#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग गौड़ी १, गायन समय दिन ३ से ६*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
१६ - करुणा । वीर विक्रम ताल
क्यों कर मिलै मोकौं राम गुसाँई,
यहु विषिया१ मेरे वश नाहीं ॥टेक॥
यहु मन मेरा दह२ दिशि धावै,
नियरे राम न देखन पावे॥१॥
जिव्हा स्वाद सबै रस लागे,
इन्द्री भोग विषय को जागे ॥२॥
श्रवणहुं साच कदे नहिं भावै,
नैन रूप तहं देख लुभावै ॥३॥
काम क्रोध कदे नहिं छीजै,
लालच लाग विषय रस पीजै ॥४॥
दादू देख मिलै क्यों साँई,
विषय विकार बसैं मन माँहीं ॥५॥
.
वियोग जन्य दु:ख प्रकट कर रहे हैं - ये विषय१ लोलुप मन इन्द्रियादि, मेरे वश में नहीं हो रहे हैं, तब मुझे स्वामी राम कैसे मिलेंगे ?
.
यह मेरा मन विषयों के लिए तो दशों२ दिशाओं में दौड़ता है, किन्तु अति समीप हृदयस्थ राम को नहीं देख पाता ।
.
इन्द्रियाँ विषय - भोगों के लिए जाग्रत रहती हैं । जिव्हा सँपूर्ण रसों के आस्वादन में लगती है,
.
श्रवणों को सत्य ब्रह्म - विचार कभी भी प्रिय नहीं लगता, नेत्र सुन्दर रूप को देखकर वहां ही आसक्त हो जाते हैं ।
.
काम क्रोधादि कभी भी कम नहीं होते, इस प्रकार लोभ में पड़कर विषय रस का ही पान कर रहा हूं ।
.
अत: मैं देखता हूं, जब मन में विषय - विकार बसते हैं, तब स्वामी कैसे मिलेंगे ?
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें