रविवार, 1 मार्च 2020

*२. स्मरण का अंग ~ ५७/६०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ५७/६०*
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हरि धन हरि पै पाइये, कै साधन पै५ सोइ ।
कै सो करतां बंदगी, किंचित जिय में जोइ ॥५७॥
ईश्वर रुपी धन ईश्वर से पायें अथवा साधक जन से मिलेगा साधु सेवा से ही वह मिलेगा । यदि हमारे मन में जरा भी इच्छा है तो प्रभु ईश्वर भजन व साधु जन से ही मिल सकते हैं। (५. साधन पै-सन्तों के पास)
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जगजीवन जे पाइये, मनमेलू६ की मौज ।
कोड्यौं ऊपर७ बांधिये, धनवंता की धौज८॥५८॥
संत कहते हैं कि ईश्वर को पानेवाले तो मनमौजी ही हैं । उनके लिये बड़े बड़े धनवानों की ध्वजा का मोल कौडियों का अर्थात नगण्य मानते हैं, वे प्रभु को ही सर्वोपरि मानते हैं। उनके लिए संसारिक सुख गौण हैं।
(६. मनमेलू-समान विचार वाले) (७. कोड्यों ऊपर-कोड़ियों से खरीद कर)
(८. धौज-ध्वज, पताका)
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कहि जगजीवन कीजिये, हरि धन बहुत कमाइ ।
तो सुख पावै प्रांणियां, दुख दलिद्र सब जाइ ॥५९॥
संत कहते हैं कि हरि धन रुपी कमाई ही करें, उसके करने से शास्वत सुख प्राप्त होता है एवं दुख दारिद्रय सब भाग जाते हैं।
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हरि धन समझि संभालिये, गिण गिण धरिये गाडि ।
मांगि मजूरी९ रांम पै, जगजीवन ले लाडि१०॥६०॥
संत कहते हैं कि हरि स्मरण को अभ्यास रुपी यत्न से संम्भाल कर रखें गिन गिन कर अर्थात सजगता से दबा कर यानि अन्तस में रखें। यह प्रभु से कृपा रुप में मिला मेहनताना है इसे सस्नेह लेकर रखें। (९. मजूरी-पारिश्रमिक)
(१०. लाडि-प्रेम{स्नेह} से)
(क्रमशः)

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