शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*ज्यों जाणों त्यों राखियो, तुम सिर डाली राइ ।*
*दूजा को देखूं नहीं, दादू अनत न जाइ ॥*
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साभार ~ Rameshwar Sah

विवेकानंद के पिता मरे। शाही दिल आदमी थे। बड़ा कर्ज छोड़कर गए। घर में तो कुछ भी न था, खाने को भी कुछ छोड़ नहीं गए थे। तो रामकृष्ण ने विवेकानंद को कहा कि तू परेशान मत हो। तू मां से क्यों नहीं कहता ? मंदिर में जा और कह दे, वे सब पूरा कर देंगी।
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वे द्वार पर बैठ गए, विवेकानंद को भीतर भेज दिया। घंटे भर बाद विवेकानंद लौटे, आंखों से आंसू बह रहे थे, बड़े अहोभाव में। रामकृष्ण ने कहा, 'कहा ?, विवेकानंद ने कहा, अरे ! मैं तो यह भूल ही गया ।
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फिर दूसरे दिन भेजा। फिर वही। फिर तिसरे दिन भेजा, विवेकानंद ने कहा, यह मुझसे न हो सकेगा। मैं जाता हूं और जब खड़ा होता हूं प्रतिमा के समक्ष तो मेरे सुख - दुख का कोई सवाल ही नहीं रह जाता। मैं ही नहीं रह जाता तो सुख - दुख का सवाल कहां ! पेट होगा भूखा, लेकिन मेरा शरीर से हीं संबंध टूट जाता है। और उस महिमा के सामने क्या छोटी-छोटी बातें करनी है। चार दिन की जिंदगी है, भूखे भी गुजार देंगे। यह शिकायत भी कोई परमात्मा से करने की है। आप मुझे, परमहंस देव, अब दोबारा न भेजें। क्षमा करें, मैं न जाऊंगा।
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रामकृष्ण हंसने लगे। उन्होंने कहा, यह तेरी परिक्षा थी। मैं देखना चाहता था कि मांगता है या नहीं। अगर मांगता तो तू मेरे लिए व्यर्थ होता, क्योंकि प्रार्थना फिर हो ही नहीं सकती, जहां मांग है। तूने नहीं मांगा। बार-बार मैंने तुझे भेजा और तू हारकर लौट आया - यह खबर है इस बात की कि तेरे भीतर प्रार्थना का खुलेगा आकाश। तेरे भीतर प्रार्थना का बीज टूटेगा, प्रार्थना का वृक्ष बनेगा। तेरे नीचे हजारों छायां में बैठेंगे।
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मांग रहे हैं लोग - मंदिरों में, मस्जिदों में, गुरुद्वारों में, शिवालयों में - प्रार्थना नहीं हो रही है। जिसे प्रार्थना करनी हो तो वह कहीं भी कर लेगा। जिसे प्रार्थना करने का ढंग आ गया, सलीका आ गया, वह जहां है वहीं कर लेगा।
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यह सारा संसार हीं उसका है, उसका हीं मंदिर है, उसकी ही मस्जिद है। तुम जहां बैठे हो, वह जगह भी उसी की है। उससे खाली तो कुछ भी नहीं है यह स्मरण आ जाए तो जब आंख बंद की, तभी मंदिर खुल गया, जब हाथ जोड़े तभी मंदिर खुल गया, जहां सिर झुकाया वहीं उसकी प्रतिमा स्थापित हो गई....... 
*ओशो* भक्ति सूत्र
संकलन - स्वामी जीवन संगीत ।

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