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*दादू सुमिरण सहज का, दीन्हा आप अनंत ।*
*अरस परस उस एक सौं, खेलैं सदा बसंत ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४६. प्रभु का पुरी में भक्तों से पुनर्मिलन*
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अद्यास्मांक सफलमभवज्जन्म नेत्रे कृतार्थे
सर्वस्ताप: सपदि वरितो निर्वृतिं प्राप चेत:।
किं वा ब्रूमो बहुलमपरं पश्य जन्मान्तरं नो
वृन्दारण्यात् पुनरूपगतो नीलशैलं यतीन्द्र:॥[१]
([१] आज हमारा जन्म सफल हुआ, नेत्रों का होना सार्थक हुआ, शरीर के सम्पूर्ण ताप इसी क्षण विलीन हो गये। हृदय आनन्द से भर गया, मनके सभी सन्ताप मिट गये ! अधिक क्या कहें, आज हमारा दूसरा जन्म ही हुआ है जो कि यतीन्द्र श्री गौरप्रभु पुन: नीलाचल को लौट आये। श्री चैतन्यचन्द्रो. ना.)
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'संन्यासिचूडामणि श्रीचैतन्य वृन्दावन से लौटकर पुन: नीलाचल आ गये हैं - इस सुखद संवाद के श्रवणमात्र से ही गौर भक्तों में अपार आनन्द छा गया। वे परस्पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए एक-दूसरे का आलिंगन करने लगे। कोई जल्दी से दौड़कर कानों में अमृत का सिंचन करने वाले इस प्रिय समाचार को दूसरे से कहता, वह तीसरे के पास दौड़ा जाता।
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इसी प्रकार क्षण भर में यह संवाद सम्पूर्ण जगन्नाथपुरी में फैल गया। महाप्रभु जब वृन्दावन को जा रहे थे, तभी सब भक्तों ने समझ लिया था कि प्रभु के अन्तिम दर्शन हैं। जो वृन्दावन का नाम सुनते ही मूर्च्छित हो जाते हैं, जिनकी दृष्टि में वृन्दावन से बढ़ाकर विश्व ब्रह्माण्ड में कोई उत्तम स्थान ही नहीं हैं, वे वृन्दावन पहुँचकर फिर वहाँ से क्यों लोटने लगे?
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अब तो प्रभु वृन्दावनवास करते हुए उस बाँकेविहारी के साथ निरन्तर आनन्दविहार में ही निमग्न रहेंगे, किन्तु जब भक्तों ने सुना, प्रभु वृन्दावन से लौट आये हैं, तब तो उनके आनन्द की सीमा नहीं रही और सभी प्रेमोन्मत्त होकर संकीर्तन करते हुए एक स्थान पर एकत्रित होने लगे। सभी मिलकर प्रभु को लेने चले।
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सार्वभौम भट्टाचार्य और राय रामानन्द जी उन सभी भक्तों के अग्रणी थे। उन्होंने दूर से देखा, काषायाम्बर धारण किये हुए प्रभु श्री हरि के मधुर नामों का उच्चारण करते-करते मत्त गजेन्द्र की भाँति आनन्द में विभोर हुए श्री मन्दिर की ओर चले आ रहे हैं, तब तो सभी ने भूमि में लोटकर प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया।
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अपने पैरों के नीचे पड़े सभी भक्तों को प्रभु ने अपने कोमल करों से स्वयं उठाया और सभी को एक-एक करके छाती से लगाया। आज चिरकाल के अनन्तर प्रभु का प्रेमालिंगन प्राप्त करके सभी को परम प्रसन्नता हुई और सभी अपने सौभाग्य की सराहना करने लगे। भक्तों को साथ लेकर प्रभु श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिये गये।
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पुजारी ने प्रभु को देखते ही उनके चरणों में प्रणाम किया और उन्हें जगन्नाथ जी की प्रसादी माला पहनायी तथा उनके सम्पूर्ण शरीर पर प्रसादी चन्दन का दर्शन करके भक्त लेप किया। आज चिरकाल में जगन्नाथ जी के दर्शन करके भक्त-चूड़ामणि श्री गौरांग प्रेम में विह्वल होकर जोरों से रुदन करने लगे।
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भक्तों ने मन्दिर के श्री आँगन में ही संकीर्तन आरम्भ कर दिया। नर्तकों के अग्रणी श्री चैतन्य देव दोनों हाथों को ऊपर उठा-उठाकर नृत्य करने लगे।
महाप्रभु के नृत्य को देखने के लिये लोगो की अपार भीड़ वहाँ आकर एकत्रित हो गयी। सभी प्रभु के उद्दण्ड नृत्य को देखकर अपने आपेको भूल गये और भावावेश में आकर सभी-
हरिहरये नम: कृष्णयादवाय नम:।
गोपाल गोविन्द राम श्री मधुसूदन॥
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-कह कहकर नृत्य करने लगे। कुछ काल के अनन्तर प्रभु ने संकीर्तन बंद कर दिया और आप श्री मन्दिर की प्रदक्षिणा करते हुए भक्तों के सहित काशी मिश्र के घर अपने पूर्व के निवास स्थान पर आये। मिश्र जी ने प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया इतने में ही परमानन्दपुरी प्रभु का आगमन सुनकर भीतर से बाहर निकल आये।
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प्रभु ने श्रद्धा पूर्वक पुरी के चरणों में प्रणाम किया। पुरी महाराज ने प्रभु का आलिंगन किया और वे हाथ पकड़कर भीतर ले गये। सभी के बैठ जाने पर प्रभु अपनी यात्रा का वृत्तान्त बताने लगे। व्रजमण्डल की बातें करते-करते उनका गला भर आया, नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगी। तब सार्वभौम ने प्रभु से अपने यहाँ भिक्षा करने की प्रार्थना की।
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प्रभु ने कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय ! आज चिरकाल में तो मेरी भक्तों से भेंट हुई हैं, तिस पर भी मैं अकेला ही भिक्षा करूँ, यह मुझे अच्छा नहीं प्रतीत होता। आज तो मेरी इच्छा है कि अपने सभी भक्तों के सहित यहीं भगवान का प्रसाद पाऊं।’ इस बात से भट्टाचार्य बड़ी प्रसन्नता हुई।
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वे काशी मिश्र, वाणीनाथ तथा और भी दो-चार भक्तों को साथ लेकर महाप्रसाद लेने चले। सभी भक्तों के खाने योग्य बहुत बढ़िया-बढ़िया बहुत-सी प्रसादी-वस्तुएं भट्टाचार्य जी ने वहाँ लाकर उपस्थित कर दीं। प्रभु ने भक्तों को साथ लेकर बड़े ही स्नेह के सहित भगवान का प्रसाद पाया। प्रभु के पास प्रसाद पाने से सभी को परम प्रसन्नता प्राप्त हुई, सभी अपने-अपने भाग्य की प्रशंसा करने लगे। प्रसाद पाकर प्रभु विश्राम करने लगे और भक्त अपने-अपने घरों को चले गये।
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इधर स्वरूप गोस्वामी ने दामोदर पण्डित के हाथों प्रभु के आगमन का सुखद संवाद नवद्वीप में शची माता, विष्णुप्रिया तथा अन्यान्य सभी भक्तों के समीप पठाया। प्रभु के आगमन का संवाद सुनकर गौर भक्त आनन्द के सहित नृत्य करने लगे।
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वे जल्दी-जल्दी रथयात्रा के समय की प्रतीक्षा करने लगे। श्री शिवानन्द सेन समाचार सुनते ही यात्रा की तैयारियाँ करने लगे। शान्तिपुराधीश श्री अद्वैताचार्य अपने सभी भक्तों के सहित नीलाचल के लिये तैयार हुए। श्रीखण्ड, कुलियाग्राम, कांचनापाड़ा, कुमारहट्ट, शान्तिपुर तथा नवद्वीप के सैकड़ो भक्त प्रभुदर्शनों की लालसा से चले।
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सदा की भाँति श्री शिवानन्द सेन जी ने ही सबकी यात्रा का प्रबन्ध किया। सभी भक्त तथा भक्तों की स्त्रियाँ प्रभु के निमित्त भाँति-भाँति के पदार्थ लेकर और विष्णुप्रिया तथा शचीमाता से आज्ञा आज्ञा माँगकर प्रभु के दर्शनों के निमित्त रथयात्रा को उपलक्ष्य बनाकर पैदल ही पुरी की ओर चल दिये।
(क्रमशः)

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