रविवार, 29 सितंबर 2019

= सुन्दर पदावली(२७. राग धनाश्री - ११) =

#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= २७. राग धनाश्री - ११=*
.
(संस्कृतमय) 
*क गतान्निजपरविभ्रमभेदं ।* 
*यन्नानात्वं दृश्यते पूर्वमधुना रूपं ममेदं ॥(टेक)* 
*यथा शरीरे अंग पृथग्निह ज्ञानकर्मकरणानि ।* 
*तथा अहं व्यापक परिपूर्ण: स चराचर सर्वाणि ॥१॥*
*यथा सागरे भंगबुद्बुदा उत्पद्यन्तेऽन्ता: ।*
*तथा विश्वमयि अहं विश्वमयि सुंदर मध्याद्यांता: ॥२॥* 
अपना पराया या स्वयं तथा अन्य – ऐसा भ्रमयुक्त भेद(द्वैतभाव) कहाँ गया ? जो इस ब्रह्मज्ञान से पूर्व नानात्व भेद दिखायी देता था, वह नष्ट हो गया है । (अब वह न रहकर) अब मेरा निज(आत्म) रूप हो गया है । जैसे शरीर से उसके अंग पृथक नहीं होते, या ज्ञान कर्म एवं पृथक नहीं होते, वैसे ही अब मुझ(व्यापक) में मेरा निज आत्मरूप व्याप्त है ॥१॥ 
अथवा, जैसे समुद्र में बुदबुदे उत्पन्न एवं विनष्ट होते रहते हैं; वैसे ही मैं विश्व में, तथा विश्व का आदि अन्त एवं मध्य मुझ में प्राप्त होता है ॥२॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें