बुधवार, 20 मई 2020

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*जा कारण जग जीजिये, सो पद हिरदै नांहि ।*
*दादू हरि की भक्ति बिना, ध्रिक् जीवन कलि मांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भक्त*
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रत्नपुर के राजा मयूर ध्वज के अश्वमेध का घोड़ा छूटा हुआ था । उसके पुत्र ताम्रध्वज और प्रधानमंत्री सेना सहित उसकी रक्षा करते हुवे घूम रहे थे । उधर युधिष्ठिर के अश्वमेध का अश्व भी छूटा हुआ था । उसकी रक्षा श्री कृष्ण और अर्जुन कर रहे थे । दोनों की मणीपुर में मुठभेड़ हो गई । युद्ध में ताम्रध्वज, अर्जुन और उसके सारथी श्री कृष्ण को मूर्छित करके दोनों घोड़े पिता के पास ले गये, तब मयूर ध्वज ने खेद के साथ कहा - "तुमने बुद्धिमानी का काम नहीं किया । श्री कृष्ण को छोड़ कर घोड़े को पकड़ लाना वा यज्ञ पूरा करना अपना उद्देश्य नहीं है भगवान प्राप्ति ही मेरा उद्देश्य है । तुम मेरे पुत्र नहीं, प्रत्युत: शत्रु हो जो भगवान के दर्शन पाकर उन्हें छोड़ कर चले आये । ऐसा कहकर राजा ने बड़ा पश्चाताप किया।
भक्त चहैं भगवान को, पर से कछु न काज ।
हुये रुष्ट मुख अश्व लख, मयूर ध्वज नर राज ॥४३०॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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