शनिवार, 22 अगस्त 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*परमारथ को सब किया, आप स्वार्थ नांहि ।*
*परमेश्वर परमार्थी, कै साधु कलि मांहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु*, *संशय*
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एक मतिमान सज्जन के साथ कुछ लोग अंधेरी रात में मार्ग चल रहे थे । एक स्थान में कुछ कंकर पड़े मिले । मतिमान् सज्जन ने कहा - "ये अच्छे हैं ले लो ।" कुछ लोगों ने तो कुछ ले लिये और कुछ ने संशय किया कि - "इन्हें क्या पता है कि ये अच्छे हैं ? व्यर्थ बोझा ढोने से क्या लाभ है ?" नहीं लिये । आगे चल कर जब सूर्योदय हुआ तब उनने कंकरों को ठीक - ठीक देखा तो वे बहुमुल्य रत्न निकले । तब जो नहीं लाये थे उन्हे बड़ा पश्चाताप करना पड़ा ।
संशय सज्जन वचन में, कीन्हं पश्चाताप ।
रत्न त्याग आये लखे, पछताये फिर आप ॥२८०॥

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