मंगलवार, 4 जून 2019

= *अज्ञान कसौटी का अंग ७९(४९/५२)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷 
*दादू कस कस लीजिये, यहु ताते परिमान ।* 
*खोटा गाँठ न बाँधिये, साहिब के दीवान ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*अज्ञान कसौटी का अंग ७९* 
रज्जब शून्य१ रूप जीव में जड्या, पवन रूप गुरुदेव । 
यहु गुप्त गांठ दे खोलिबा, भूत२ न जाने भेव३ ॥४९॥
जैसे आकाश१ में वायु है, वैसे ही जीव में प्राण वायु है, यह जड़, प्राण और चेतन जीव की चिज्जड़ ग्रन्धि पड़ी है, इस गुप्त गाँठ को खोलने के लिये गुरुदेव ज्ञानोपदेश दे तो यह खुल सकती है, अन्यथा प्राणी२ इसके खोलने के रहस्य३ को नहीं जानता । 
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रज्जब मारुत रोकिबा, अब प्रपंच उपाय । 
बाबा१ खोलै वायु वपु, तब सु न बंधी जाय ॥५०॥
अब हमारे लिये वायु रोकने का उपाय प्रपंच रूप हो गया है अर्थात उसमें हमारी रुचि नहीं है, जब परमात्मा१ वायु को खोलते हैं, तब वह शरीर में सम्यक् नहीं बांधा जा सकता है । 
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नाद न छोड़ै नाभि को, विन्दु१ सकल वपु माँहिं । 
कौन चढावै कहाँ को, रज्जब समझै नाँहिं ॥५१॥
ओंकार ध्वनि रूप नाद नाभि को नहीं त्यागता और वीर्य१ सब शरीर में रहता है, उन दोनों को कौन चढायेगा ? और कहाँ चढायेगा ? इस रहस्य को नहीं समझते केवल बातें ही करते रहते हैं । 
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नाद विन्दु नख शिख भर्या, ज्यों काष्ट में आग । 
कौन चढावै कहाँ को, शोध्या शीश रु पाग ॥५२॥
हमने शिर से लेकर पेरों तक खोज लिया है, धमनी ध्वनि रूप नाद और वीर्य नख से शिखा तक सब शरीर में काष्ट में अग्नि के समान व्यापक है फिर उसको कौन चढायेगा ? और कहाँ चढायेगा ? 
(क्रमशः)

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