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*दादू निर्मल सुन्दरी, निर्मल मेरा नाह ।*
*दोन्यों निर्मल मिल रहे, निर्मल प्रेम प्रवाह ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ सुंदरी का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *पति भक्ति*
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विष्णुचित्त की पुत्री कोदई(आण्डाल) भगवान को पति भाव से भजती थी । वह भगवान के लिये पुष्प माला बना कर प्रथम स्वयं पहन कर दर्पण में देखती थी कि कैसी लगती है । एक दिन मंदिर के पुजारी ने विष्णुचित्त की माला यह कह कर लौटा दी कि उसमें किसी मनुष्य के सिर के बाल हैं । इससे विष्णुचित्त को बड़ा दु:ख हुआ ।
दूसरे दिन भी पुजारी ने कहा - "माला कुछ मुरझायी हुई है ।" अब विष्णुचित्त ने सोचा इसमें कुछ रहस्य अवश्य होगा । वे उसका कारण खोजने लगे । उन्होंने देखा कि आण्डाल पुष्प हार पहने दर्पण के सामने खड़ी है । वे शीघ्र ही पास आकर बोले - "बेटी ! तूने यह क्या किया ?" भगवान के लिये बनाई हुई माला को स्वयं धारण करके जूठी कर दिया ।
विष्णुचित्त ने दूसरे हार बनाकर भगवान के चढाये, उस दिन रात में विष्णुचित्त को स्वप्न में भगवान ने आज्ञा दी - 'मुझे आण्डाल की पहनी हुई माला धारण करने से विशेष सुख मिलता है । इससे उसके पहने हुये हार भी मुझे पहनाया करो ।' विष्णुचित्त भी वैसा ही करने लगे । इससे सूचित होता है कि पति भाव के भक्त काम भाव भगवान भली भांति रखते हैं ।
सुपति भाव के भक्त काम, रखते हैं प्रभु भाव ।
कोदई पहनी मालहरि, पहनी सहित उच्छाव ॥२७९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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