bharadiya
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मैंने एक छोटी सी कहानी सुनी है।
एक चर्च में एक रात एक आदमी ने द्वार खटखटाया, उसके पादरी ने द्वार खोला। काश, उसे पता चल जाता कि बाहर खड़ा हुआ एक काला आदमी है, तो वह द्वार ही न खोलता। उसने सोचा होगा कि कोई सफेद आदमी है। वह गोरे लोगों का चर्च था। उसने द्वार खोला, देखा, एक नीग्रो द्वार पर खड़ा है।
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उसने उस काले आदमी को कहा, कैसे यहां आना हुआ?
उसने कहा, मैं भी भगवान के मंदिर में आना चाहता हूं।
पुराने दिन होते तो वह पादरी कहता, शूद्र हट जा यहां से ! यहां तेरे लिए कोई जगह नहीं है ! और यहां तू आया, तो सीढ़ियां साफ कर, तेरी छाया पड़ी तो मंदिर अपवित्र हो गया ! लेकिन दिन बदल गए हैं।
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लेकिन आदमी का दिल थोड़े ही बदला है। भाषा बदल गई हैं, हिसाब बदल गए हैं, लेकिन भीतर वही आदमी खड़ा है। उस पादरी ने कहा, मेरे मित्र, उसने नहीं कहा शूद्र, उसने कहा, मेरे मित्र, जरूर भगवान के मंदिर में तुम आना, लेकिन जब तक मन शांत और पवित्र न हुआ हो, तब तक आने से फायदा क्या? तो जाओ, पहले मन को पवित्र और शांत करो, फिर आना। तभी भगवान से मिलना हो सकता है।
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उस पादरी ने सोचा, न होगा मन शांत और न होगा पवित्र और न इसे दुबारा दरवाजा खोलने कि जरूरत पड़ेगी। वह नीग्रो वापस चला गया। महीने पर महीने बीत गए। कोई तीन-चार महीने बाद बाजार में उस पादरी को वह नीग्रो दिखाई पड़ा। देख कर उसे हैरानी हुई !
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उस आदमी की आंखों में कोई चमक और आ गई थी, वह नीग्रो कुछ और ही तरह का व्यक्तित्व ले लिया मालूम पड़ता था, उसके आस-पास एक बड़ी शांति की, एक बड़ी प्रार्थनापूर्ण हवा थी, उसके आस-पास एक नई सुगंध पैदा हो गई थी जैसे और एक नया आलोक। उस पादरी ने उसे रोका और पूछा, तुम दुबारा नहीं आए?
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उस नीग्रो ने कहा, मैं तो आता था, लेकिन बड़ी गड़बड़ हो गई। तुमने कहा था, मन शांत करो और पवित्र, मैं मन को शांत करने में, पवित्र करने में लग गया। मेरे दिन और रात प्रार्थनाओं से भर गए और मेरे मन में एक ही, एक ही प्रार्थना और प्यास काम करने लगी। महीने बीत गए।
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एक रात मैं सोया, जब सोया तो मन मेरा एकदम शांत और मौन था। रात मैंने एक सपना देखा, सपने में मैंने देखा, परमात्मा मेरे सामने खड़े हैं और मुझसे पूछ रहे हैं कि तू क्यों इतनी प्रार्थनाएं कर रहा है? क्या चाहता है? तो मैंने कहा, मैं जो हमारे गांव का जो चर्च है, जो मंदिर है, उसमें प्रवेश चाहता हूं।
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तो परमात्मा हंसे और उन्होंने कहा, तू बिलकुल पागल है ! उसमें तेरा प्रवेश न हो सकेगा। मैं खुद दस सालों से कोशिश कर रहा हूं, वह पादरी मुझे घुसने नहीं देता। मैं खुद हार गया हूं कोशिश करके, वह पादरी मुझे अंदर नहीं आने दे रहा। मैं ही हार गया, तेरा पहुंचना बहुत कठिन है। तू वह खोज छोड़ दे। ज्यादा आसान है मेरे पास आ जाना, चर्च में पहुंचना बहुत कठिन है। और उस चर्च में मैं तो हूं भी नहीं, तू पहुंच भी जाएगा तो उसे खाली पाएगा।
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असलियत यह है, उस चर्च के पादरी पर न हंसें, आज तक किसी मंदिर के पुजारी ने भगवान को किसी मंदिर में नहीं घुसने दिया। न किसी मस्जिद में और न किसी चर्च में। आदमी ने धर्म के नाम पर जितने धंधे बनाए हैं उनमें कहीं भी भगवान को घुसने का कोई मौका नहीं। क्योंकि जहां परमात्मा होगा, वहां फिर व्यवसाय नहीं हो सकता। और जहां व्यवसाय चलाना है, वहां परमात्मा के लिए जगह नहीं हो सकती।
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और फिर आदमी के बनाए हुए मंदिर इतने छोटे हैं और परमात्मा है इतना विराट, प्रवेश हो भी कैसे सकता है? आदमी खुद इतना छोटा है, तो उसके मंदिर बड़े नहीं हो सकते। उसके बनाए हुए मंदिर उससे भी ज्यादा छोटे होंगे। क्योंकि बनाने वाला जो भी बनाएगा, खुद से बड़ी चीज कभी नहीं बना सकता, उसकी चीज बनाई हुई होगी वह उससे छोटी होगी। और आदमी खुद इतना छोटा है कि वह परमात्मा के मंदिर बनाए यह बात ही पागलपन की और नासमझी की है।
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ओशो, अंतर की खोज(प्रवचन-3)

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