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*आप निरंजन यों कहै, कीरति करतार ।*
*मैं जन सेवक द्वै नहीं, एकै अंग सार ॥*
*मम कारण सब परिहरै, आपा अभिमान ।*
*सदा अखंडित उर धरै, बोले भगवान ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १७४)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११६. राजपुत्र को प्रेम दान*
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कटकाधिपस्य तनयं गौरवर्णं मनोहरम।
आलिंगते सुप्रेम्णा तं गौरचन्द्रं नमाम्यहम॥[१]
([१] कटकाधिप महाराज प्रतापरुद्र के गौर वर्ण वाले सुन्दर पुत्र को जिन्होंने प्रेमपूर्वक गले लगाया उन श्रीगौरचन्द्र को मैं प्रणाम करता हूँ। प्र. द. ब्र.)
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मनुष्य का एक स्वभाव होता है कि वह रहस्य की बातें जानने के लिये बड़ा उत्कण्ठित रहता है। जो बात सर्वसाधारण को सुलभ है, उसके लिये किसी की उत्कण्ठा नहीं होती, किन्तु यदि वही एकान्त में रखकर सर्वसाधारण की दृष्टि से हटा दी जाय तो लोगों की उसके प्रति जिज्ञासा बढ़ती ही जायगी।
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एक बात और है, जो वस्तु जितने ही अधिक परिश्रम से जितनी ही अधिक प्रतीक्षा के पश्चात प्राप्त होती है उसके प्रति उतनी ही अधिक प्रीति भी होती हैं। वस्तुएँ स्वयं मूल्यवान या अमूल्यवान नहीं हैं। उनकी प्राप्ति की सुलभता दुर्लभता देखकर देखकर ही लोगों ने उसका मूल्य स्थापित कर दिया है।
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यदि हीरा-मोती कंकड़ पत्थरों की भाँति सर्वत्र मिलने लगें, यदि सुवर्ण मिट्टी की भाँति वैसे ही बिना परिश्रम के खोदने से मिल जाया करे तो न तो जनता में इन वस्तुओं का इतना अधिक आदर होगा और न ये बहुमूल्य ही समझी जायँगी।
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इसीलिये मैं बार बार लोगों से कहता हूँ, अपने को मूल्यवान बनाना चाहते हो तो किसी भी काम में घोर परिश्रम करो, सर्वसाधारण लोगों से अपने को ऊँचा उठा लो, विश्व से प्रेम करना सीखो, तुम मुल्यवान हो जाओगे। संसार में सर्वश्रेष्ठ समझे जाने वाले राजे महाराजे ने तुम्हारे चरणों में लोटेंगे और तुम उनके मान सम्मान की कुछ भी परवा न करोगे।
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महाप्रभु ज्यों ज्यों राजा से न मिलने की इच्छा प्रकट करने लगे। त्यों ही त्यों कटकाधिप महाराज प्रतापरुद्र जी की प्रभु दर्शन की उत्सुकता अधिकाधिक बढ़ती गयी। अब वे सोते-जागते प्रभु के ही सम्बन्ध में सोचने लगे। जब सार्वभौम भट्टाचार्य ने कह दिया कि प्रभु स्वयं मिलने के लिये सहमत नहीं हैं।
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तब महाराज ने सार्वभौम के द्वारा प्रभु के अन्तरंग भक्तों के समीप प्रार्थना की कि वे प्रभु के चित्त को हमारी ओर आकर्षित करें। इसीलिये उन्होंने अत्यन्त स्नेह प्रकट करके राय रामानन्द जी को प्रभु के पास भेजा था। राय महाशय प्रभु के परम अन्तरंग भक्त बन चुके थे। उन्होंने प्रभु से कई बार निवदेन किया, किन्तु प्रभु ने राजा से मिलने की कभी सम्मति नहीं दी।
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तब एक दिन नित्यानन्द जी, सार्वभौम, राय रामानन्द तथा अन्य कई अत्यन्त ही समीपी भक्त प्रभु के समीप पहुँचे। प्रभु के पास पहुँचकर किसी को भी साहस नहीं हुआ कि वे महाराज के दर्शन देने की सिफारिश कर सकें। एक दूसरे की ओर आँखों ही आँखों में संकेत करने लगे।
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तब कुछ साहस करके नित्यानन्द ने कहा- ‘प्रभो ! हम कुछ निवदेन करना चाहते हैं। वैसे तो कहने में संकोच होता है, किन्तु जब आपसे ही अपने मनोगत भावों को न कहेंगे तो फिर और किससे कहेंगे, इसलिये आज्ञा हो तो कहें?’ प्रभु ने कहा- ‘श्रीपाद ! आपको संकोच करने की कौन सी बात है, आप जो कहना चाहते हों, निर्भय होकर कहिये।’
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नित्यानन्द जी ने धीरे से कहा- ‘महाराज प्रतापरुद्र जी आपके दर्शन के लिये बड़े ही उत्कण्ठित हो रहे हैं, उन्हें आप दर्शन देने से क्यों मना करते हैं। वे जगन्नाथ जी के भक्त हैं, उनके ऊपर कृपा होनी चाहिये।’
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महाप्रभु ने कुछ गम्भीरता के साथ कहा- ‘श्रीपाद ! आपकी तो न जाने मेरे प्रति कैसी धारणा हो गयी है। आप चाहते हैं, मैं जैसे भी हो खूब ख्याति लाभ करूँ। कटक जाकर महाराज से मिलूँ। मुझसे यही नहीं होने का।’ नित्यानन्द जी ने कहा- ‘आपसे कटक जाने को कौन कहता है? यहीं महाराज ठहरे हुए हैं, मन्दिर में ही उन्हें दर्शन दीजिये या वे यहाँ भी आ सकते हैं।’
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महाप्रभु ने स्नेह प्रकट करते हुए कहा- ‘मुझे ऐसी आवश्यकता ही क्या है कि उन्हें यहाँ बुलाऊँ। मैं ठहरा भिक्षुक संन्यासी। वे ठहरे महाराजा। मेरा उनका सम्बन्ध ही क्या?’ नित्यानन्द जी ने कहा- ‘वे राजापने से मिलना नहीं चाहते हैं, वे तो आपके भक्त हैं। जैसे सब दर्शन करते हैं। उसी प्रकार उन्हें भी आज्ञा दे दीजिये।’
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महाप्रभु ने कुछ हँसकर कहा- ‘आप यह सब बातें कह रहे हैं। पता नहीं, आपको यह क्या नयी बात सूझी है। सचमुच वे बड़े महाभाग हैं, जिनके कल्याण के लिये आप सभी इतने अधिक चिन्तित हैं। किन्तु मैं संन्यासधर्म के विरुद्ध आचरण कैसे करूँ?
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लोग चाहे दिनभर असंख्यों बुरे बुरे काम करते रहें, किन्तु संन्यासी होकर कोई एक भी बुरा काम करता है तो लोग उसकी बड़ी भारी आलोचना करते हैं। स्वच्छ वस्त्र पर छोटा सा दाग भी स्पष्ट दीखने लगता है। राज दर्शन से लोक परलोक दोनों की ही हानि होती है। लोग भाँति-भाँति की आलोचना करने लगेंगे। और लोगों की बात तो जाने दिजिये, ये हमारे गुरु महाराज दामोदर पण्डित ही हमें खूब डांटेंगे।
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अच्छा, जाने दीजिये सब बातों को, दामोदर पण्डित आज्ञा दे दें तो मैं राजा से मिल सकता हूँ।’ इतना कहकर महाप्रभु मन्द मुस्कान के साथ दामोदर पण्डित की ओर देखने लगे। दामोदर पण्डित ने अपनी दृष्टि नीची कर ली और वे कुछ भी नहीं बोले। तब महाप्रभु ने कहा- ‘दामोदर जी ! बोलिये, क्या कहते हैं ?’
(क्रमशः)

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