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*पहली प्राण विचार कर, पीछे कुछ कहिये ।*
*आदि अंत गुण देखकर, दादू निज गहिये ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९२. श्रीसाक्षिगोपाल*
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ब्राह्मणकुमार ने कहा- ‘आप तो मेरे वैसे ही पूज्य हैं, फिर वृद्ध हैं, भगवद्भक्त हैं, पड़ोसी हैं, मेरे पिता के तुल्य हैं और आजकल तीर्थयात्री हैं। आपकी सेवा करना तो मेरा हर प्रकार से धर्म है। इसमें मैंने प्रशंसा के योग्य कौन-सा काम किया है। यह तो मैंने अपने मनुष्योचित कर्तव्य का ही पालन किया है। मैंने किसी इच्छा से आपकी सेवा नहीं की, इसलिये इसका बदला चुकाने की क्या जरुरत है?’
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वृद्ध ब्राह्मण ने कहा- ‘तुम तो बदला नहीं चाहते, किन्तु मेरा भी तो कुछ कर्तव्य है, जब तक मैं तुम्हारे इस महान उपकार का कुछ थोड़ा-बहुत प्रत्युपकार न कर सकूँगा, तब तक मुझे शान्ति न होगी। मेरी इच्छा है कि मैं अपनी पुत्री का विवाह तुम्हारे साथ कर दूँ?’
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आश्चर्य प्रकट करते हुए उस युवक ने कहा- ‘यह आप कैसी बातें कर रहे हैं, कहाँ आप इतने भारी कुलीन, धनी-मानी, बड़े परिवार वाले गृहस्थ, कहाँ मैं माता-पिताहीन, अकुलीन,अनाथ ब्राह्मणकुमार ! मेरा आपका सम्बन्ध कैसा- सम्बन्ध तो सदा समान शील-गुणवाले पुरुषों में होता है।
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वृद्ध ने कहा-‘पिता का कर्तव्य है कि वह कन्या के लिये योग्य पति की खोज करे। उसके धन, परिवार और वैभव की ओर विशेष ध्यान न दे। तुम्हारे-जैसे शील-स्वभाव का वर अपनी कन्या के लिये और कहाँ मिलेगा? इसलिये मैं तुम्हें ही अपनी कन्या दूँगा। तुम्हें मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ेगी ?
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उस युवक ने कहा- ‘आप तो खैर राजी हो जायँगे, किन्तु आपकी स्त्री, आपका पुत्र तथा जाति-परिवार वाले इस सम्बन्ध को कब स्वीकार करने लगे? वे तो इस बात के सुनते ही आग-बबूला हो जायँगे?’ वृद्ध ब्राह्मण ने दृढ़ता के साथ कहा- ‘हो जाने दो सबको आग-बबूला। किसी का इसमें क्या साझा है ? लड़की मेरी है, मैं जिसे चाहूँगा दूँगा। कोई इसमें कह क्या सकता है? तुम स्वीकार कर लो।’
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युवक ने कहा-‘मुझे स्वीकार करने में तो कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु आप घर जाकर यहाँ की सब बातें भूल जायँगे, स्त्री, पुत्र तथा परिवार वालों के आग्रह के सामने वहाँ आपकी कुछ भी न चल सकेगी।’ वृद्ध ब्राह्मण ने जोश में आकर कहा- ‘मैं गोपाल भगवान को साक्षी करके कहता हूँ कि मैं तुम्हारे साथ अपनी पुत्री का विवाह अवश्य करूँगा। बस, अब तो विश्वास करोगे?’
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कुछ धीरे से ब्राह्मण कुमार ने कहा- ‘अच्छी बात है’, वहाँ चलने से सब पता चल जायगा !' इस प्रकार गोपाल के सामने पुत्री देने की प्रतिज्ञा करके वह वृद्ध ब्राह्मण थोड़े दिनों के बाद उस युवक के साथ लौटकर विद्यानगर में आ गया।
वहाँ आवेश में आकर तो ब्राह्मण कन्यादान का वचन दे आया, किन्तु स्त्री, पुत्र आदि के सामने उसकी इस बात को कहने की हिम्मत न पड़ी।
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एक दिन उसने एकान्त में अपने पुत्र पर यह बात प्रकट की। इस बात के सुनते ही सम्पूर्ण घर में द्वन्द्व मच गया। लड़का आपे से बाहर हो गया, स्त्री अलग विष खाने के लिये तैयार हो गयी। परिवार वाले मिलकर जाति से अलग कर देने की धमकी देने लगे।
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वृद्ध ब्राह्मण किंकर्तव्यविमढ़-सा बन गया। उसे कूछ सूझता ही नहीं था कि ऐसी स्थिति में क्या करूँ? अब वह उस युवक से आँखें मिलाने में भी डरता था। उस युवक ने कुछ काल तक प्रतीक्षा की वह ब्राह्मण स्वयं ही अपने वचनों के अनुसार कार्य करे, किन्तु जब बहुत दिन हो गये, तो उस युवक ने सोचा- ‘सम्भव है बूढ़े बाबा अपने वचनों को भूल गये हों, इसलिये एक बार उन्हें स्मरण तो दिला देना चाहिये। फिर उसके अनुसार काम करना-न करना उनके अधीन है?’
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यह सोचकर वह युवक उन वृद्ध ब्राह्मण के यहाँ गया। उस युवक को देखते ही वृद्ध ब्राह्मण का चेहरा उतर गया। उसने सूखे मुख से कहा- ‘आओ भाई ! आज तो बहुत दिनों में दिखायी पड़े।’ थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें होने के अनन्तर उस युवक ने कहा- ‘बाबा ! आपने वृन्दावन में गोपाल जी के सामने मुझे अपनी कन्या देने का वचन दिया था, याद है?’
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वृद्ध ब्राह्मण इस बात का जब तक उतर भी न देने पाया था, तब तक उसका पुत्र डंडा लेकर उसके उपर दौड़ा और कहने लगा- ‘क्यों रे नीच ! तेरा इतना बड़ा साहस? मेरा बहनोई बनना चाहता है? अभी इसी समय मेरे घर में से निकल जा, नहीं तो ऐसा लट्ठ मारूँगा कि खोपड़ी बीच में से खुल जायगी।’ इस बात को सुनकर उस युवक को बड़ा क्षोभ हुआ।
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उसे विवाह न होने का दु:ख नहीं था, वह अपने अपमान के कारण जलने लगा। उसे अपनी स्थिति के उपर बड़ा दु:ख होने लगा, वह सोचने लगा-आज मेरे माता-पिता होते और चार पैसे मेरे पास होते तो इसकी क्या हिम्मत थी, जो मेरा यह इस प्रकार से अपमान कर सकता? अच्छा चाहे कुछ भी क्यों न हो इस अपमान का बदला तो अवश्य लूँगा। या तो मैं इसकी बहिन के साथ विवाह करूँगा या जीवित ही न रहूँगा। यह सोचकर उसने पंचों को इकट्ठा किया।
(क्रमशः)

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