बुधवार, 3 जून 2020

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*दादू पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग ।*
*जे जे जैसी ताहि सौं, खेलैं तिस हि रंग ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु*, *प्रेमा भक्ति*
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एक सेवक ने भक्त हरिदासजी को अतर(सुगन्धित द्रव) की शीशी भेंट की । हरिदासजी यमुना की रेती(नदी की मिट्टी) में बैठे हुये ध्यान में भगवान से होरी खेल रहे थे । भगवान ने उनके उपर रंग और गुलाल डाला । हरिदासजी के हाथ में अतर की शीशी थी वही भगवान पर डाल दी । यह देखकर सेवक को बड़ा दुख हुआ । 
उसने सोचा, स्वामीजी ने अतर की विशेषता नहीं जानी, इसी लिये ऐसे उत्तम अतर को रेती में डाल दिया । हरिदासजी उसके मन के भाव को जान गये और बोले - बिहारीजी के दर्शन कर आओ। तब उसने मंदिर में जाकर दर्शन किया तो देखा कि उसी अतर से भगवान की सारी पोशाक भीगी हुई है । अब उसे संतोष हो गया । इससे सूचित होता है कि भगवान प्रेमी भक्तों के साथ होली भी खेलते हैं ।
प्रेमी से खेलत हरी, होरी भी सप्रेम ।
अतर डाल हरिदास ने, माना अतिशय क्षेम ॥३६०॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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